सुसंस्कृति परिहार
जब टीवी मेरे घर आया, तो मैं किताबें पढ़ना भूल गया था। जब कार मेरे दरवाजे पर आई, तो मैं चलना भूल गया। हाथ में मोबाइल आते ही मैं चिट्ठी लिखना भूल गया। जब मेरे घर में कंप्यूटर आया, तो मैं स्पेलिंग भूल गया। जब मेरे घर में एसी आया, तो मैंने ठंडी हवा के लिए पेड़ के नीचे जाना बंद कर दिया। जब मैं शहर में रहा, तो मैं मिट्टी की गंध को भूल गया। मैं बैंकों और कार्डों का लेन-देन करके पैसे की कीमत भूल गया। परफ्यूम की महक से मैं ताजे फूलों की महक भूल गया। फास्ट फूड के आने से मेरे घर की महिलायें पारंपरिक व्यंजन बनाना भूल गई..हमेशा इधर-उधर भागता, मैं भूल गया कि कैसे रुकना है और अंत में जब मुझे व्हाट्सएप मिला, तो मैं बात करना भूल गया.. ये विचार मेरे एक मित्र ने फेसबुक पर व्यक्त किए ।
प्रगति के नाम पर आए एक के बाद एक उपकरणों ने यकीनन आम लोगों के जीवन में जो बदलाव लाया है उसके दुखद पहलू पर सामान्य रूप से उठाए ये बिंदु बहुत महत्वपूर्ण हैं।ये तमाम परिवर्तन जीवन में मायने रखते हैं।पहली बात ही गौर करें कि टेलीविजन के आने से किताबें पढ़ना भूल गए।ये हक़ीक़त है अब चंद लोग ही ऐसे होंगे जो तल्लीन होकर पुस्तकें पढ़ते होंगे। किताबों की खरीदारी भी घट गई।गांव की चौपालें खत्म हो गई और शहरों में घरों की बैठकी भी जाती रही।मेल जोल बुरी तरह प्रभावित हुआ। जिसके कारण अड़ोस-पड़ोस के दुख-सुख से तो नाता टूटा ही साथ ही साथ बच्चों पर रखी जाने वाली निगरानी भी जाती रही ।सब सीरियलों के प्रति सीरियस हो गए। समाज बिना निगरानी के स्वच्छंद हो गया। यहीं से बहुत से अनैतिक और गैर जिम्मेदाराना अपराधों की फेहरिस्त बढ़नी शुरू हो गई ।पहले घर में एक टीवी के आगमन से ये सिलसिला शुरू हुआ। बाद में पति पत्नि के बीच पहुंचने से परिवार का हाल , पड़ौस जैसा हो गया ।इस दूरी ने परिवार के बीच गहरी खाई भी खोदी जिसके दुष्परिणाम लगातार देखने मिलते हैं।
इसी तरह कार का आगमन हुआ तो चलना प्रभावित हुआ ही ।पहले पूरा संयुक्त परिवार एक कार में काम चलाता रहा फिर अलग-अलग का सिस्टम विकसित हुआ तब एक घर में दो और तीन कारें नज़र आने लगी।यही हाल स्मार्ट मोबाइल का है ।अब तो सरकार की कृपा से परिवार के प्रत्येक सदस्य की ज़रूरत बन गया है यह।
इन तीनों उपभोग में आ रही वस्तुओं का यदि हम सूक्ष्म तौर पर विश्लेषण करें तो पाते हैं कि यह बाजारवाद का ही कमाल है जिसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां विकास के नाम पर तेजी से जन जन तक पहुंचा रहीं हैं।उनका प्रथम लक्ष्य तो अपना सामान बेचना है । इसलिए भारत जैसे बड़े बाजार पर इनकी नज़र रहती है। इसके लिए वे एक अरसे तक नि:शुल्क जैसे आफर देकर जनता को आकर्षित करती हैं फिर बाद में इतना शोषण करती हैं कि जनता का कचूमर निकल जाता है सरकार की मिली भगत से अनिवार्यता जैसा साथ मिल जाए तो कहना ही क्या ?भारत में नि:शुल्क स्मार्ट मोबाइल और गैस कनेक्शन इस बात के पक्के प्रमाण पेश करते हैं।कोरोना काल में गरीबों ने अपने बच्चों को जायदाद बेचकर मोबाइल ख़रीदे हैं ताकि वे पढ़ सकें लेकिन इनसे पढ़ाई नाममात्र की ही हुई । बच्चों को स्मार्ट फ़ोन ने अपनी चपेट में ले लिया।वे चोरी कर उसमें बैलैंस डलवाने लगे,अन्य यौन अपराध भी बढ़ने लगे वगैरह वगैरह।युवा पीढ़ी को बर्बाद बनाने में मोबाइल शैतान बनके आज हाज़िर है।
वस्तुत: दूसरी ओर समझने वाली बात यह है कि यह सब एक सुनियोजित योजना के तहत हो रहा है। पूंजीवादी राष्ट्र विकासशील राष्ट्रों का इसी तरह आर्थिक शोषण कर उन्हें कमज़ोर तो करते ही हैं साथ साथ युवा पीढ़ी को इसकी तलब लगाकर अफीम से भी बुरा नशा उन्हें चढ़ा रही है जिसे पाने वे हर तरह के गलत कार्य करने में भी नहीं हिचकते।एक स्मार्ट मोबाइल ने कितनों के रोजगार छीन लिए आपने कभी सोचा , फोटो,टार्च, लेन-देन, पोस्ट,टाकीज , अखबार आदि कितने उद्यम है जो इससे प्रभावित हुए हैं।इसकी शिकार हमारी बुजुर्ग पीढ़ी और महिलाएं भी हुई हैं।उनका कितना रुपया अंबानी जी के पास पहुंच रहा है कि वे देश के नहीं बल्कि अब दुनिया के अमीरों की अग्रिम पंक्ति में पहुंच गए हैं।
इस नशे में चूर लोगों से क्या आप श्रेष्ठ नागरिक की कल्पना कर सकते हैं वे पूरी तरह लापरवाह सिर्फ और सिर्फ इसी नशे में तैरते उतराते हैं उन्हें ये जानने की फुर्सत नहीं होती कि देश में क्या हो रहा है ?नेता भी यही चाहते हैं कि सब इसी तरह खोए रहें और हम भगवान या हिंदू मुसलमान करते हुए वैतरणी पार कर लें।वाट्स ऐप पर चलने वाली पाठशाला से जो ज़हर लोगों को पिलाया जा रहा है वह देश के और उनके हित में कतई नहीं है इससे सिर्फ़ सत्ता फायदा लेती है।यह गंभीर साज़िश है इसके ख़तरे समझने की ज़रूरत है।
जैसा कि लोग कहते हैं दारु नशा भी है, दवा भी है ठीक उसी तरह इन साधनों का इस्तेमाल एक हद तक उपयोगी है लेकिन ज्यादा तो ख़तरे की घंटी है।हमें इस ख़तरे से सचेत रहते हुए इनका इस्तेमाल करना होगा ताकि हमारी अपनी जीवन शैली बाधित ना हो और ना ही यह लत हमें आर्थिक रूप से कमज़ोर कर पाए। पूंजीवादियों का एक धर्म होता है लूट।इस मामले में वे किसी को नहीं बख्शते। इंसानियत के शत्रुओं को पहचाने और सबको सचेत और समर्थक करें।





