सुसंस्कृति परिहार
पड़ोसी देश श्रीलंका जो भारत से सिर्फ मन्नार की खाड़ी से अलग है किन्तु कथित रामसेतु से जुड़ा हुआ है।या यूं कहें आध्यात्मिक तौर पर वह भारत के लिए खास अहमियत रखता है क्योंकि सीता की अशोक वाटिका को निहारने और राम-रावण युद्ध स्थलों को देखने हज़ारों की तादाद में लोग यहां जाते हैं।राम भक्त विभीषण का यह देश आज अपने सबसे बुरे दौर में है।
कभी लिट्टे आतताईयों से पीड़ित रहे देश में आज वहां का हर शख्स आतताई बन गया है वजह साफ है तमिल विरोध को ठिकाने लगाने वाले राजपक्षे परिवार को सिंहली लोगों ने पसंद किया।इस कदर उन्हें जिताते रहे कि वे यह भूल गए कि इस विरोध से देश में बुरी तरह साम्प्रदायिक सद्भाव बिगड़ने लगा है। बहुसंख्यक आबादी इसी का जश्न मनाती रही और उनके लाड़ले नेता विदेशी कंपनियों से मनमाने समझौते करते रहे और कर्ज लेते रहे जिसका प्रतिफल आज सामने है श्रीलंका की अर्थव्यवस्था का कचूमर निकल गया है तथा वहां की जनता आवश्यक वस्तुओं के अभाव में इतनी आक्रोशित हैं कि पहले उसने प्रधानमंत्री महेंद्रा राजपक्षे को घेरा और उनके ही भाई राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को भागने मज़बूर कर दिया। सबसे बड़ी बात यह है कि हवाई फायरिंग से ना डरते हुए लाखों लोगों ने राष्ट्रपति भवन की ओर कूच किया और भवन के हर कमरे में कब्ज़ा जमा लिया। स्विमिंग पूल और बेडरूम तक में प्रवेश के दृश्य बराबर दिखाएं जाते रहे। महत्वपूर्ण यह है कि जनता तमिल और सिंहली के द्वंद को समझ गई हैं और अब उनमें एका है और वे मिलकर यह लड़ाई लड़ रहे हैं।
भारत के राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था सिंहासन खाली करो कि जनता आती है आज वह दृश्य देखकर जनता की ताकत का अंदाजा दुनिया को हो गया होगा। इंग्लैंड के बोरिक जानसन ने अच्छा किया कि झूठ बोलने पर स्वेच्छा से त्यागपत्र दे दिया।उधर जापान के पूर्व प्रधानमंत्री को जिस शख्स ने मारा वह उनके विचारों से असहमत था ये दो उदाहरण जनता के बीच जन्म ले रही उत्तेजना को दर्शाते हैं। श्रीलंका में तो सीधी जनता सामने आ गई है।
इन स्थितियों को देखकर क्या हमें चौकन्ना होने की ज़रूरत है यह प्रश्न सामने आ खड़ा है। श्रीलंका की तरह भारत में हिन्दू मुस्लिम या मंदिर मस्जिद विवाद में जनता को उलझाकर ध्रुवीकरण कर मन माफिक जीत दर्ज कराई जा रही है। यहां संघ परिवार है जिसके विचार देश के संविधान से मेल नहीं खाते।देश पूरी तरह कारपोरेट के हाथ में पहुंच रहा है। बेरोजगारी, मंहगाई ने अवाम को दबोचकर रखा है।कहा जाता है हमारे देश की जनता बहुत सहनशील है।ऐसी ही सहनशीलता श्रीलंका में भी थी। किंतु देश जब बर्बाद हो चुका तब जागने से क्या फायदा मिलेगाऔर कब मिलेगा वर्तमान तो बिगड़ ही गया। हमारी अर्थव्यवस्था भी नाजुक दौर में पहुंच चुकी है।बैंक और खजाना बुरी स्थिति में है। रुपए का इतना अवमूल्यन हमारी कहानी कह रहा है। हमें चेतना होगा।अभी भी वक्त है।उस हर चीज़ का जायज़ विरोध करें जो जीवननिर्वाह से जुड़ी हुई है। धर्म और धार्मिक भावना के आहत होने के खेल में ना उलझें।सब साथ साथ सद्भाव से रहें।
श्रीलंका से यह भी सीखना होगा जिनके लिए सिंहलियों ने अपनी जान की बाजी लगा दी आज वे देश छोड़कर भाग रहे हैं उन्हें गर्त में डालकर। ऐसा हाल हमारे देश में अंधभक्तों का भी हो सकता है। इसलिए ज़रुरी है जनता की सहनशीलता की परीक्षा ना लें वह जब अपने पर आती है तो सब धराशाई हो जाता है।इस वक्त हम दो हमारे दो पर देशवासियों की नज़र है।
उम्मीद है हमारे देश में ऐसा नहीं होगा। बशर्ते देश में चुनाव निष्पक्ष हों।जनता अपने आप रास्ता चुन लेगी।यदि चुनाव में गड़बड़ी होती है तो फिर बेकाबू भीड़ कुछ भी कर गुजरने की क्षमता रखती है। श्रीलंका से सबक लेकर भारत अपनी तक़दीर का फैसला स्वत: कर सकता है यही उचित कदम होगा।




