शशिकांत गुप्ते
आज वसंत पंचमी का माँ सरस्वती के पूजन का दिन है। आज साहित्य के महान व्यक्तित्व,परम श्रध्येय महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठीजी का जन्म दिन भी है।
वसंत पंचमी के पवित्र दिन शहीद आजम भगतसिंह का स्मरण भी स्वाभाविक रूप से हो जाता है।
भगतसिंहजी का स्मरण होते ही इस गीत की पंक्तियों के भी स्मरण होता है।
मेरा रंग दे बसंती चोला, मेरा रंग दे
मेरा रंग दे बसंती चोला ओये, रंग दे बसंती चोला
माये रंग दे बसंती चोला
दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है
एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है
इस गीत पंक्तियों को पढ़ने और गाने पर अंतर्मन में देशभक्ति का जुनून जाग उठता है।
साथ ही देशभक्ति की प्रेरणा और जोश जागृत करने वाली इस गज़ल का भी स्वाभाविक रूप से स्मरण हो जाता है।
यह ग़ज़ल महान क्रांतिकारी स्वतंत्रता सैनानी
बिस्मिल आज़ीमाबादी ने लिखी है।
इस ग़ज़ल को रामप्रसाद बिस्मिल ने अपने साथियों के साथ जेल में गाकर इस ग़ज़ल को देशभक्तों का प्रेणास्रोत गीत बना दिया।
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
ऐ वतन, करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे, ए आसमान,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है
खेँच कर लाई है सब को क़त्ल होने की उमीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-क़ातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ, जिन में है जूनून, कटते नहीं तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से.
और भड़केगा जो शोला सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.
ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
यूँ खड़ा मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है?
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो ख़ून-ए-जुनून
क्या लड़े तूफ़ान से जो कश्ती-ए-साहिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में
उपर्युक्त गीत और गज़ल को बार बार पढ़ने पर देशभक्तों की कुर्बानियों का स्मरण होता है।
और आज देश में जो कुछ हो रहा है,वह देखकर दुःख होता है।
आज सियासतदानों की तो सिर्फ और सिर्फ सत्ता प्राप्त करने की तमन्ना हो गई है।
देशभक्ति का जज़्बा तो दूरतक दिखाई नहीं देता है,लेकिन इवीम मशीन के माध्यम से करंट दौड़ाकर चुनावी प्रचार करने का नायाब तरीका जरूर सुनाई देता है।
अब सरफरोशी नहीं की तमन्ना नहीं अब चंद सरमायेदारों की दौलत को बेतहाशा बढाने के लिए देश की आमजनता के मूलभूत सवालों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
देशभक्तों को इतिहास को पढा जाता है, और आज की स्वार्थीभरी राजनीति को देखकर बहुत दुःख होता है।लेकिन यह यह सूक्ति याद आतें ही,पुनः देश का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है। परिवर्तन संसार का नियम है।
परिवर्तन होगा ही।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





