आरती शर्मा
सूर्य की उपासना का पर्व छठ पूजा स्वयं और परिवार के उत्तम मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भारत भर में मनाया जाता है। पूरे घर की साफ़-सफाई के साथ-साथ तामसिक खाद्य पदार्थ माने जाने वाले लहसुन और प्याज को भी कद्दू भात के अवसर पर खाना वर्जित किया जाता है। कद्दू-भात के अवसर पर हर घर में नहा-धोकर बिना लहसुन प्याज के लौकी की सब्जी, चना की दाल और चावल पकाए जाते हैं। माना जाता है कि व्रती के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए खरना के एक दिन पहले लौकी की सब्जी और उसके अन्य व्यंजन तैयार किये जाते हैं।

छठ पूजा कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। वर्तमान वर्ष की छठ पूजा का शुभारम्भ 17 नवंबर को कद्दू-भात के साथ हो हुआ। 18 नवंबर को खरना, 19 नवंबर को सांध्य अर्घ्य और 20 नवंबर को सुबह के अर्घ्य के साथ छठ पूजा की समाप्ति होगी।
कद्दू भात के अवसर पर व्रती लौकी की सब्जी और चावल खाती हैं। इस अवसर पर लौकी की सब्जी के अलावा, लौकी का रायता, लौकी के छिलके की चटनी, लौकी में काला चना या चने की दाल डालकर इश्टू और लौकी की पकौड़ी भी खाई जाती है। लौकी को बिहार और बिहार से सटे उत्तरप्रदेश के कुछ स्थानों पर कद्दू कहा जाता है। इसलिए इस विशेष दिन को कद्दू भात कहा जाता है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए पूजा के आरंभ में लौकी खाई जाती है।
कद्दू-भात के दूसरे दिन से व्रती का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है। दूसरे दिन शाम में सूरज ढलने के बाद पूजा की जाती है। इसके बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करती हैं। पानी और खाना के अभाव में शरीर को हाइड्रेट रखना जरूरी होता है। इसमें शरीर को पर्याप्त हाइड्रेशन करने में मदद करती है लौकी।
सबसे पौष्टिक सब्जियों में से एक माना जाती है लौकी। इसमें भारी मात्रा में पानी लगभग 92% होता है। इसमें विटामिन सी, विटामिन के और कैल्शियम भरपूर मात्रा होता है। ये मिनरल शरीर को हाइड्रेटेड रखने में मदद करते हैं।
यह खाद्य दिल को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करता है। यह कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करता है। लौकी और लौकी के जूस से डायबिटीज के रोगियों को लाभ मिलता है। यह ब्लड शुगर लेवल और ब्लडप्रेशर नियंत्रित करने में मदद करता है। इसलिए यदि व्रती हर बार के भोजन में यदि लौकी शामिल करती हैं, तो यह इन्हें दूसरे दिन भी हाइड्रेट करने में मदद करती है.
यदि एक छोटा ग्लास लौकी का जूस पी लिया जाए, तो यह शरीर को हाइड्रेट रख सकता है। गर्मी के दिनों में लौकी का जूस शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करता है। लौकी कार्डियो-टॉनिक और डाय यूरेटिक होती है। यह वात और पित्त को संतुलित करता है। इसलिए इसका उपयोग दर्द, अल्सर, बुखार और श्वसन संबंधी विकारों के इलाज के लिए भी किया जाता है।
चावल कार्बोहाइड्रेट का एक समृद्ध स्रोत है। यह शरीर का मुख्य ईंधन स्रोत है। कार्बोहाइड्रेट ऊर्जावान और संतुष्ट बनाये रखने में मदद करता है। फाइबर का स्रोत होने के कारण बोवेल मूवमेंट में भी मदद मिलती है। इससे दूसरे दिन शरीर के कामकाज के लिए पर्याप्त ऊर्जा बनी रहती है। खासकर ब्राउन चावल खाया जाए, तो फाइबर, मैंगनीज, सेलेनियम, मैग्नीशियम और विटामिन बी सहित कई पोषक तत्व मिल सकते हैं।
*व्रात्य प्रदेश का व्रत :*
गंगा के पूर्व और उतर को व्रात्य प्रदेश कहा जाता था । यह मनु ने मनुस्मृति में कहा , वेद की स्तुतियों में कहा गया , स्मृतियों में कहा गया . ..इसका भौगोलिक सीमा – रेखा तय की जाय तो आज के जमाने के इलाहाबाद के उतर , पूरा पूर्वांचल , बिहार ,उड़ीसा ,बंगाल और पूर्वोत्तर प्रदेश बनता है।
सवाल है इसे व्रात्य प्रदेश क्यों कहा जाता है ? अन्य को क्यों नहीं ? इतिहासकारों ने कैसे तय किया कि यहीं व्रात्य प्रदेश है ,बाकी सब आर्यावर्त ? हालांकि कि आर्यावर्त में व्रत की जगह वर्त हो गया है ,जो व्रत को ही प्रतिध्वनित करता हुआ प्रतीत होता है ।
व्रात्य – व्रत से बना है । हालांकि कुछ कुटिल पाली – वादी नव बौद्ध कह सकते हैं कि व्रत में आधा और संयुक्त ‘ र ‘ तो पाली और प्राकृत में प्रचलन में नहीं था , तो यह शब्द महावीर और बुद्ध के वाद का है । उनके लिए कहना है कि असली शब्द ‘बरत’ है जो एक भोजपुरी का शब्द है । बरत से बरतना बना है और बरत से ही बरताव ! बरतना का अर्थ है निबाहना या अमल पर कायम रहना ।
पूर्वजों ने हमें जो सभ्यता ,विकास और धर्म दिया ,उस पर कायम रहना ही व्रत या बरत है । बाद में इस बरत का व्रत के रुप में सांस्कृतिक करण हुआ ।
आरंभिक आर्यों के लिए बरत करने वाले लोग दुश्मन थे ,जो उनकी भाषा को न अपना सकते थे ,न ही संस्कार और उपनयन को । इसलिए वह उनके लिए वर्जित थे । वेद से उपनिषद तक आते- आते आर्य भी व्रती हो गए । जैन और बौद्ध तक पूरी तरह व्रात्य हो जाना एक रूपांतरण है जिसे हमें ऐतिहासिक रुप से समझने की जरुरत है। आज तो व्रत और त्योहार उनके हिंदुत्व की आत्मा है। हिंदुत्व से व्रत और त्योहार निकाल दीजिए , उनके पास कुछ नहीं बचेगा। अतः: हिंदुत्व किसी ब्राह्मण ,पुजारी या पंडा की बपौती नहीं है , यह व्रात्य प्रदेश की देन है ,व्रात्य परंपरा है। हम अगर हिंदुत्व के नाम पर व्रत और त्योहार का विरोध करते हैं ,इसका मतलब हम व्रात्य होने का विरोध कर रहे हैं। यह यहां बात हुआ कि हम जिस डाली पर बैठे हैं उसी को काट रहे हैं या अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।
व्रत जिनके लिए वर्जित था ,त्याज्य था , जिनका दुश्मन था उन्होंने हिंदू बन कर उसको अपना लिया ,उस पर अपनी बपौती झाड़ते हैं , व्रत और त्योहार जिनका सृजन था ,संस्कार था वे इससे छुटकारा पाने के लिए छटपटा रहे हैं !
हिंदुत्व और ब्राह्मणत्व में जमीन आसमान का फर्क है। हिंदुत्व एक समुच्चय है ,ब्राह्मणत्व श्रेष्ठता बोध। समुच्चय में श्रेष्ठ्ताबोध।ब्राह्मणों ने हिंदुओ पर अपनी श्रेष्ठता कायम कर रखी है। कैसे – यह एक विषद् विश्लेषण का विषय है।
हां ,हम व्रत और व्रात्य को समझ सकते हैं। इसका काल और भौगोलिक उपस्थिति भी।
बाबासाहेब ने कहा है कि आर्यों का दो दल भारत में आया। पहला ऋग्वैदिक और दूसरा यजुर्वैदिक। ऋग्वैदिक प्रिमिटीव ट्राइब की तरह था ,यजुर्वैदिक यज्ञ विधान करने वाले। फिर बाबासाहब ने कहा कि इसका कोई प्रमाण नहीं कि आर्य बाहर से आए हैं। यह स्टेटमेंट बहुत सारे लोगों को कंफ्यूज कर देता है। बाबासाहेब ने कहा कि कोई प्रमाण नहीं कि आर्य बाहर से आए हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उन्होंने यह कहा कि आर्य बाहर से आए ही नहीं थे। उनका कहना था कि अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं है कि आर्य कब और कैसे और कहां से बाहर से आए ,लेकिन आए तो बाहर से ही हैं ,वे पहले कह चुके थे।
आज डी एन ए का सबूत मिल गया है कि आर्य बाहर से आए हैं।इसमें किसी को इफ – बट नहीं है। हां ,यह अलग बात है कि एक काला ब्राह्मण भी अपने को ब्राह्मणी व्यवस्था के अनुसार श्रेष्ठ ही समझता है ,जबकि उसका रंग काला समिश्रण के वजह से हुआ है। सवाल है जन्म और वर्ण के आधार पर श्रेष्ठता यहीं खत्म हो जाना था ,लेकिन अभी तक कायम है , इसके पीछे का राज क्या है? यह एक अनसुलझा सवाल है।
आर्यों के दो दल आए और पश्चिमोत्तर बोर्डर पर रिहायस बना लिया। इनका इलाका था सप्त – सिंधु। ऋग्वैदिक काल में दशराज्ञ युद्ध हुआ। दस राजाओं का युद्ध। दस राजाओं में कौन थे ? एक तरफ इंद्र था ,दूसरी तरफ सुदास। दोनों ही आर्य थे। सुदास जिसके पीछे दास लगा है वे भारत में पहले आ चुके थे। इनका सास्कृतिकरण हो चुका था। दूसरी शब्द में कहे तो व्रात्यीकरण। दूसरा दल जिसमें यदु , तुर्वसु , द्रह्युस ,अनस , पुरू थे ,इनका लीडर इंद्र था। ये पांच और दल के साथ मिलकर भरत जन के खिलाफ लड़े।
इंद्र इन पांचों का लीडर था इसका प्रमाण ऋग्वेद में ही है।
तदीनद्रांगी ,यदुस , तुर्वसेसु यद् , द्रह्युस ,पवनुसुस ,पुरूसुस सथ !
भारत जन कौन थे ? उनके पीछे दास क्यों लगा था? सवाल है यह दास कौन थे। दास आर्यों की ही एक शाखा थी ,असुर भी।जिंदवेस्ता में इनकी बहुत चर्चा है। असुर से ही असिरिया बना है। दास आर्य पहले आए। वे थोड़ा सभ्य थे। उन्होनें व्रात्य की तरह ही अपने नगर और पुर बसाए। उनका व्रात्यीकरण पहले हो चुका था। लेकिन अपना यज्ञ – याज्ञ भी नहीं छोड़ पाए। इनका लीडर सुदास था। उसका पुरोहित वशिष्ठ था। बाद में सुदास ने वशिष्ठ को हटाकर ,विश्वामित्र को अपना पुरोहित बनाया। वशिष्ठ और विश्वामित्र की यह दुश्मनी रामायण काल तक चलती रही। वेद और रामायण काल में सैकड़ो वर्ष का अंतर है।
सवाल है एक ही व्यक्ति इतना दिन तक कैसे जिंदा रह सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रामायण काल का वशिष्ठ और विश्वामित्र ,ऋग्वैदिक काल के वशिष्ठ और विश्वामित्र का प्रतिभाष हैं। सवाल यह भी है कि इस जन का नाम भारत क्यों पड़ा ? भरत या भारत में भर है। भर एक ऑस्ट्रेलॉयड यानी द्रविड़ प्रजाति की जाति है। दास -आर्य और भर जाति के मिलन से भारत जन बना। इस भरत जन ने आर्यों के दस राजाओं को पराजित कर दिया। उन्हें तीतर – बीतर कर दिया। तब इन आर्यों के दल का लीडर यदु और तुर्वसु को समुंदर पार करवाया ,उन्हें बसाया। सप्त – सिंधु से सबसे ज्यादा नजदीक अरब सागर है।
अरब सागर के तट पर गुजरात है। गुजरात में द्वारका है जो यदु वंश की राजधानी थी। ऋग्वेद के इस बात से कि इंद्र ने यदु और तुर्वसु को समुंदर पार करवाया यह बात स्पष्ट हो जाती है।
यदु और तुर्वर्सु इंद्र की मदद से गुजरात में बस गए और पुरू सिंधु में ही रह गया। फिर भरत जन का क्या हुआ ? भरत जन का व्रात्यीकरण पहले हो चुका था। वे धीरे – धीरे आज के भारत के अंदर तक प्रवेश किए। अयोध्या में अपनी राजधानी बनाई। चूंकि यह जन सांस्कृतिक रुप से बहुत लचीला वर्ग बन चुका था , इसलिए बाद में आने वाले सभी विदेशियों को इन्होने आत्मसात किया ,उनका आर्यीकरण किया।
वेद छोड़कर ये उपनिषद यानी अरण्यक की तरफ बढ़ चुके थे। इसी कुल में सब आत्मसात हुए , शक ,हूण ,कुषाण ,शुंग। इसी कुल में मनु, पार्शवनाथ , महावीर , बुद्ध हुए , इक्षवाकु वंश का एक अंब्रेला बना और भारतवर्ष भी। जब ये अयोध्या से लेकर हिमालय तक व्यस्थित हो गए तो इनकी नजर में बिहार और बिहार के पार का प्रदेश ही व्रात्य – प्रदेश रह गया। उसके पहले पूरा देश ही व्रात्य – प्रदेश था।
इसका प्रमाण ऋग्वेद है।
“Akarm dasyurabhi no aman turnya , varto amanus.”
Meaning : all around us are ritualless dasyu , inhuman who are following akarm law.
“So viteahehdru karsunyami purandaro dasiraraiyada vi hatari dasyuna pura …!
Indra the virtra killer , fort destroyer , scattered the dasa who dwelt in darkness , he killed the das and broken the fort made of iron.
यहां वर्त यानी व्रत का उल्लेख है , दास का उल्लेख है , दास के पुर का उल्लेख है , उनका धर्म अकर्म का उल्लेख है। यहीं पर सारी बात क्लियर हो जाती है।
आर्यों के आने से पहले दास आए , दासों का व्रात्यीकरण हो चुका था। दास भी आर्य थे। क्योंकि उनके पास लोहे का प्रयोग का हुनर था। सिंधु – घाटी सभ्यता में लोहा कोई जानता नहीं था। दास ही असुर थे। आज भी झारखंड के असुर लोह के काम में परांगत वंशानुगत रुप से सिद्ध हैं।
इन दासों को इंद्र ने पराजित किया और उन्हें भारत में भीतर की तरफ धकेला। देवदास पहले काशी में आकर अपना वर्चस्व जमाया ,फिर इन्हीं लोगों ने अपनी राजधानी अयोध्या यानी साकेत बसाई। देवदास ,सुदास का पुत्र था।
अब रही व्रात्य धर्म की बात। व्रात्य धर्म ,अकर्म पर आधारित है । यहां न कर्म का कोई महत्व नहीं है , नियति यहां महत्वपूर्ण नियंता है। कर्म और गुण नियति के अधीन है। कर्म कोई स्वतंत्र क्रिया नहीं है ,बल्कि नियति से आबद्ध है। छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में मक्खली गोसाल के इसी अकर्मवाद ,नियतिवाद , व्रात्य धर्म से बुद्ध और महावीर दोनों लड़ रहे हैं। उनका ब्राह्मण धर्म से कोई लड़ाई ही नहीं है।
जब लड़ाई में नहीं जीते तो इसे हड़प लिया ,छीन लिया और इसपर सत्ता कायम कर ली। इसमें कर्म की मिलावट कर दी जिससे ऊंच – नीच पैदा होता है।
आज भी मिलावट जारी है। टीवी पर बैठी ब्राह्मणी एंंकरानियां नाक तक सिंदुर कर दिखावा करती हैं कि उन्होंने छठ व्रत करती हैं , छठ व्रत के उद्भव और विकास पर तरह तरह की उल्टी – सीधी कहानियां बताती है। इसे संतान की खातिर बताती हैं , पोंगापंथ का प्रवचन बांचती है।
उन्हें यह भी पता नहीं कि हमारे यहां सिंदुर को इंगुर कहते हैं। इतना तो तय है कि इंगुर शब्द न संस्कृत का शब्द है ,न पाली ,न प्राकृत का ,न ही तमिल ,द्रविड़ शब्द है। इससे पता चलता है कि आर्य या द्रविडः के अलावा भारत में एक और भाषा थी ,जिसपर आजतक न बात होती है , न चर्चा। उसे दलित की तरह दमित कर दिया गया है ,दबा दिया गया है।
अंत मे सवाल है क्या सचमुच में इतिहास में जो हमें पढ़ाया जाता है कि इस देश का आर्यीकरण हुआ है ?
जवाब है ,नहीं। यहां किसी का आर्यीकरण नहीं हुआ है बल्कि सबका व्रात्यीकरण हुआ है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण है छठ व्रत।
कंनिंघम का एक रिपोर्ट पढ़ रहा था । उसने बताया है कि देव मूंगा का सूर्य मंदिर चेरो राजाओं ने बनवाया था। उसे बाद में भूमिहार जमिंदारों ने कब्जा लिया। उसमें विष्णु की प्रतिमा स्थापित की।
अब बचे – खुचे विलुप्ती के कगार पर चेरो खुद नहीं जानते कि छठ क्या और क्यों होता है , पूरा देश इसको सेलिब्रेट करता है।
एक समय ग्यारहवीं शताब्दी तक बिहार में चेरो का वर्चस्व था ।वे व्रात्य थे। छठ पूजा उनका ही प्रचलन है. जो लोग छठ पूजा मनाते हैं वे जानते हैं देवमूंगा का छठ में क्या महत्व है। नहीं जानते तो जान ले ,देव मूंगा का वहीं स्थान है जो बौद्ध धर्म में बोधगया और सारनाथ का है। इस ऐतिहासिक विमर्श में हड़पवाद को समझना महत्वपूर्ण है।
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