शशिकांत गुप्ते
संत कबीर साहब के दोहे सुन रहा था। यह दोहा सुनने पर समझ में आया कि, योग्यता का क्या मापदण्ड होना चाहिए।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, *
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
अर्थ : सज्जन की जाति नहीं पूछना चाहिए।उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी मयान का – उसे ढकने वाले खोल का।
संत कबीरसाहब के विचार उच्चकोटि के विचार है। सतही तौर पर इन्हें समझना बहुत कठिन है। उक्त दोहे में योग्यता के जो मापदण्ड इंगित किएं हैं,वे मापदण्ड आध्यामिक स्तर पर योग्यता को समझने के लिए है।
व्यवहारिक स्तर पर योग्यता के मापदंड बदल जातें हैं। व्यवहारिक स्तर पर यदि भावना रहित होकर कोई व्यक्ति, योग्यता को समझने वाला हो तो वह योग्यता का सही मापदण्ड अपनाएगा।
सियासत में तो योग्यता के मापदंड का पैमाना एकदम भिन्न होता है।
चुनाव में योग्य उम्मीदवार और उम्मीदवार की योग्यता के मापदण्ड को परिभाषित करना साधारण व्यक्ति के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिम है।
चुनाव लड़ने के लिए इच्छुक अपनी अपनी सियासी योग्यता का लेखाजोखा अपने दल में प्रस्तुत करतें हैं। दलों में बंटे गुट और गुटों के स्वयंभू प्रमुख और उनके इर्दगिर्द उनके अनुयायी आश्वस्त होतें हैं,अपने उस्ताद की पहुँच दिल्ली के दरबार तक है।
टिकट वितरण की प्रक्रिया में रसूखदारों के लिए दल के रीति-नीति-सिंद्धान्त का कोई महत्व नहीं होता है। राजनैतिक कार्यकर्ता सिद्धांतो के प्रति निष्ठा रखने बजाय अपने विरिष्ट की छत्रछाया को अधिक महत्व देतें है।
कबीर साहब के उक्त दोहे का अर्थ स्पष्ट है कि तलवार का मूल्य होता है,म्यान का नहीं।
मतलब योग्यता स्वयंसिद्ध होनी चाहिए आवरण युक्त नहीं।
सियासत में आवरण युक्त योग्यता को ही महत्व दिया जाता है। इसलिए उम्मीदवार की योग्यता का मापदण्ड, एक अच्छा और सच्चा नागरिक होने बजाए उसकी जाति,उसके अगड़े या पिछड़े समाज पर ही निर्भर होता है।
एक आरोपी भी उम्मीदवार हो सकता है,और चुनाव जीत भी सकता है,कारण वह सिर्फ आरोपी है,अपराधी साबित नहीं हुता है। इस मुद्दे पर नैतिकता गौण हो जाती है?
सारे दांवपेंच अपनाने के बाद भी टिकट प्राप्त होगा जरूरी नहीं है। टिकट का हक़दार वही होता है, जो दल के आलाकमान (high command) का प्रिय साबित हो? प्रिय होना और प्रिय साबित होने का अंतर तज्ञ राजनेता ही समझ सकतें हैं।
आश्चर्य तो तब होता है जब एक घोषित शुद्ध अराजनैतिक, सांस्कृतिक संगठन भी अपना उम्मीदवार घोषित कर देता है।
इस अराजनैतिक संगठन के द्वारा चयन किए उम्मीदवार को इसी संगठन की राजनैतिक शाखा को सहर्ष स्वीकारना पड़ता है। ऐसे उम्मीदवार के कारण उक्त दल के कर्मठ कार्यकर्ताओं की उम्मीद पर पानी फिर जाता है।
उपर्युक्त सारी प्रक्रिया सत्ता केंद्रित राजनीति को प्रश्रय देती है।
सत्ता केन्दित राजनीति के कारण मेवा खाने की जुगत में हर कोई रहता है। सेवा के भाव का तो अभाव ही हो गया है। सेवा का प्रदर्शन विज्ञापनों में दर्शया जाता है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





