निर्मल कुमार शर्मा
यक्षप्रश्न है कि क्या ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों से लिखित में स्वतंत्रता संग्राम से अलग रहकर इस देश में कथित हिन्दुत्व जैसी सांप्रादायिक जहर के बीज बोने वाले,देश के गद्दारों और स्वयंभू वीर कहकर संबोधित करने वाले,जीवन भर ब्रिटिश-पूँजीपतियों और साम्राज्यवादियों तथा सैकड़ों सपूतों की शहादत और कुर्बानी से मिली स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों की जारज औलादों द्वारा सत्ता संभालने के बाद भारी-भरकम पेंशन लेकर माफीवीर सावरकर जैसों के इस देश के साथ विश्वासघात करने और माफी मांगने,परोक्षरूप से ब्रिटिशसाम्राज्यवाद की मदद करने के लिए इस देश के अमर सपूत सुभाष चन्द्र बोस की नवगठित आजाद हिंद फौज में इस देश के नवयुवकों को भर्ती होने से रोकने और भर्ती हो चुके नवयुवकों की निर्ममतरीके से जघन्यतम् हत्या कराने वाले ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों के विश्वासपात्र आरएसएस के सांप्रादायिक वैमनष्यता फैलाने वाले एजेंटों तथा जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर तथा ईटली के नाजी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी को अपना आदर्श मानने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से यह देश आजाद हुआ है ?
माफीवीर सावरकर के विचारधारा के पोषक,पूँजीपतियों के मित्र और इस देश की समस्त आवाम,गरीबों,मजदूरों,किसानों,शिक्षकों विद्यार्थियों और हर साधारण व्यक्ति के खिलाफ मानवविरोधी, आमजनविरोधी नीतियों के प्रबल समर्थक मोदी जैसे झूठे,कातिल, चरित्रहीन, अमानवीय,असहिष्णु,क्रूर, दंगाई,मानवेत्तर जीव ने इस समूचे राष्ट्र राज्य से सार्वजनिक तौर पर झूठ बोलकर अपनी जुमलेबाजी से,अच्छे दिन लाने के सपने दिखाकर इस देश की 1 अरब 35 करोड़ जनता के साथ विश्वासघात करके, शातिराना ढंग और ईवीएम में धोखाधड़ी करके इस देश की केन्द्रीय सत्ता पर दखल कर लेनेवाले के विचारों की समर्थन करनेवाली एक मुंबईया फिल्मों में कुछ फिल्मों में काम करनेवाली,अभद्र,अश्लील और अर्धनग्न कपड़े पहननेवाली,लकड़ी के घोड़े पर बैठकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असली नायिका झांसी की वीरांगना स्वतंत्रता सेनानी झांसी की रानी का अभिनय करनेवाली इस देश के सैकड़ों प्रातःवंदनीय,पूजनीय इस देश को ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों के गुलामी में पिसते इस देश को स्वतंत्र कराने में स्वयं को कुरबानी दे देनेवाले वीरों यथा शहीद-ए-आजम भगतसिंह,चंद्रशेखर आजाद,अशफाकउल्ला खान,पंडित राम प्रसाद बिस्मिल,सुखदेव,राजगुरु आदि के अकथ्य वीरोचित शहादत को नकार कर यह बयान देकर कि ‘अब तक शरीर में खून तो बह रहा था,लेकिन वो हिन्दुस्तानी खून नहीं था !..और भारत को जो आजादी मिली थी,वो भीख में मिली आजादी थी,असली आजादी तो हमें 2014 में पापा मोदी की सत्ता में आने के बाद मिली है ‘ यह बयान देकर यह छिछोरी,अभद्र भाषा की सीमा को भी ध्वस्त करने वाली,इस देश में नफरत और सांप्रादायिक वैमनस्यता के बीज बोनेवाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नफरती विचारधारा को और आगे बढ़ाई है,हकी़कत यह है कि उसका दिया गया यह राष्ट्रद्रोही बयान अचानक नहीं दिया गया है,अपितु मोदी ऐंड कंपनी सरकार के वैचारिक पितृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सुचिन्तित व सुनियोजित एक चाल के तहत दिया गया यह बयान है,ताकि वे इस राष्ट्र राज्य के साथ अपनी नपुंसकता,कायरता और स्वतंत्रता संग्राम में किए गये अपनी गद्दारी और देशद्रोही कुकृत्यों से इस देश की जनता का ध्यान भटका सकें ! इसके साथ ही इस देश के सैकड़ों प्रातःवंदनीय,पूजनीय इस देश को ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों के गुलामी में पिसते इस देश को स्वतंत्र कराने में स्वयं को कुरबानी दे देने वाले वीरों यथा शहीद-ए-आजम भगतसिंह,चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्ला खान,पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, सुखदेव,राजगुरु आदि के अकथ्य वीरोचित शहादत को अपमानित करने का अक्षम्य अपराध भी की है,एक आशय यह भी है कि उक्तवर्णित सभी स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों की कुर्बानी को इस देश को स्वतंत्र कराने में उनके योगदान को कमतर करके, येनकेनप्रकारेण उन्हें नेपथ्य में धकेल कर,उनकी छवि को धूमिल करके वर्तमानसमय के कुछ चंद पूजीपतियों के खैरख्वाह और समूची भारतीय आवाम को जीना मुहाल करनेवाले खलनायकों का यशोगान करने के अतिरिक्त कुछ नहीं है ।
अब जरा स्वतंत्रता आंदोलन के समय इन वर्तमानसमय के सत्ता के कर्णधारों के सबसे पूजनीय पुरूष स्वयंभू वीर सावरकर और इस देश के महान सपूत शहीद-ए-आजम भगतसिंह के अवदान को तुलनात्मक रूप से एक संक्षिप्त रूप से पुनर्चिंतन और स्मरण किया जाय। लंदन की एक ठंडी शाम को अक्टूबर 1906 की एक ठंडी शाम को चितपावन ब्राह्मण स्वंयभू कथित वीरसावरकर इंडिया हाउस के अपने कमरे में अपने एक गुजराती वैश्य मेहमान के स्वागत के लिए झींगे तल रहे थे,वे लोग दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर हो रहे अत्याचार से दुनिया का ध्यान आकृष्ट कराना चाह रहे थे,वे गुजराती वैश्य कोई और नहीं,अपितु मोहनदास करमचंद गांधी ही थे,जो उस समय तक बापू और महात्मा गांधी नहीं बन पाए थे ! सावरकर के कमरे पर आकर मोहनदास करमचंद गांधी सावरकर की तरफ मुखातिब होते हुए बोले कि ‘आप अंग्रेजों के ख़िलाफ़ जरूरत से ज्यादे आक्रामक हो ‘ इस पर सावरकर उन्हें बीच में काटते हुए बोले कि ‘चलिए पहले खाना खाइए ‘,लेकिन जब सावरकर ने मोहनदास को खाने की दावत दी तो मोहनदास ने ये कहते हुए सावरकर से माफी मांग ली कि ‘वो न तो गोश्त खाते हैं न मछली ‘ इस पर सावरकर ने गांधी का मजाक भी उड़ाया कि कोई कैसे बिना गोश्त खाए ब्रिटिशसाम्राज्यवाद को चुनौती दे सकता है ? उस रात मोहनदास करमचंद गांधी सावरकर के कमरे से अपने सत्याग्रह आंदोलन के लिए उनका समर्थन लिए बिना भूखे पेट ही लौट आए थे ‘ -साभार-बहुचर्चित पुस्तक- द आरएसएस-आइकॉन्स ऑफ द इंडियन राइट-लेखक-नीलांजल मुखोपाध्याय
कथित वीर सावरकर 1911में जब उसकी अल्प समय की क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों ने उन्हें अंडमान स्थित सेलुलर जेल भेजा तब वह अपनी 50 साल की जेल की सजा सुनकर बुरी तरह घबरा गया । वह जेल जीवन की शुरुआत में ही जेल से जल्दी रिहा करने के लिए अर्जी लगानी शुरू कर दिया। पहली बार सन् 1911 में,फिर सन् 1921 में और सन् 1924 में माफिनामें लिखा। माफीनामें के शब्दों का आशय यह था कि वह ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों से बहुत ही दीन-हीन भाषा में बार-बार विनती करता रहा कि ‘मुझे छोड़ दें तो मैं भारत की आजादी की लड़ाई को भी छोड़ दूँगा और उपनिवेशवादी ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों की सरकार के प्रति सदैव वफादार रहूँगा ‘अंग्रेजों से उसने कुल 6 बार माफी मांगकर अपनी सजा खतम कराकर जेल से बाहर आ गया और अपनी शेष जिंदगी खूब मजे में बिताया,अंग्रेजों से अपने माफीनामें में किए वादे के अनुसार,उनकी चापलूसी में,1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और संपूर्ण स्वतंत्रता आदोलन के खिलाफ काम करके बिताया। सन् 1947 तक अंग्रेजी सरकार से और बाद में कांग्रेसी सरकारों से हर माह आज की मुद्रा में लगभग 1 लाख पचास हजार पेंशन लेते रहा ! इस देश को सांप्रादायिक वैमनस्यता की आग में झोंकने के लिए हिन्दुत्व के सिद्धांत को जन्म देकर,भारत जैसे देश में सदियों से हिन्दू-मुस्लिम मेल-मिलाप और सामाजिक सौहार्दपूर्ण वातावरण में बिष घोलकर हिन्दू-मुस्लिम दंगे-फसाद का बीज बोया जो बहुत बाद में मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र के सिद्धांत का आधार बना !
आज यह बात बहुत स्पष्टता और दृढ़ता से कहना और लिखना तथा इस राष्ट्र राज्य के हर व्यक्ति को बताना बहुत जरूरी है कि वर्तमानसमय में भारत की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी और उसकी पितृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो आजकल फर्जी राष्ट्रवाद की चोंचलेबाजी और भोंडा प्रदर्शन करते रहते हैं,लेकिन इन भारतीय जनता पार्टी और उसकी पितृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वालों का इस देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कोई सकारात्मक भूमिका ही नहीं है,बल्कि उल्टा स्वतंत्रता संग्राम के समय इस देश को गुलामी की बेड़ियों में जकड़नेवाले,शोषकों ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों के साथ रहने और उनके खिलाफ तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने की लिखित में कसमें खाते रहे !
वैचारिक रूप से शहीद-ए-आजम भगतसिंह और माफीवीर सावरकर के विचार एक-दूसरे के धुरविरोधी हैं ! जहाँ सावरकर की विचारधारा इस समूचे राष्ट्र को सांप्रादायिक वैमनष्यता में झोंक देने के प्रति कृतसंकल्प लगती है,वहीं शहीद-ए-आजम भगतसिंह इस देश में सामाजिक सौहार्द,भाई-चारे, गरीबों-किसानों-मजदूरों व आमजन के हितचिंतक हैं। शहीद-ए-आजम भगतसिंह के द्वारा किए कामों से उनकी छवि एक गंभीर चिंतक,दार्शनिक,एक जनोन्मुखी लेखक तथा गुलामी से जकड़े इस देश को मुक्त कराने के लिए एक आत्मोत्सर्ग को उद्यत एक क्रांतिकारी के रूप में उभरती है ! उनका वैचारिक झुकाव निश्चित रूप से संपूर्ण समाज के दुःखों के निवारक राजनैतिक व्यवस्था मार्क्सवाद की तरफ था। रूस के मार्क्सवादी,बोल्शेविक क्रांतिकारी नेता ब्लादीमिर इल्यीच उल्यानोव लेनिन को वे अपना आदर्श मानते थे। लेनिन द्वारा रूस में की गई क्रांति को,जिसमें वहाँ के समाज के दुश्मन बने जार या राजा को सत्ताच्युत करके समाजवादी शासन व्यवस्था कायम करने के उनके महान व कालजयी काम को वे बिल्कुल सही मानते थे ।
शहीद-ए-आजम ने ब्रिटिशसाम्राज्यवादियों द्वारा भारत में अपने सबसे बड़े प्रतिनिधि के तौर पर नियुक्त वायसराय या गवर्नर जनरल के पद पर बैठे व्यक्ति के द्वारा स्थापित लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई के लिए बनाए गए एक विशेष न्यायाधिकरण या ट्रिब्यूनल के समक्ष अपने लिखित अपील में कहा था कि ‘जिसने 7 अक्टूबर 1930 को हमें फाँसी पर लटकाने का दण्ड सुनाया है उसने हमारे विरूद्ध सबसे बड़ा आरोप यह लगाया है कि हमने ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम के विरूद्ध युद्ध किया है,न्यायालय के निर्णय से यह बात पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है कि अंग्रेज जाति और भारतीय जनता के बीच एक युद्ध चल रहा है,दूसरी बात यह कि निश्चित रूप से हमने इस युद्ध में भाग लिया है,अतः हम इस युद्ध के युद्धबंदी हैं,ऐसा करके हमें सम्मानित ही किया गया है,हम नहीं समझते कि प्रत्यक्षरूप से ऐसी कोई लड़ाई छिड़ी हुई है,हम नहीं जानते कि युद्ध छिड़ने से न्यायालय का आशय क्या है ?हम यह कहना चाहते हैं कि यदि यह युद्ध छिड़ा हुआ है तो यह युद्ध तब तक चलेगा,जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों या किसी शक्तिशाली राष्ट्र द्वारा भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर कब्जा जमा रखा है,चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूँजीपति हों या सर्वथा भारतीय पूँजीपति या व्यक्ति क्यों न हों उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी रखी है,चाहे शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों के द्वारा निर्धन भारतीयों का खून चूसा जा रहा हो,तो भी इस स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता ! निकटभविष्य में अंतिम व निर्णायक युद्ध लड़ा जाएगा । साम्राज्यवाद व पूँजीवाद कुछ दिनों के मेहमान हैं। जहाँ तक हमारे भाग्य का संबंध है हम जोरदार शब्दों में आपसे कहना चाहते हैं कि आपने हमें फाँसी पर लटकाने का निर्णय किया है,आप ऐसा ही करेंगे क्योंकि आपके हाथों में शक्ति है,परन्तु इस प्रकार आप जिसकी लाठी उसकी भैंस वाले सिद्धांत को ही अमल में ला रहे हैं और आप उस पर कटिबद्ध हैं। हमारे अभियोग की सुनवाई इस बात को सिद्ध करने के लिए काफी पर्याप्त है कि हमने अब तक भी आपसे अपने प्राण बचाने के लिए किसी प्रकार की दया की प्रार्थना या अपील नहीं किए हैं। हम आपसे एक प्रार्थना करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरूद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग लगाया गया है। अतः इस आधार पर हम युद्धबंदी हैं। अतऐव इस आधार पर हम आपसे जोरदार माँग करते हैं कि हमारे साथ युद्धबंदियों जैसा ही व्यवहार किया जाय। हमें फाँसी के बदले गोली से उड़ा दिया जाए ‘ -भगत सिंह,दिनांक 20 मार्च 1931 ।
शहीद-ए-आजम की उक्तवर्णित बातों से यह परिलक्षित होता है कि वे भारत की संपूर्ण गरीब आवाम को क्रूर और शोषक ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों से ही नहीं अपितु भारतीय गरीब जनता को वे भारतीय पूँजीवादी शोषकों,सूदखोरों व धार्मिक परजीवियों से भी मुक्त कराना चाहते थे ! शहीद-ए-आजम भगत सिंह और माफीवीर सावरकर के बारे में उक्तवर्णित ऐतिहासिक महत्व के विवरणों और लिखित बयानों से यह बात पूर्णतः और दृढ़ता से साबित होती है कि यह देश शहीद-ए-आजम भगत सिंह और उनके जैसे रणबाँकुरों और इस देश के असली सपूतों के अकथ्य त्याग, बलिदान और आत्मोत्सर्ग की वजह से ही कथित कभी सूर्य अस्त न होनेवाले साम्राज्य के स्वामी ब्रिटिश-साम्राज्यवादियों को इस देश को छोड़कर अपने टापू सरीखे देश को भाग जाने पर मजबूर कर दिया । बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ धोबी के उस नील के गड्ढे में गिरे सियार से जरा भी ज्यादे नहीं हैं,जो उसके नील के गड्ढे में गिरकर नीला होकर जंगल का राजा सिंह बनने का भ्रम पाल लिया था। अब ये भ्रांति और भ्रम निश्चित रूप से दूर हो ही जाना चाहिए।
-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद, उप्र,





