बी शिवरामन
भारतीय अर्थव्यवस्था जिस वक़्त पहले ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के कारण डगमगा रही थी, उस वक़्त ट्रम्प का ईरान के खिलाफ़ युद्ध छेड़ देना इसपर दोहरी मार की तरह है। ईरान युद्ध का प्रभाव ट्रम्प द्वारा पहले थोपे गये टैरिफ़ के झटके से कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है। दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते भारत पर इसका कठोर असर पड़ने की सम्भावना ज़्यादा है।
इन दोहरे हमलों के कारण अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में रोज़गार पर पड़ने वाले असर का अधिक विस्तृत और ठोस अध्ययन सामने आने में समय लगेगा, क्योंकि यह प्रक्रिया अभी शुरुआती स्तर पर ही है। लेकिन अर्थशास्त्री और व्यापारिक लॉबी अभी से ही अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों में संभावित संकटग्रस्त रोज़गार की संख्या के अनुमान सामने रखने लगे हैं।
सबसे पहले हम पश्चिम एशिया के युद्ध के संभावित रोज़गार-प्रभाव का संक्षिप्त सार प्रस्तुत करेंगे। उसके बाद हम एआई के बढ़ते दख़ल के संभावित विनाशकारी प्रभाव की एक रूपरेखा पेश करने की कोशिश करेंगे।
पश्चिम एशिया संकट – मेहनतकश वर्ग पर प्रभाव
विदेश मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार केवल खाड़ी देशों (गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल—जीसीसी) में ही भारतीय प्रवासी कामगारों की संख्या लगभग 90 लाख है, और यदि पूरे पश्चिम एशियाई क्षेत्र को शामिल किया जाए तो यह संख्या आसानी से 1 करोड़ 20 लाख से अधिक हो जाती है। सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले वे ही हैं।
हज़ारों भारतीय मज़दूर लगातार गिरती मिसाइलों के बीच ज़ोखिम उठाते हुए हवाई अड्डों पर अपने देश वापस लौट पाने की उम्मीद में फँसे हुए हैं । इनमें से कईयों की तो मज़दूरी तक बकाया है।
इसके अतिरिक्त, ईरान युद्ध का सबसे तात्कालिक आर्थिक प्रभाव कच्चे तेल की क़ीमतों में इज़ाफ़े के रूप में सामने आया है। ईरान युद्ध शुरू होने से पहले कच्चे तेल की क़ीमत लगभग 65 से 70 डॉलर के बीच थी, और युद्ध शुरू होने के बाद यह बढ़कर तक़रीबन 90 डॉलर तक पहुँच गयी है, यानी लगभग 30 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी। नतीजतन भारत में अधिकांश वस्तुओं की ढुलाई (परिवहन) लागत बढ़ जाएगी।
2024 में भारत ने ईरान से केवल लगभग 1 अरब डॉलर मूल्य के पेट्रोलियम उत्पाद आयात किये थे, जो देखने में नगण्य लग सकता है, लेकिन पूरे पश्चिम एशियाई देशों से लगभग 99 अरब डॉलर के पेट्रोलियम उत्पाद आयात किये थे, जो अब बाधित हो गये हैं।
इससे भी महत्वपूर्ण मसला यह है कि भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 52% स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुज़रता है, जिसके ज़रिये परिवहन अब बन्द हो गया है। यदि खाड़ी से भारत आने वाले तेल टैंकरों को अरब प्रायद्वीप के चारों ओर का लम्बा रास्ता तय करते हुए लाल सागर और भूमध्य सागर से होकर अफ़्रीका के चारों ओर चक्कर लगाते हुए ‘केप ऑफ़ गुड होप’ को पार करना पड़े और फिर हिन्द महासागर से होकर भारत आना पड़े, तो परिवहन लागत में भारी वृद्धि होगी।
दूसरे शब्दों में कहें तो दूरी के लिहाज़ से, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर जाने वाला असल मार्ग लगभग 5000 किमी का था, जबकि यह नया घुमावदार मार्ग लगभग 8000 किमी का होगा, यानी दूरी में लगभग 60% की बढ़ोत्तरी। इसका सीधा अर्थ है कि भारत के लिए तेल परिवहन लागत में कम-से-कम 60% की वृद्धि होगी।
यदि पेट्रोल और डीज़ल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों की हैंडलिंग और देश के भीतर वितरण लागत को अलग रख दें, तो केवल शिपिंग ही भारत में ईंधन लागत का लगभग 40% हिस्सा होती है। इसका मतलब यह है कि उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में लगभग 25% तक की वृद्धि हो सकती है, जो बेहद महँगी और बोझिल होगी।
इसका व्यापक आर्थिक (मैक्रो-इकोनॉमिक) प्रभाव गम्भीर होगा। नीति आयोग के ट्रेड वॉच बुलेटिन के अप्रैल–जून (पहली तिमाही) अंक (पृष्ठ 37) के अनुसार:
“तेल की क़ीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के चालू खाते के घाटे (सीएडी) में जीडीपी के 0.5% तक की बढ़ोतरी होने का अनुमान है, जिससे मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ेगा और व्यापार संतुलन पर और अधिक दबाव पड़ेगा।”
भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रबंधक फरवरी 2026 के अन्त तक 728 अरब डॉलर के रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भण्डार के संचय पर अपनी पीठ थपथपा रहे थे। लेकिन अप्रैल–दिसम्बर 2025 के दौरान भारत का माल व्यापार घाटा लगभग 250 अरब डॉलर तक पहुँच गया था। 2026 में यह और बढ़ सकता है—एक ओर तेल आयात की बढ़ती लागत के कारण और दूसरी ओर पश्चिम एशिया को निर्यात में कमी के कारण।
दिखने में बेशक आरामदेह हो, लेकिन 1991 जैसी विदेशी मुद्रा संकट की स्थिति फिर से भारत के समक्ष खड़ी नज़र आ रही है।
जहाँ यह व्यापक आर्थिक (मैक्रो-इकोनॉमिक) प्रभाव है, वहीं विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव भी उतने ही हैरान करने वाले हैं।
भारत का परिवहन और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र 2 करोड़ 20 लाख से अधिक व्यक्तियों को रोज़गार देता है, जिसमें माल प्रबन्धन से लेकर वेयरहाउस संचालन तक के काम शामिल हैं। भारत की सड़कों पर लगभग 85 लाख ट्रक चलते हैं, और अनुमानतः कम-से-कम 90 लाख ट्रक चालक इस बढ़ते, उच्च-मूल्य माल परिवहन उद्योग के कारण रोज़गारशुदा हैं। परिवहन क्षेत्र में निजी परिवहन व्यवसाय सबसे अधिक प्रभावित होगा और कई मज़दूरों के रोज़गार छिन जाएँगे।
यहाँ तक कि वे क्षेत्र भी, जहाँ हाल के वर्षों में रोज़गार में बढ़ोत्तरी हुई है—जैसे ई-कॉमर्स के “डिलीवरी बॉय”—उनपर भी बुरा असर पड़ेगा।
दूसरी ओर, पूरा पश्चिम एशियाई क्षेत्र भारत का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है, जो भारत के निर्यात का लगभग 14% और आयात का लगभग 20% हिस्सेदार है, जिसमें आयात का अधिकांश भाग पेट्रोलियम उत्पादों का है। इस पूरे क्षेत्र के साथ परिवहन और व्यापार में व्यवधान के कारण भारत के कई ऐसे उद्योग, जो मुख्यतः इसी क्षेत्र को निर्यात पर निर्भर हैं, संकट का सामना करेंगे।
इनमें विशेष रूप से श्रम-प्रधान कपड़ा और परिधान उद्योग, रत्न और आभूषण, ऑटोमोबाइल और अन्य इंजीनियरिंग उत्पाद आदि शामिल हैं, और सबसे बढ़कर भारतीय कृषि भी प्रभावित होगी। यदि यह संकट लम्बा खिंचता है, तो इनमें से कई उद्योगों को बन्द करना पड़ सकता है, जिससे मज़दूर बेरोज़गार हो जाएँगे।
उल्लेखनीय है कि 2025 में पश्चिम एशिया भारत के कृषि और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात का 11.8 अरब डॉलर का हिस्सेदार था। पिछले वर्ष भारत के कुल कृषि और खाद्य निर्यात का 21.8% इसी क्षेत्र को गया, जिससे यह चावल, केले, मसाले, मांस और डेयरी जैसे कृषि उत्पादों के लिए देश के सबसे महत्वपूर्ण बाज़ारों में से एक बन गया। ज़ाहिर है पश्चिम एशिया का संकट भारतीय किसानों को भी गम्भीर रूप से प्रभावित करेगा।
इसके अलावा, भारतीय किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ेगी। भारतीय उर्वरक उद्योग मुख्य कच्चे माल के रूप में तेल और गैस का उपयोग करता है, और इनकी लागत में 25% की वृद्धि होने से उर्वरकों की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ेंगी। इससे किसानों पर कर्ज़ का बोझ और बढ़ेगा तथा ग्रामीण ऋणग्रस्तता और कृषि संकट और गहरा जाएगा।
अब हम संक्षेप में अर्थव्यवस्था के विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते दख़ल के कारण पड़ रहे मौजूदा और दुर्बलकारी प्रभाव की समीक्षा करेंगे।
भारत में व्हाइट-कॉलर और आईटी क्षेत्र की नौकरियों पर एआई का प्रभाव
2025 में कुल 54 लाख रोज़गार के साथ पिछले दो दशकों में आईटी क्षेत्र मुख्य विकास क्षेत्र और रोज़गार सृजन का प्रमुख स्रोत रहा है; रोजगार के मामले में इससे आगे केवल एमएसएमई क्षेत्र है, जिसमें लगभग 3 करोड़ नौकरियाँ हैं, और तेजी से बढ़ता ई-कॉमर्स क्षेत्र, जिसमें (गिग वर्करों के अलावा) लगभग 1.6 करोड़ नौकरियाँ हैं । इन दो क्षेत्रों में उपलब्ध अपेक्षाकृत कम-गुणवत्ता वाली नौकरियों के विपरीत, आईटी क्षेत्र की नौकरियाँ अपेक्षाकृत अधिक वेतन वाली होती हैं।
लेकिन एआई के विकास से आई स्वचालन प्रक्रिया के कारण भारत में आईटी क्षेत्र की कई श्रेणियों की नौकरियाँ—जैसे आईटी सेवाएँ और यहाँ तक कि प्रोग्राम डिवेलोपमेंट में कोडिंग का काम—कुछ रेटिंग एजेंसियों के अनुसार 2030 तक लगभग पूरी तरह ख़त्म हो सकते हैं।
1980 और 1990 के दशक में व्हाइट कॉलर नौकरियाँ “मध्यम वर्ग के रोज़गार” का आधार थीं, और पिछले दो दशकों में यह भूमिका आईटी क्षेत्र ने संभाल ली थी। लेकिन उद्योग विश्लेषकों के अनुसार, एआई के कारण व्हाइट कॉलर नौकरियाँ और आईटी क्षेत्र की नौकरियाँ—दोनों ही समाप्त हो सकती हैं। केवल आईटी क्षेत्र नहीं, एआई भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को भी पूरी तरह बदल देने वाला है।
भारत सरकार ने मौजूदा बजट में ख़ास तौर से विनिर्माण क्षेत्र में एआई को बढ़ावा देने के लिए 10,000 करोड़ रुपये निर्धारित किये हैं। नीति आयोग और औद्योगिक संगठनों द्वारा किये गये कुछ सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि आने वाले कुछ सालों में 75% विनिर्माण उद्योग किसी-न-किसी रूप में एआई को अपनाने की सम्भावना रखते हैं। इससे रोज़गार का बहुत बड़े स्तर पर विस्थापन होगा।
इकोनॉमिक टाइम्स में 31 जुलाई 2025 को प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारतीय विनिर्माण, खुदरा और शिक्षा क्षेत्रों में लगभग 80 लाख मज़दूर प्रभावित होंगे।
दरअसल, हम पहले ही रोज़ाना आईटी की बड़ी कम्पनियों में छंटनी की ख़बरें देख रहे हैं। महज़ पिछले एक सप्ताह में ही अमेज़न, ओरेकल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और सेल्सफोर्स जैसी बड़ी आईटी कम्पनियों ने नौकरियों में कटौती की घोषणा की। 13 फरवरी 2026 की टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के पहले 40 दिनों में भारत की 27 आईटी कम्पनियों ने 30,000 नौकरियाँ ख़त्म कर दीं। यह 2025 में हुए 1,23,000 आईटी नौकरियों के नुकसान के अतिरिक्त है।
जगह की सीमा के कारण हम इन छँटनियों के व्यापक परिणामों पर अधिक विस्तार से चर्चा नहीं कर रहे हैं और केवल पश्चिम एशिया संकट तथा एआई के कारण आने वाले रोज़गार प्रभावों के इस सामान्य अवलोकन तक सीमित रख रहे हैं।
कुछ व्यावसायिक अखबार यह कहकर राहत की साँस ले रहे हैं कि इन दो घटनाओं के कारण होने वाला रोज़गार प्रभाव कोविड संकट के दौरान झेले गये प्रभाव जितना गम्भीर नहीं होगा। कुल प्रभावित नौकरियों की संख्या के लिहाज़ से यह बात सही हो सकती है, लेकिन कोविड संकट मौसमी और अस्थायी था, जबकि एआई और पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न संकट अपेक्षाकृत लम्बे समय तक रहने वाले हैं और इनका प्रभाव स्थायी हो सकता है।
सरकार की प्रतिक्रिया
जैसा कि अक्सर होता है, मोदी भारतीय मज़दूर वर्ग पर मंडरा रहे इन बड़े रोज़गार संकटों पर मुँह नहीं खोलेंगे। अब तक उनकी सरकार को इन संकटों का सामना करने के लिए कोई नीतिगत प्रतिक्रिया पेश करनी चाहिए थी। क़ानूनी तौर पर नौकरी जाने पर मूल वेतन के 50% + महँगाई भत्ता + सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए 15 दिनों की मज़दूरी के बराबर मुआवज़ा दिया जाना चाहिए, लेकिन भारत में इसका शायद ही कभी पालन होता है।
हज़ारों आईटी कर्मचारियों को तथाकथित “गोल्डन हैंडशेक” देकर विदा किया जा रहा है, जिसमें कई बार एक महीने का वेतन भी सेवरेंस पे के रूप में नहीं दिया जाता। क़ानूनी तंत्र जानबूझकर निष्क्रिय बना रहता है। कई राज्यों में जहाँ ट्रेड यूनियन आन्दोलन मज़बूत नहीं है, वहाँ एमएसएमई क्षेत्र में वैधानिक मुआवज़ा जैसे सुनने में भी नहीं आता। नई श्रम संहिताएँ (लेबर कोड्स) भी मज़दूर वर्ग के सामने आने वाली इस तरह की व्यापक आपात स्थितियों को स्वीकार तक नहीं करतीं।
भारत के मज़दूर वर्ग के ऊपर भारी पैमाने पर छँटनी के काले साये मंडरा रहे हैं। उम्मीद है कि यह संकट भारत में अपेक्षाकृत निष्क्रिय पड़े ट्रेड यूनियन आन्दोलन को भी संयुक्त प्रतिरोध के माध्यम से फिर से सक्रिय करने में सक्षम बनेगा।
(लेखक शोधकर्ता और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं। अनुवाद : वृषाली श्रुति)






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