अग्नि आलोक
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*और क्या कहा जाए?*

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी ने मिलते ही प्रख्यात व्यंग्यकार स्व.शरद जोशीजी के लिखे व्यंग्य का अंश सुनाया।
व्यंग्य का शीर्षक है,हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे शरद जोशी लिखते हैं।
देश के आर्थिक नन्दन कानन में कैसी क्यारियाँ पनपी-सँवरी हैं भ्रष्टाचार की, दिन-दूनी रात चौगुनी। कितनी डाल कितने पत्ते, कितने फूल और लुक छिपकर आती कैसी मदमाती सुगन्ध। यह मिट्टी बड़ी उर्वरा है, शस्य श्यामल, काले करमों के लिए।
लगभग चार से पांच दशक पूर्व लिखा लेख आज भी प्रासंगिक है।
अमूल्य कीमत चुकाने के बाद मिली आजादी के बाद यदि किसी व्यंग्यकार को भ्रष्टाचार के विरुद्ध व्यंग्य लिखने के लिए बाध्य होना पड़े इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है?
आज तो सिर्फ ना तो खुद खाने और ना दूसरों को खाने देने के स्लोगन का उच्चारण कर अपने कर्तव्य इतिश्री समझना फैशन हो गया है।
इस संदर्भ में शरद जोशीजी के व्यंग्य का यह पैरा भी प्रासंगिक है।
पूरी धरती पर छा गए,काले व्यवसाय के बादल। भ्रष्ट अफसर खरीदता है, खेत यानी फा़र्म, जिसे जुतवाता है कृषि विभाग का असिस्टेंट, ट्रेक्टर कम्पनी के एजेंट से कहकर, जहाँ लगता है मुफ्त पम्प और प्यासी धरती पीती है रिश्वतों का पानी, देती है गेहूँ जो बिकता है काले बाजार में। सारे सागर की मसी करें और सारी जमीन का कागज फिर भी भ्रष्टाचार का भारतीय महाकाव्य अलिखित ही रहेगा। कैसी प्रसन्न बैठी है काली लछमी प्रशासन के फाइलोंवाले कमलपत्र पर। उद्योगों के हाथी डुला रहे हैं चँवर। चरणों में झुके हैं दुकानदार, ठेकेदार, सरकार को माल सप्लाई करने वाले नम्र, मधुर, सज्जन लोग। पहली सतह जो हो, दूसरी सतह सुनहरी है। बाथरूम में सोना दाब विदेशी साबुन से देशी मैल छुड़ाते सम्भ्रान्त लोग राय रखते हैं खास पॉलिटिक्स में, बहुत खुल कर बात करते हैं पक्ष और प्रतिपक्ष से। जनाब जब तक गौरमेंट कड़ा कदम नहीं उठाती, कुछ नहीं होगा। देख नहीं रहे करप्शन कितना बढ़ रहा है। आप कुछ लेगें, शैम्पेन वगै़रह। प्लीज तकल्लुफ नहीं, नो फॉर्मेलिटी
सीतारामजी का पूरा वक्तव्य सुनकर मैंने कहा, माना की आप व्यंग्यकार हो और आपने शरद जोशीजी के व्यंग्य के अंश पढ़कर सुनाए। लेकिन एक बात समझना चाहिए,सन 2014 के बाद तो कोई भी किसी किस्म का भ्रष्टाचार हुआ ही नहीं? होना संभव भी नहीं है? कारण एक सशक्त सरकार देश को मिली है?
सीतारामजी ने मेरे कहने का आशय समझकर, मुझे जवाब दिया, सन 2014 के पूर्व वाशिंग मशीन में सिर्फ कपड़े ही धुलते थे?
यह कहते हुए सीतारामजी ने मुझे दो शेर सुना दिए।
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे ए’तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया इस शेर के शायर हैं दाग़ देहलवी
शायर अख़्तर शीरानी यह शेर भी मौजू है।
इन वफ़ादारी के वादों को इलाही क्या हुआ
वो वफ़ाएँ करने वाले बेवफ़ा क्यूँ हो गए
(इलाही का अनुवाद भगवान,ईश्वर होता है)
अंत में इस कहावत को भी अनिवार्य रूप से याद रखना चाहिए।
हाथी के दांत दिखाने के अलग और खाने के अलग, होते हैं।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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