अग्नि आलोक
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किस भ्रम में हो जी?

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 महेन्द्र सिंघ नायक

आपको क्या लगता है अग्निपथ/अग्निवीर पर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन के बाद अगले चुनाव में भाजपा हारेगी? 

यदि ऐसा सोचते हो तो आप गलत हो। 

2023 के राज्य विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों में अभी से कहीं ज्यादा सीटों पर भाजपा जीतेगी। 

जानते हैं वोट कौन देगा? 

यही विरोध कर रहे युवा और इनके परिजन देंगे। 

हाल की विद्रोही गतिविधि तत्काल की परिस्थितियों पर क्रिया की प्रतिक्रिया मात्र है, इसे आप समग्र परिवर्तन की लहर नहीं कह सकते।

यह हवा के दबाव से पानी में उठी छोटी से लहर है जो या तो पानी में ही गुम हो जायेगी, या किनारे से टकराकर खत्म हो जायेगी। 

किनारा कितना मजबूत है इसका अन्दाज़ा तो सभी को है। किनारे पर धर्म, जात, सम्पन्नता, अतीत का गौरव के बड़े बड़े पत्थर हैं। 

तो जो भी लहर उठनी है, इस किनारे से टकराकर किनारे की ही हो जानी है। किनारे से टकराकर लौटते समय उसका रूप रंग, विचार सब किनारे जैसा होना ही है। 

नोटबंदी, जीएसटी, निजीकरण, बेरोजगारी, महँगाई, बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर लहरें नहीं सिर्फ बुलबुले उठे और फूटकर अपने आप खत्म भी हो गये। 

नागरिकता कानून पर पहली बार लहर तो उठी पर उसे एक वर्ग विशेष का साबित कर ऐसे समेट दिया गया जैसे वो कभी थी ही नहीं। 

दूसरी लहर विवादित कृषि कानूनों पर उठी जो एक साल से ज्यादा रही। ऐसा लगा कि सम्पूर्ण परिवर्तन की क्रांति हो गई हो। पर 6-7 सौ किसानों के बलिदान लिया बदलाव वाला आन्दोलन सिर्फ कानून लागू न करने की शर्त पर खत्म हो गया। कहाँ तो इससे बदलाव की आस लगाए हुये थे। इतने बड़े आन्दोलन को पूरे देश ने समर्थन दिया था। 

पर उसके बाद क्या हुआ? 

तत्काल बाद हुये उत्तर प्रदेश विधान चुनाव में भाजपा को दोबारा पूरा बहुमत मिला। किसान आन्दोलन की धुरी पश्चिमी उत्तरप्रदेश में ही बदलाव न हो सका। इसका सीधा मतलब है कि किसान और उनके परिजनों ने ही भाजपा को वोट दिया होगा। 

भाजपा जैसी भी है पर इस उपमहाद्वीप के राजनैतिक मनोविज्ञान को बेहतर समझती है। वो यहाँ की जनता की रोटी, कपड़ा, मकान से भी बड़ी मौलिक जरूरतों जाति, धर्म, बड़प्पन, अतीत के गुमान को समझती है और उसका तुष्टिकरण करती है। 

भाजपा ने समझ लिया है कि भूखे-प्यासे को पानी नहीं धर्म चाहिए, बीमार को दवा नहीं जाति का गौरव चाहिए, बेरोजगार को आय नहीं पड़ोसी का विनाश चाहिए। 

तो समय-समय पर उठने वाले आन्दोलन क्या भाजपा के नुकसानदायक होते हैं? 

बिल्कुल नहीं! उल्टा उसके लिए फायदेमंद होते हैं। 

क्योंकि ये आन्दोलन भाजपा के लिए प्रेशर की सीटी हैं। 

कैसे? 

प्रेशर कुकर में दाब के आधार पर ही भोजन पकता है। पर यदि दाब अधिक हो जाये तो कुकर फट जायेगा, इसलिए दाब को समय-समय पर निकालने के लिए प्रेशर कुकर में सीटी यानी प्रेशर रिलीज़ वेंट लगाया जाता है। जब कभी दाब बढ़ता है, सीटी खुल जाती है और प्रेशर कंट्रोल हो जाता है। 

भाजपा को लम्बे समय तक राज करना है, और फायदा भी कमाना है। इसलिए चुनावों से काफी पहले विवादित कानून, मुद्दे जनता पर थोप देती है। जनता ने शाँति से अपनाया तो सीधा फायदा। यदि जनता विरोध में हुई तो उसे उग्रता के चरम पर पहुँचाकर तो बड़ी कलात्मकता से पानी डालकर ठंडा कर देती है। जनता एक बार फिर भाजपा के सकारात्मक निर्णय पर लहालोट होकर दोगुना वोट देती है। 

    ऐसे में चुनावों पर बदलाव का कारण बनने वाला प्रेशर पहले ही रिलीज़ कर दिया जाता है। 

तो इस अग्निवीर/अग्निपथ विरोध का अंजाम भी यही होगा। युवा चार दिन चिल्लपों मचायेंगे, सरकार पाँचवे दिन रद्द करके सबका मन फिर जीत लेगी। 

और अगर ये रद्द किये बिना ही चुप हो गये तो सीधा फायदा है ही। 

सावन में यही युवा कांवड़ टांगकर नारे लगाते मिलेंगे, यही नहीं चुनावों में हर हर घर घर करके वोट देंगे और दिलायेंगे। 

याद रखिये सिराजुद्दौला के अन्त 1757 से शुरू हुई गुलामी को भारत छोड़ो आन्दोलन तक जनता को समझाने में 185 साल लगे थे। हजारों ने जान दी, हजारों जेल में सड़े तब कहीं जनता को बदलाव तक लाया जा सका था। 

अभी तो आठ ही साल हुये हैं।

📝 महेन्द्र सिंघ नायक

Ramswaroop Mantri

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