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*क्या हैआत्मसिद्धि* 

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    ~ सोनी कुमारी, वाराणसी

पहले यह समझो कि आत्मसिद्धि (self-actualization) से क्या तात्पर्य है।

ए. एच. मैसलो (A.H. Maslow) ने यह शब्द प्रयोग किया है — “Self-actualization”।

मनुष्य संभावनाओं के साथ जन्म लेता है।

मनुष्य जन्म से पूर्ण नहीं होता, वह केवल एक संभावना लेकर आता है।

वह क्या बन सकता है, यह उसके भीतर छिपा होता है — लेकिन यह जरूरी नहीं कि वह बने ही।

संभावना को पूर्णता देना तुम्हारे हाथ में है — प्रकृति इसे तुम पर थोपती नहीं।

तुम स्वतंत्र हो — चाहो तो अपने बीज को वृक्ष बना लो, चाहो तो नहीं।

हर मनुष्य बीज रूप में जन्म लेता है —

कोई भी पूर्ण नहीं जन्म लेता, केवल पूर्ण होने की संभावना के साथ आता है।

अगर ऐसा है — और ऐसा ही है — तो आत्मसिद्धि एक मौलिक आवश्यकता बन जाती है।

क्योंकि जब तक तुम अपने बीज को वृक्ष न बना लो, जब तक तुम वह न बनो जो तुम हो सकते हो,

जब तक तुम अपनी नियति को न छू लो — तब तक तुम्हारे भीतर कोई अधूरापन बना रहेगा।

हर व्यक्ति महसूस करता है कि “कुछ तो छूटा है, कुछ तो अधूरा है।”

और यह अधूरापन धन, पद, प्रतिष्ठा से नहीं जुड़ा हुआ होता।

बाहर से सब कुछ मिलने के बावजूद भी वह अधूरापन बना रहता है — क्योंकि यह भीतर से आता है।

जब तक तुम्हारी चेतना विकसित नहीं होती, जब तक भीतर फूल नहीं खिलता,

जब तक यह अनुभव नहीं होता कि “मैं वही बन गया जो बनने योग्य था,” तब तक वह अपूर्णता बनी रहती है।

और इसे किसी और चीज़ से मिटाया नहीं जा सकता।

आत्मसिद्धि का अर्थ है —

तुमने अपनी समस्त संभावनाओं को साकार कर लिया है।

तुम बीज थे — अब फूल बन गए हो, वृक्ष बन गए हो।

अब तुम जीवन की उस चोटी को छूते हो, जहां केवल आनंद, प्रेम और मौन है।

मैसलो ने एक और शब्द दिया है — “

जब कोई व्यक्ति आत्मसिद्ध होता है, वह चरम अनुभवों को प्राप्त करता है।

फिर उसे किसी चीज़ की मांग नहीं रहती — वह जो है, उसमें पूर्णतया संतुष्ट होता है।

कोई इच्छा नहीं, कोई आकांक्षा नहीं — केवल एक मौन आनंद का प्रवाह।

सिर्फ होना ही आनंदमय हो जाता है।

फिर यह आनंद बाहर से नहीं आता, यह भीतर की परिपक्वता से उपजता है।

एक बुद्ध आत्मसिद्ध व्यक्ति होता है।

इसीलिए हम बुद्ध या महावीर को फूले हुए कमल के फूल पर बैठा हुआ दिखाते हैं।

वह कमल भीतर की पूर्णता का प्रतीक है।

जब कोई भीतर खिलता है, तो उसकी उपस्थिति में भी एक मौन प्रकाश, एक अनुभव का वातावरण होता है।

जो भी उनके सान्निध्य में आता है, वह स्वयं भी भीतर कुछ खिलता हुआ महसूस करता है।

महावीर की एक सुंदर कथा है —

कहते हैं कि जब महावीर चलते थे तो 24 मील के दायरे में फूल खिल जाते थे,

चाहे मौसम न भी हो।

यह एक प्रतीक है — कि महावीर की ऊर्जा से उनके आसपास भी खिलाव की तरंग फैलती थी।

जो तैयार नहीं भी होता था, उसके भीतर भी कुछ झलकने लगता था।

यह है आत्मसिद्धि की शक्ति।

तो हाँ, आत्मसिद्धि मनुष्य की सबसे मौलिक आवश्यकता है।

और जब मैं कहता हूँ ‘मौलिक’, तो मेरा आशय है —

अगर बाकी सब कुछ मिल भी जाए लेकिन आत्मसिद्धि नहीं हुई,

तो व्यक्ति अधूरा ही रहेगा।

लेकिन अगर आत्मसिद्धि हो जाए और कुछ और न मिले,

तो भी पूर्णता का अनुभव होगा।

इसीलिए बुद्ध भिक्षु होकर भी सम्राटों से बड़े थे।

Ramswaroop Mantri

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