डॉ. विकास मानव
_दुःख से मुक्ति दुःख क़ो जाने बिना संभव नहीं :_⬛️यह दुःख है…!
दुःख मूलतः तीन प्रकार के होते हैं :
1) स्थूल दुःख :
ऐसा स्थूल दुःख जो स्वतः स्पष्ट है, प्रत्यक्ष है; जिसका दर्शन करने में किसी को कहीं कोई कठिनाई नहीं होती। जैसे किसी को चोट लग जाय और वह पीड़ा से कराह उठे, किसी का कोई प्यारा मर जाय और वह पीड़ा से कराह उठे, किसी के पास खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न भी न हो, पीने के लिए दो बूंट पानी भी न हो, ओढ़ने के लिए दो हाथ वस्त्र भी न हो, सिर छिपाने के लिए दो गज छप्पर भी न हो, रोग दूर करने केलिए दो खुराक दवा भी न हो, इस प्रकार अभाव का मारा कोई व्यक्ति पीड़ा से कराह उठे तो यह दुक्ख-दुःख ही है। यानी प्रत्यक्ष दुःख ही है, स्थूल दुःख ही है।
2) विपरिणाम दुःख :
विपरिणाम माने परिवर्तन, ऐसा दुःख जो प्रकृति के परिवर्तनशील स्वभाव के कारण आता ही रहता है। भले ही हम उसे ठीक समय पर देख न पाएं, समझ न पाएं, पहचान न पायें।
अक्सर यही होता है कि जब हम किसी ऐन्द्रिय सुख के उल्लास में डूबे होते हैं तब उस समय यह समझ भी नहीं पाते कि यह सुख अनित्य है, अस्थायी है, देर-सबेर बदल जाने ही वाला है।
कभी बौद्धिक स्तर पर इस सच्चाई को मान भी लें तो भी व्यावहारिक क्षेत्र में कोई अन्तर नहीं पड़ता और इसीलिए उस सुख में इस कदर डूब जाते हैं। परंतु समय पाकर परिस्थितियां बदल जाती हैं, अनुकूल स्थिति सर्वथा प्रतिकूल बन जाती है। मनचाही सर्वथा अनचाही बन जाती हैं तो वही सुख दुःख में पलट जाता है और परिणाम स्वरूप रोना आता है।
किसी भी सुखद स्थिति के प्रति यह जो हमारा अंधा चिपकाव है, यही हमारे लिए बड़ा भयंकर दुःख है। सुखद अवस्था में यह चिपकावरूपी दुःख हमें प्रत्यक्ष दीखता नहीं। सुख के गर्भ में यह जो दुःख का बीज समाया हुआ है, यह प्रत्यक्ष नहीं है, परोक्ष है, अपने चेहरे पर सुख का घूंघट डाले हुए है। हमें बार-बार यह अवगुंठन, यह घूंघट, यह पर्दा ही दीखता है; इस नकाब के पीछे छिपा हुआ दुःख का वास्तविक चेहरा हम देख ही नहीं पाते।
हर सुखद स्थिति में छिपे हुए इस विपरिणामरूपी दुःख का दर्शन करते रहें तो प्रथम आर्य-सत्य का दर्शन करते रहें। हर अनुकूल परिस्थिति के समय उनके बदल जाने की सच्चाई भी हमारी आंखों के सामने रहे तो हम जीवन के कठोर सत्य का सही दर्शन करने वाले बने रहे।
दो भाइयों में बड़ा गहरा प्यार है। पति-पत्नी दृढ़ प्रेम-श्रृंखला में बँधे हुए हैं। दो मित्रों की एक दांत से टूटती है लेकिन समय बदलता है – किसी के चुगली खा देने पर, किसी से सचमुच कोई भूल हो जाने पर, विचारों में गहरा मतभेद हो जाने पर अथवा निजी स्वार्थों में टकराव होने लगने पर दोनों का प्यार, दोनों का प्रणय, दोनों का स्नेह-संबंध टूक-टूक हो जाता है।
सहोदर भाई तोते की तरह आंखे बदल लेता है, वफादार पत्नी बेवफाई का बर्ताव करने लगती है, प्यार के तराने गाने वाला पति घृणाभरी झिड़कियां सुनाने लगता है, आज्ञाकारी पुत्र अवहेलना व तिरस्कार का रुख अपना लेता है, परम हितैषी अंतरंग मित्र पग-पग पर धोखा देने लगता है। जिनके सौहार्द की लोग चर्चा किया करते थे, उन्हें अब इस प्रकार कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ते देखकर तालियां पीटी जाती हैं।
कोई व्यक्ति बहुत बडी धन-संपदा का अधिपति बन जाता है, बड़े-बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों का मालिक, हजारों कामगारों पर हुकूमत चलाता है, लक्ष्मीपति होने के कारण समाज की विभिन्न संस्थाओं में गौरवमय पद प्राप्त करता है। राज्य की ओर से उपाधियां प्राप्त करता है, प्रतिष्ठित होता है। कोई एक
व्यक्ति किसी देश का एक-छत्र शासक बन जाता है। सार्वभौम प्रभुसत्ताधारी!
उसकी जुबान ही देश का कानून बन जाती है। दोनों व्यक्ति अपनी-अपनी प्रभुता के मद में चूर रहते हैं। उन्हें यह भान भी नहीं रहता कि यह सब कुछ पलट जायगा। परंतु समय आता है तो सब कुछ पलट ही जाता है; बड़े से बड़ा धनकुबेर
दर-दर का भिखारी बन जाता है। कल तक जिसकी नाकों से प्रभुसत्ता के मद का धुंआ निकला करता था, वह आज दीन-हीन होकर औरों के सामने गिड़गिड़ाता और दया की भीख मांगता नजर आता है।
किसी का प्यार टूटता है, किसी का स्नेह-संबंध विच्छेद होता है, किसी की मैत्री भंग होती है, किसी का धन-वैभव नष्ट होता है, किसी की प्रभुसत्ता मटियामेट होती है तो वह असीम पीड़ा का ही अनुभव करता है यही विपरिणाम दुःख है, यही परिवर्तनशीलता का दुःख है, यही अप्रत्यक्ष दुःख है, परोक्ष दुःख है, छिपा हुआ सूक्ष्म दुःख है, जो कि प्यार की रंगरेलियों के समय हमें प्रत्यक्ष नहीं दीखता, जो कि प्रभुसत्ता के मदहोश माहौल में हमें साफ नजर नहीं आता।
आसक्ति से भरे हुए प्यार के समय और धनसत्ता या राजसत्ता की मादकता के समय यदि हमें यह विपरिणाम दुःख दीखता रहे तो हम उस स्थिति से मदांध ही नहीं हो पायें।
प्रकृति के विपरिणाम स्वभाव को न समझना ही अपने आप में एक बड़ा दुःख है। कालचक्र की परिवर्तनशील गति को न समझना ही अपने आप में एक बड़ा दुःख है। कोई भी स्थिति सदा एक जैसी नहीं रह सकती, यह सच्चाई हमारी आंखों से ओझल रहती है, इसीलिए हम जिस किसी स्थिति में उलझ जायँ, उसी में गहरे डूब जाते हैं, चाहे वह सुखद हो अथवा दुःखद। उस समय तो उसे हम नित्य शाश्वत, ध्रुव मानकर ही जीवन व्यवहार करने लगते हैं; जब सुख आता है तो उसमें इतने पागल हो जाते हैं मानों हम इसे सदा इसी प्रकार भोगते रहेंगे।
इसी प्रकार जब दुःख आता है तब हम इस कदर आकुल-व्याकुल हो उठते हैं मानों यह सदा ऐसा ही बना रहेगा। विपरिणाम धर्म की सच्चाई को भली प्रकार न समझने के कारण ही पहली अवस्था में हम अपने भविष्य के लिए बड़ा गहरा दुःख तैयार करने में लग जाते हैं और दूसरी अवस्था में अपने वर्तमान दुःख को कई गुना अधिक संवर्धित करने में लग जाते हैं। दोनों ही अवस्था में दुःख का पोषण करते हैं; यही विपरिणाम है।
3)संस्कार-दुःख :
संस्कार माने चित्त की चेतना से उत्पन्न होने वाले सारे कर्म और उन कर्मों से उत्पन्न होने वाली सारी वस्तुएं, सारे व्यक्ति, सारी स्थितियां; संस्कारजन्य कर्मों के फलों से हमारा कहीं छुटकारा नहीं।
चाहे समुद्र की तह में चले जायँ, चाहे पर्वत की गुहाओं में जा छिपें, चाहे अंतरिक्ष की विशालता में खो जाना चाहें, परंतु संस्कारजन्य कर्म-फल तो जहां जायँ जहां जन्में, इस जीवनधारा के साथ लगे ही रहेंगे। संस्कार-दुःख के अंतर्गत एक प्रकार से सारे दुःख आ गए। जो कुछ भी, किन्हीं कारणों से उत्पन्न होता हैं, वह संस्कार के अंतर्गत ही आता है और जो कारणों से उत्पन्न होता है, उसमें परिवर्तन आते रहना निश्चित है।
अत्यंत सूक्ष्म अवस्था में यह परिवर्तन सर्वदा आ ही रहे हैं। इन्हीं संस्कारजन्य परिर्वतनों के कारण चित्त और शरीर की मिली-जुली यह जीवनधारा प्रतिक्षण प्रवहमान रहती है। मरने के बाद भी मृत शरीर एक ओर विशृंखलित होते रहता है, दूसरी ओर चित्तधारा इस मृत शरीर से च्युत होकर किसी नए शरीरस्कंध से जा जुड़ती है और उसके निर्माण में सहयोग देती है तथा उसके साथ एक नया जीवन-प्रवाह आरंभ कर देती है।
इस प्रकार एक के बाद एक जीवनधारा का प्रवाह अबाधरूप से चलता ही रहता है; एक क्षण केलिए भी विश्राम करने की, शांत होकर रुक जाने की कोई संभावना ही नहीं है। मानों सब कुछ किसी ऐसे भयंकर चक्रवात में उद्वेलित हो उठा है, जो कहीं रुकने का नाम भी नहीं लेता।
जीवन-प्रवाह की यह निर्वाध बेचैनी बहुत सूक्ष्मता से ही समझी जा सकती है, दुःख दुःख तो बड़ी आसानी से समझा जा सकता है; विपरिणाम दुःख सामान्य चिंतन-मनन द्वारा समझा जा सकता है। परंतु संस्कारजन्य दुःख को समझने-जानने के लिए सच्चाई की अतल गहराइयों में उतरना पड़ता है। अतः यह दुःख तीनों प्रकार के दुःखों में सबसे अधिक सूक्ष्म है।
जब हम ध्यान साधना करते हुए अंतर्मुखी होकर आत्म-निरीक्षण की गहराइयों में उतरते हैं तब तीनों ही प्रकार के दुःखों का साक्षात्कार होता है।
सर्वप्रथम शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में स्थूल-स्थूल पीड़ा का, भारीपन का, गर्मी का, तनाव का, खिंचाव आदि का जो दुःख-दर्शन होता है, वह प्रथम श्रेणी का दुक्ख-दुःख ही है।
धीरे-धीरे यह दुःखद संवेदना दूर होती जाती है, शरीर में हल्कापन आता है, शीतलता की अनुभूति होती है, तन और मन सुखद संवेदना के पुलकरोमांच से सिहर उठता है, विपश्यना का साधक सावधान हो तो उसके विपरिणाम स्वभाव को देखता-समझता है; उस सुख में भी दुःख का बीज उसे स्पष्ट दीखता है। गहरे से गहरे ध्यान का आनंद भी उसे आसक्त नहीं कर सकता ।
वह जानता रहता है कि अनित्य सुख के प्रति बँध जाना ही तो विपरिणाम दुःख है। तदनन्तर साधक और गहराइयों में उतर कर भवंग प्रवाह का दर्शन कर, दुःख-सूक्ष्मतम संस्कार-दुःख का भी साक्षात्कार करता है। इस प्रकार दुःख के स्थूल, सूक्ष्म, सूक्ष्मतम तीनों स्वरूपों का स्वयं साक्षात्कार कर लेता है और यों -निरोध की ओर बढ़ने का मार्ग प्रशस्त कर लेता है।
परंतु कोई-कोई व्यक्ति दुःख-दर्शन की इस सच्चाई से घबराते हैं, वे तर्क करते हैं ‘यह सारा दृष्टिकोण ही गलत है। हम जीवन के कृष्ण पक्ष पर ही इतना जोर क्यों दें? क्यों न शुक्ल पक्ष को पूरा महत्त्व दें, जिससे कि सुख के नजदीक पहुँचें।
यदि मन में किसी बात का चिंतन करना ही है, किसी कल्पना का रंग चढ़ाना ही है तो सुखद कल्पना का रंग क्यों न चढ़ाएं? क्यों न अपने आपको सुखी मान कर अपरिमित आनंद ही आनंद की कल्पना करते रहें?
दुःख-दर्शन ऋणात्मक दृष्टिकोण है, निषेधात्मक (निगेटिव) दृष्टिकोण है, जबकि सुख का चिंतन ही धनात्मक दृष्टिकोण है, विधेयात्मक (पोजिटिव) दृष्टिकोण है।” सुनने में यह बात बड़ी तर्कसंगत लगती है परंतु वास्तविकता इससे परे है।
यदि सुख के चिंतन मात्र से, सुख की कोरी कल्पना में मन को लपेट लेने मात्र से हमें वास्तविक सुख प्राप्त हो जाय तो हमें इन लोगों के इस सुझाव को अवश्य ग्रहण कर लेना चाहिए। परंतु ऐसा तो होता नहीं; किसी के सिर के बालों में अथवा कपड़ों में आग लग जाय और वह लगे इस बात की कल्पना करने कि मैं आग से जल नहीं रहा हूं, मैं बड़ा सुखी हूं, बड़ा शांत हूं, शीतल हूं तो उसकी यह सुखद कल्पना उसे आग से जलने की पीड़ा से मुक्त नहीं कर सकती।
यदि उसे सचमुच पीड़ा-मुक्त होना है तो सच्चाई का दर्शन करना होगा, सच्चाई को स्वीकार करना होगा। जलती हुई आग को देख समझकर शीघ्र से शीघ्र उसे बुझाने का हर संभव प्रयत्न करना होगा। समस्या के समाधान के लिए समस्या से पलायन नहीं किया जाता। समस्या का डटकर सामना करना होता है, उसकी गहराइयों में उतरना होता है, समस्या की गहराइयों में ही समस्या का रहस्य समाया होता है, समस्या का समाधान समाया होता है, दुःख की गहराइयों में ही दुःख का कारण समाया होता है दुःख का निवारण समाया होता है।
अतः दुःख से पलायन न करें, उससे दूर न भागें, उससे मुख न मोड़ें। किसी छलना या भुलावे में पड़कर उससे छुटकारा नहीं पा सकते, किसी प्रकार के आत्म-सम्मोहन द्वारा उससे मुक्त नहीं हो सकते, दुःख का सामना करने के लिए गहराइयों से दुःख का सम्यक दर्शन करना ही होगा।
हम यह नहीं कहना चाहते कि व्यवहार जगत में सुख के लिए कहीं कोई स्थान है ही नहीं। हम नहीं कहना चाहते कि जब सुख आए तब भी उसे दुःख मानकर व्याकुल व्यथित रहने लगे। लेकिन जो व्यक्ति सुख सत्ता को भोगते हुए उसमें लिप्त-लुब्ध नहीं हो जाता, उसके अनित्य स्वभाव को समझता हुआ, उसके भीतर समाए हुए विपरिणाम दुःख को जानता रहता है, वह जीवन जगत की सच्चाई का दर्शन करता है और इस प्रकार अपने आपको भविष्य में आने वाली दुख की घोर पीड़ाओं से बचाता है।
विपरिणाम दुःख का दर्शन उसे इस योग्य बनाता है कि जीवन में जब कभी परिवर्तन आए, कभी कोई अपना मुंह मोड़ ले, कोई अपनी आंखे तरेर ले, कोई दुश्मनों का सा व्यवहार करने लगे, कभी जीवन का समस्त विलास वैभव नष्ट हो जाय, कभी जीवन की सारी ऐश्वर्य प्रभुता छिन्न-भिन्न हो जाय तो वह असीम दुःख से कराह न उठे क्योंकि वह इस सच्चाई को जानते समझते हुए ही चल रहा है कि सारी प्रिय वस्तुएं, सारे प्रिय व्यक्ति, सारी प्रिय स्थितियां बदल जाने वाली ही हैं, नष्ट हो जाने वाली ही हैं।
हमारे देखते-देखते वे सब नष्ट हो जायेंगी अथवा उनके रहते-रहते हमारा कूच का डंका बज जायगा, जुदाई आने ही वाली हैं। जुदाई का दुःख अवश्यंभावी है, परंतु यह दुःख हमारे सिर पर सवार होकर हमारा मानसिक संतुलन न बिगाड़ दे, इसीलिए प्रत्येक सुखद अवस्था में इस विपरिणाम दुःख का दर्शन करते रहना, सच्चाई का दर्शन करना है, धर्म का दर्शन करना है, दुःख-निरोध का दर्शन करना है, सच्चे सुख का दर्शन करना है।
गहरी तृष्णाओं के चिपकाव में चिपके हुए, असीम आसक्तियों के दृढ़ बंधनों में बंधे हुए, अंध अहंभाव के गंदे कीचड़ में आकण्ठ डूबे हुए हम वस्तुतः दुःख की चक्की में ही पिसते रहते हैं, फिर भी अपने दुःखों को जानते नहीं, समझते नहीं, स्वीकारते नहीं, ऐसी अवस्था में हम दुःख के बाहर कैसे निकल पायेंगे?
दुःख-दर्शन ही दुःख विमुक्ति की ओर ले जाने वाला पहला ठोस कदम है।
*दुःख इसलिए है!*
जहां सब कुछ बिगड़ने के लिए ही बनता है, नष्ट होने के लिए ही निर्मित होता है, विलीन होने के लिए ही उत्पन्न होता है, अस्त होने के लिए ही उदय होता है, मुरझा जाने के लिए ही खिलता है, बिखर जाने के लिए ही एकत्र होता है, मर जाने के लिए ही पैदा होता है, वहां ऐसी किसी भी अनित्य वस्तु, व्यक्ति अथवा स्थिति के प्रति यदि हम तृषित हो उठे, आसक्त हो उठें तो दुःख छोड़ कर और क्या हाथ लगेगा भला?
चूंकि सारे ऐन्द्रिय सुख अनित्य हैं, इसलिए उनसे तृप्ति नहीं मिल सकती। ओस की बूंदों से किसी की प्यास नहीं बुझ सकती। लेकिन फिर भी हम इस तथ्य को समझते नहीं; बौद्धिक स्तर पर समझ भी लें तो व्यावहारिक स्तर पर स्वीकारते नहीं, अपनाते नहीं। आसक्ति में डूबे हुए हम यह कहां समझते हैं, कहां स्वीकारते हैं कि मैं जिस पत्नी से, पुत्र से धन-दौलत से, पद-प्रतिष्ठा से यश, गौरव से इस कदर चिपक गया हूं, वह सब भंगुर स्वभाव वाले हैं, देर-सबेर नष्ट होने ही वाले हैं। इसी प्रकार यह जो अपने “मैं” के साथ इतना बड़ा चिपकाव पैदा कर लिया और इस “मैं” की कामना पूर्ति के लिए ही इतना व्याकुल हो रहा हूं। यह भी बुदबुदे की तरह निस्सार ही है, भंगुर ही है, देर-सबेर नष्ट होने वाला ही है। यह अबोध, अज्ञान, विमूढ़ अवस्था तृष्णा की सहयोगिनी है, सहजात है,
सहधर्मिणी है। दोनों का बड़ा गहरा संबंध है, अन्योन्याश्रित संबंध है। जहां मूढ़ता है, वहां तृष्णा है। जहां तृष्णा है, वहां मूढ़ता तो है ही।
तृष्णा मूढ़ता की जननी है। मूढ़ता तृष्णा की जननी है। तृष्णा मूढ़ता को बल प्रदान करती है। मूढ़ता तृष्णा को बल प्रदान करती है। बड़ा भयावह कुयोग है इन दोनों का, बड़ा उत्पीड़क संगठन है इन दोनों का। सारे दुःख तृष्णाजन्य मूढ़ता अथवा मूढ़ताजन्य तृष्णा से ही उत्पन्न होते हैं। मूढ़ता के साथ जागी हुई यह तृष्णा कभी इस आलंबन का रसास्वादन कर आनंदित होती है, कभी उस आलंबन का; बिना यह समझे हुए कि सारे ही तो आलंबन अनित्य हैं। और जब ये अनित्य आलंबन टूटते हैं या छूटते हैं तो कितना रुलाती है यह तृष्णा हमें।
ऐसी यह दुःखदायिनी तृष्णा किसी न किसी रूप में हमारे पीछे लगी ही रहती है और हमारे लिए नित नए रोदन-क्रंदन, सुबकन-सिसकन, ऐंठन-कुंठन, अकड़न-जकड़न का निर्माण करती ही रहती है।
मोटे तौर पर तीन तरह की तृष्णाएं होती हैं, जिनमें से कोई न कोई हमारा मन मथती ही रहती है:
कामतृष्णा :
रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श आदि विषयों के प्रति आसक्त होने का नाम ही कामतृष्णा है। दुनिया के मोटे-मोटे भौतिक सुखों की कामना काम तृष्णा के अन्तर्गत आती है। पुत्तेषणा, वित्तेषणा आदि काम तृष्णा ही है परंतु इन एषणाओं से भी सूक्ष्म है लोकेषणा, इन तृष्णाओं से भी सूक्ष्म है भवतृष्णा ।
भवतृष्णा :
जीवित रहने की तृष्णा ही भवतृष्णा है। मैं सदा कायम रहूं, मेरा अस्तित्व सदा बना रहे, मेरा भव-संसार बना रहे, मैं भव-संसार में बना रहूं, इस प्रकार की तीव्र इच्छा ही भवतृष्णा है। जन्म जन्मान्तरों से चली आती हुई यह तीव्र लालसा हमारे स्वभाव का अंग बन गई है। इसीलिए हर प्राणी जीवित रहने के लिए छटपटाता है, मृत्यु से बचने के लिए हर संभव प्रयत्न करता है, सामान्यतया कोई मरना नहीं चाहता । मरे भी तो मर कर फिर जीना चाहता है।
जीवित रहने की यह तीव्र लालसा न केवल हमारे वर्तमान जीवन प्रवाह को गति प्रदान करती है, प्रत्युत मृत्यु के बाद भी पुनर्जन्म का कारण बनती है। हर मृत्यु के बाद एक नया जीवन तैयार करती हुई यह भव तृष्णा ही हमारे पुनर्भव का सृजन करती है। भव तृष्णा के कारण यह संसार हमारे लिए बढ़ता ही रहता है; समाप्त होने का नाम नहीं लेता।
अत्यंत सूक्ष्म और गहन होने पर भी यह तृष्णा अन्य सभी तृष्णाओं से अधिक शक्तिशाली है। कायम रहने की इच्छा हर प्राणी की तीव्रतम इच्छा होती है। इस नश्वर संसार के रंग-ढंग देखकर मजबूरन यह विश्वास करना ही पड़ता है कि मैं भी एक दिन मृत्यु का शिकार हो जाऊंगा। मेरा यह “मैं” भी एक दिन मृत्यु का शिकार हो जायगा । मेरा यह जीवन अनंत नहीं है, मेरा यह शरीर सदा कायम नहीं रहेगा तो इस तीव्र लालसा से छटपटाने लगता हूं कि यह भौतिक शरीर न रहने पर भी “मैं” तो कायम रहूं ही, मेरा नाम तो कायम रहे ही।
इसी इच्छा से संतान उत्पत्ति का क्रम भी चलता है कि मेरे पीछे कोई मेरा नाम लेवा तो रहे । मैं मर भी जाऊं तो मेरा वंश कायम रहे, मेरा अंश कायम रहे। पिता पुत्र के रूप में जीवित रहना चाहता है, गुरु शिष्य के रूप में जीवित रहना चाहता है।
यदि मैं धनवान हूं तो बड़े-बड़े भवनों पर अपना नाम टंकित करवा कर जीवित रहने की चेष्टा करता हूं। अपने नाम पर कोई विद्यालय, औषधालय, देवालय आदि बनवाता हूं। यदि सत्ताधारी हूं तो अपने शासनकाल में कोई ऐसा अनूठा काम कर जाना चाहता हूं जिससे कि मरने के बाद लोग मुझे याद करें।
कोई कवि, लेखक या कलाकार हूं तो ऐसी कोई कृति रचना चाहता हूं जो कि मुझे अमर बनाए रखे। कोई धर्म-नेता हूं तो लोगों को चमत्कृत कर देने वाली ऐसी सिद्धियां हासिल करना चाहता हूं जिससे कि लोग मुझे ब्रह्म माने, भगवान मानें, ईश्वर मानें, ईश्वर का अवतार मानें, ईश्वर का पुत्र मानें, ईश्वर का दूत माने, ईश्वर का पैगंबर माने, ईश्वर का प्रतिनिधि मानें और मेरे नाम पर ऐसा एक पंथ चल पड़े जो कि युगों तक मेरी कीर्ति कायम रखे।
यदि मैं परोपकारी हूं, सदाचारी हूं, दानी हूं, सेवाभावी हूं तो भी इसीलिए कि लोग मुझे मरने के बाद भी एक सज्जन व्यक्ति के रूप में याद करें, इतिहास में मेरा नाम कायम रहे। मैं मर भी जाऊं तो मेरी कीर्ति जीवित रहे, भौतिक शरीर मर भी जाए तो यशः शरीर ही कायम रहे।
मैं मरना नहीं चाहता, परंतु यह शरीर तो मर ही जाता है, यह सच्चाई सामने दिखती है। अतः जब मुझे यह आश्वासन मिलता है कि शरीर भले मर जाय, “मैं” तो कायम रहूंगा, मेरा कुछ नहीं बिगड़ने वाला । “मैं” अजर हूं, “मैं” अमर हूं तो यह आश्वासन मुझे बहुत प्रिय लगता है। मरने पर भी मेरा “मैं” कायम रहे, मुक्त होने पर भी मेरा “मैं” कायम रहे, यही गहरी भवतृष्णा है।
ऐसी मृत्यु मुझे अच्छी नहीं लगती, जिसमें मेरा “मैं” खत्म हो जाय । ऐसी मुक्ति मुझे अच्छी नहीं लगती जिसमें मेरा “मैं” खत्म हो जाय । ऐसा मोक्ष मेरे किस काम का, जिसमें “मैं” ही न रहूं, मेरा अपना अलग अस्तित्व ही न रहे? “मैं” ही नहीं रहूंगा तो उस मुक्ति सुख को भोगेगा कौन?
सिंधु में विलीन हो जाने वाली बात बिंदु को कदापि प्रिय नहीं लगती। अनंत में समा जाने वाली बात संत को कदापि रुचिकर नहीं लगती। इसलिए मैं यही चाहता हूं कि मुक्ति अवश्य मिले परंतु मुक्ति को भोगने वाला “मैं” अवश्य कायम रहे । सुख भोगने के लिए ही तो मुक्ति है, इसीलिए मुक्ति की भी तृष्णा है, उसका भी भोग भोगना है। स्थान-स्थान पर भांति-भांति के सुख अनंत काल तक भोगता ही रहूं, यही भव तृष्णा है।
मैंने इस लोक के सारे सुख भोगे। परंतु शास्त्रों में पढ़ा और धर्माचार्यो के मुँह से सुन लिया कि स्वर्ग का सुख तो अनुपम है। धरती का सुख उसके सामने तुच्छ है। अब मेरे मन में स्वर्गलोक के सुख भोगने की तृष्णा जागने लगी; फिर किसी ने कह दिया या कहीं पढ़ लिया कि ब्रह्मलोक का सुख तो इन स्वर्ग-सुखों से भी महान है और मैं ब्रह्मलोक के लिए तृष्णावान हो उठा।
ब्रह्मलोक में भी अरूप ब्रह्मलोक सर्वोपरि है, यह जानकर उन अरूप ब्रह्मलोकों के प्रति तृषित हो उठा और उन्हें प्राप्त करने के लिए जिसने जो-जो बताया, वह-वह करने में जुट गया, यह सभी भव तृष्णाएं ही हैं।
विभवतृष्णा :
भवतृष्णा की भांति विभवतृष्णा भी भोग भोगने की ही तृष्णा है। परंतु अंतर यही है कि जहां भवतृष्णा का रोगी यह चाहता है कि उसका “मैं” जन्म जन्मांतरों तक कायम रहे और भांति-भांति के इहलौकिक, पारलौकिक सुखों का उपभोग करता रहे वहां विभवतृष्णा का रोगी मृत्यु के अनंतर किसी भावी जीवन के अस्तित्व पर संदेह करता हुआ इसी जीवन में यथासंभव समस्त भोगलिप्साओं की पूर्ति में लगा रहता है।
विभव कहते हैं – वैभव को, और विभव कहते हैं – भव के न होने को भी विभवतृष्णा का रोगी सांसारिक सुख वैभव की कामना पूर्ति के लिए अच्छे-बुरे नैतिक-अनैतिक हर प्रकार के साधन का प्रयोग करता है। वह केवल इतना है। मानकर चलता है कि मेरा यह जीवन प्रवाह इस जन्म से आरंभ हुआ और इस मृत्यु पर समाप्त हो जाने वाला है।
उसका जीवन-दर्शन यही है कि जब तक जीऊ सुख से ही जीऊं। पीऊं तो घी ही, खाऊं तो शक्कर ही, भले इसके लिए मुझे किसी से ऋण ही क्यों न लेना पड़े। मेरे जीवन का चरम साध्य सुख-वैभव भोगना है, इसे चाहे जैसे भोगू इस निमित्त चाहे झूठ बोलूं या छल-कपट करूं या पराया धन छीन लूं, झपट लूं अथवा दबा लूं, गरज यह कि मेरी तमन्नाएं पूरी करने के लिए मैं चाहे जैसा गलत रास्ता अपनाऊं, मुझे इसमें कोई झिझक नहीं, कोई हिचकिचाहट नहीं।
क्योंकि मेरे लिए कोई पाप नहीं, कोई पुण्य नहीं, कोई दुराचार नहीं, कोई सदाचार नहीं, कोई दुष्कर्म नहीं, कोई सत्कर्म नहीं। दुष्कर्म का कोई कुफल नहीं, सत्कर्म का कोई सुफल नहीं। इस जन्म में किए गए कर्मों का फल भोगने के लिए अन्य कोई जन्म नहीं, कोई लोक नहीं कोई परलोक नहीं। जीवन पर्यंत येन-केन प्रकारेण सुख भोग भोगते रहने के अतिरिक्त जीवन का अन्य कोई प्रयोजन नहीं।
महज माता-पिता के संयोग से अकस्मात जन्म हो गया, ऐसे ही किसी कारण को लेकर अकस्मात मृत्यु हो जायगी, मृत्यु हो जायगी। तो यह शरीर जलाकर भस्मीभूत कर दिया जायगा अथवा गाड़कर मिट्टी में मिला दिया जाएगा। फिर पुनर्जन्म किसका होगा? बस यहीं सारा खेल खत्म हो जायगा। अतः इस जीवन में जो खा-पी लिया सो काम आ गया, जो भोग-भोग लिया उतना ही लाभ हो गया।
ऐसी भोगवादी मनोवृत्ति के अंतर्गत इस जीवन के अतिरिक्त अनेक जन्मों वाले भव-संसरण को स्वीकार ही नहीं किया जाता। अनेक लोग सैद्धांतिक स्तर पर पुनर्जन्म देने वाले इस भव-संसरण को स्वीकार करते भी हों तो भी व्यवहारतः उनका सारा जीवन हर संभव साधन द्वारा अपना संकुचित स्वार्थ साधने में ही बीतता है। ऐसे लोग भी वस्तुतः विभव तृष्णा के ही शिकार है।
ऐसे लोग भले अपने आपको शाश्वतवादी कहें, पर हैं वे वस्तुतः उच्छेदवादी ही, भले अपने आपको आस्तिक कहें, पर हैं वे वस्तुतः नास्तिक ही, भले अपने आपको अध्यात्मवादी कहें, पर हैं वे वस्तुतः भोगवादी ही, चार्वाक्वादी ही, लोकायतवादी ही।
विभवतृष्णा का एक और स्वरूप भी है। कोई व्यक्ति यह मान बैठता है कि इस शरीर के भीतर एक “मैं” है जो कि बेचारा इस शरीर के कारण बंधा हुआ है। यह शरीर ही उसके बंधनों का कारण है। अतः किसी प्रकार इस शरीर से छुटकारा मिले तो इस “मैं” को मुक्ति मिले। ऐसा मानकर वह व्यक्ति शरीर पीड़न द्वारा आत्म हत्या कर जीवन समाप्त करता है। किसी भी युक्ति द्वारा जीवन समाप्त कर मुक्त हो जाने की यह भ्रांति तृष्णा ही है।
इसी प्रकार किसी एक व्यक्ति के मन में इस बात की गहरी लालसा जागती है कि मुझे जीवन-मरण के चक्कर से छुटकारा मिले, भव संसार से निस्तरण मिले, मुक्ति मिले, मोक्ष मिले, निर्वाण मिले। इसी तृष्णा वह इस कदर व्याकुल हो उठता है कि सारी आंतरिक सुख-शांति खो बैठता है। मरण के भव को नष्ट करके निर्वाण पा लेने की यह व्याकुलताभरी तृष्णा भी विभव तृष्णा ही है।
ऐसा व्यक्ति परमार्थ धर्म की उस सच्चाई को नहीं समझता कि पूर्णतया तृष्णा विहीन हो जाना ही तो मुक्ति है, मोह है, निर्वाण है। और उसकी उपलब्धि तृष्णा के द्वारा नहीं हो सकती। ऐसा व्यक्ति अज्ञान अवस्था में मोक्ष के नाम पर विभव तृष्णा से ही पीड़ित रहता है।
सभी तृष्णाएं समान रूप से दुःखद हैं, तृष्णा की मुक्ति के बिना दुःख से विमुक्ति नहीं। तृष्णा की विमुक्ति के लिए कोई उपयुक्त साधन खोजना ही होगा और उसे अपनाना ही होगा। इसी में सच्ची सुख-शांति निहित है। सच्ची दुःख-विमुक्ति निहित है।
*दुःख से मुक्ति की बात :*
जो नहीं है उसके प्रति मन सतृष्ण होता है, जो है उसके प्रति घोर असंतुष्टि जागने लगती है। तृष्णा के सिक्के का दूसरा पहलू असंतुष्टि ही है। जहां तृष्णा है, वहां असंतुष्टि है और जहां असंतुष्टि है वहां तृष्णा है। अभाव के प्रति असंतुष्टि, भाव के प्रति तृष्णा, भाव के प्रति तृष्णा अभाव के प्रति असंतुष्टि; असंतुष्टि भी दुःख, तृष्णा भी दुःख.
पिछली चर्चा में हमने देखा कि हमारे प्रत्येक दुःख के मूल में कोई न कोई आसक्ति समायी होती है, कोई न कोई तृष्णा समायी होती है। आओ! आज हम इस तृष्णा को जरा और गहराई से समझने का प्रयत्न करें।
हमारे मन में अनेक प्रकार की तृष्णाएं जागती ही रहती हैं। आंखों से कोई रूप देखते हैं जो कि बहुत सुंदर लगता है तो हम उसके प्रति सतृष्ण हो उठते हैं। कानों से कोई शब्द सुनते हैं, नाक से कोई गंध सूंघते हैं, जीभ से कोई रस चखते हैं, शरीर से किसी वस्तु अथवा व्यक्ति का स्पर्श करते हैं जो कि हमें बहुत प्रिय लगता है तो हम उसके प्रति आसक्त, सतृष्ण हो उठते हैं। इसी प्रकार मन से किसी ऐसी ऐन्द्रिय-अनुभूति की याद करते हैं जो कि हमें अत्यंत सुखद लगी थी, तो उसे पुनः प्राप्त करने के लिए सतृष्ण हो उठते हैं अथवा किसी ऐसे ऐन्द्रिय-सुख की कल्पना करते हैं जो कि हमने कभी नहीं भोगा तो उसे प्राप्त करने के लिए सतृष्ण हो उठते हैं।
इन छ: इंद्रियों द्वारा अपने-अपने विषयों के प्रति जो तृष्णा है, उसी को काम-तृष्णा कहते हैं। ऐन्द्रिय सुखों की कामनाओं के प्रति जो आसक्ति हो जाती है, वही काम-तृष्णा है। भिन्न-भिन्न आलंबनों के आधार पर उत्पन्न होती हुई यह काम-तृष्णा हमें बेचैन करती ही रहती है। यही तृष्णा की आग जब प्रतिस्पर्धा के पेट्रोल से संयुक्त हो जाती है तब इसका विस्तार अनियंत्रित हो उठता है, परिणामतः हमारा दुःख भी असह्य असीम हो उठता है।
कुछ एक उदाहरणों द्वारा समझें:
मैंने एक देशी कार खरीदी। औरों की कार से कुछ विशेषता होनी ही चाहिए, इसलिए उसमें रेडियो लगाया, टेपरेकार्डर लगाया, सीट पर मोटे फोम-रबर वाला मखमली कवर लगाया, बिना जरूरत की भी आठ-दस लाइटें लगाई, भीतर भांति-भांति के आवश्यक-अनावश्यक उपकरण लगाए, इस प्रकार उसे नई-नवेली दुल्हन की तरह सजाकर बड़ा प्रसन्न हुआ।
शाम को उस पर सवार होकर किसी सार्वजनिक आयोजन में गया और वहां देखा कि ढब्बू भाई एक बड़ी सी इंपाला कार में सवार होकर आया है। उसकी छाती गर्व से फूली हुई है, बांछे खिली हैं अधमिची आंखों से वह सबको इस नवीनतम मॉडल वाली अमेरिकन कार की एक-एक विशेषता समझा रहा है। इसे देखकर मेरे मन की सारी उमंगें न जाने कहां काफूर हो गयीं!
भीतर ही भीतर मायूसी के बादल छाने लगे, कहां यह इतने लाख रुपए की विदेशी कार और कहां यह हिंदुस्तानी छकड़ा। अपनी गाड़ी की सारी सजावट बड़ी चवन्निया लगने लगी, मन घुटन-कुढ़न से भर गया। आयोजन से लौटा तो अपनी गाड़ी में बैठने को जी नहीं चाहा; सीट पर सौ-सौ बिच्छुओं के डंक निकल आए, गाड़ी के भिन्न-भिन्न भागों से आने वाली आवाज कान के पर्दे फाड़ने लगी।
यह कैसा टिन-पाट है! महज टिन का खटारा है! मन अतृप्ति से भर उठा और किसी नए मॉडल की इंपाला, मर्सीडीजज अथवा कैडीलक के स्वप्न देखता हुआ इतना सतृष्ण हुआ कि उसके बिना जिंदगी के सारे सुख फीके लगने लगे। अपने आपको कितना हीन महसूस करने लगा। हाय! मैं बेचारा! कितना गरीब। कितना असमर्थ! फारेन की गाड़ी बिना भी कोई जीवन है भला!
मनसुखभाई एक दिन दिलसुखभाई की नयी आफिस में उससे मिलने गया; देखा उसकी विशाल आफिस बड़ी अप-टू-डेट है। प्रभावशाली है, पूरी की एयरकंडीशंड है, वह अपने आपको बहुत ओछा महसूस करने लगा। उसे खुद अपनी आफिस काट खाने लगी। वैसी या उससे भी अच्छी आफिस हुए बिना उसे अपनी सारी प्रतिष्ठा धूल में मिलती नजर आने लगी। लौटकर वह जिस दुःख से जलने लगा, वह प्रतिस्पर्धा की आग का तृष्णाजन्य दुःख था। बार-बार उसका मन हीन भावनाओं से भर उठता।
अभी चंद सालों की ही तो बात है, यह दिलसुख भाई एक सामान्य व्यापारी की तरह इस धंधे में आया और इतनी जल्दी मुझसे भी आगे बढ़ गया और मैं अपने व्यापार में उस जैसी सफलता न प्राप्त कर सका, यह ईर्ष्याभरी घुटन उसे बेचैन बनाने लगी। उसकी बराबरी ही न करने लगू, बल्कि उससे भी दो कदम आगे बढ़ जाऊं, यही तीव्र तृष्णा उसके दुःख बढ़ाने का कारण बनी।
मोहिनी ने आज अपना खूब रूप संवारा अभी कल ही नाइलोन-जार्जट की जो कीमती साड़ी खरीदी थी, उसे ही पहन कर अपनी सहेली के यहां पार्टी में शामिल होने गयी। मन में बड़ी आशाएं लिए हुए थी कि आज की पार्टी में वही सबके आकर्षण का केन्द्र बनी रहेगी, सभी ओर से उसकी नयी साड़ी की ही प्रशंसा होगी।
परंतु वहां पहुंचकर जो कुछ देखा, उससे उसकी सारी आशाओं पर पानी फिर गया; यहां तो सबका ध्यान सोहिनी की ओर लगा हुआ है।
सोहिनी की सिफोन की साड़ी तो सचमुच गजब की है, जिसे कि उसका पति अभी-अभी हांगकांग से ले आया है। ऐसी नवीनतम साइकाडेलिक डिजाइन तो भारत की महिलाओं ने देखी तक नहीं, पहनने की बात तो दूर रही।
सोहिनी की साड़ी ने मोहिनी को बड़ा हतप्रभ किया। वह भीतर ही भीतर हीन भावना से तड़फड़ा उठी। जिस कीमती साड़ी को पहनकर खुशियों से भरी हुई पार्टी में पहुंची थी, उस खाना हराम, नींद हराम, बेशकीमती साड़ियों से आलमारियां भरी हैं, परंतु आज उसे सोहिनी की साड़ी के सामने वे सब फीकी लगने लगीं।
नेकीराम स्थानीय राशन आफिस में छोटा अफसर है। महंगी के जमाने में कुछ बचत तो नहीं होती, परंतु जितना वेतन मिलता है, उससे किसी प्रकार सुख-पूर्वक अपनी गृहस्थी चला लेता है। एक दिन अपनी पत्नी के साथ संतोषीराम के घर भोजन पर गया तो उसके ठाट-बाट देखकर चकाचौंध हो गया।
चार कमरों का फ्लैट, ऐसा बढ़िया फर्नीचर, ड्राइंगरूम में देशी-विदेशी सजावट के सामानों से भरी हुई आलमारी, रेडियो, टेलीविजन, रेफ्रीजरेटर, सोने के कमरे में एयरकंडीश्नर, वारे न्यारे हो रहे हैं। यह सब देखकर नेकीराम की आंखें फटी-फटी सी रह गई।
जिस पोस्ट पर संतोषीराम है, उसी पर मैं हूँ। इसने ऊपर की आमदनी से अपना घर भर लिया और मैं ईमानदारी के झूठे भुलावे में पड़ा रहा। घर लौटा तो पत्नी ने भी उसके बुद्धूपन के लिए उसे कोसा।
पेट तो सभी भर लेते हैं, आदमी चाहता है कि औरों के सामने इज्जत से रह सके, सिर ऊंचा करके चल सके। सारी रात संतोषीराम का वैभव ही उसकी आंखों के सामने घूमता रहा; पति-पत्नी ने अपने मन की चैन खो दी, सुख-शांति खो दी।
लखोटियाजी ने अपनी बेटी के विवाह में समधी को पांच लाख का दहेज दिया। बीस हजार तो विवाह-मण्डप की सजावट पर ही खर्च कर दिये, सैकड़ों लोगों को भोज दिया, नगर की कीमती से कीमती मिठाइयां परोसी गईं, लखोटियाजी विवाह नहीं हुआ। चंद महीने बाद ही करोड़ीमल ने अपनी पुत्री के विवाह में दस लाख का दहेज दे दिया।
पचास हजार मण्डप की सजावट पर लगा दिये, हजारों फूलकर कुप्पा हो गये। आज तक ऐसी शान-शौकत से किसी के यहां लोग भोज में शामिल हुए, केवल बंबई की ही नहीं बल्कि दिल्ली और कलकत्ते तक की एक से एक बढ़ियां मिठाइयां हवाई जहाज से मंगाकर बारात को परोसी गईं: ऐसी वाह-वाह हुई कि लखोटियाजी को दिल का दौरा पड़ गया।
इस प्रकार के उदाहरणों से हम सब का जीवन भरा पड़ा है। जो नहीं है उसके प्रति मन सतृष्ण होता है, जो है उसके प्रति घोर असंतुष्टि जागने लगती है। तृष्णा के सिक्के का दूसरा पहलू असंतुष्टि ही है। जहां तृष्णा है, वहां असंतुष्टि है और जहां असंतुष्टि है वहां तृष्णा है।
अभाव के प्रति असंतुष्टि, भाव के प्रति तृष्णा, भाव के प्रति तृष्णा अभाव के प्रति असंतुष्टि; असंतुष्टि भी दुःख, तृष्णा भी दुःख ।
औरों से कम क्यों हूं? इस असंतुष्टि की तड़पन का दुःख । औरों के जैसा क्यों न हो जाऊं? इस तृष्णा की तड़पन का दुःख । कोई मुझसे किसी भी बात में थोड़ा भी बढ़ा-चढ़ा क्यों हैं? इस असंतुष्टि का दुःख।
उसके बराबर ही नहीं, उससे कुछ आगे निकल जाऊं, इस तृष्णा की तड़पन का दुःख । अतृप्ति माने भी दुःख, तृष्णा माने भी दुःख । जितनी गहरी अतृप्ति उतना गहरा दुःख । जितनी गहरी तृष्णा उतना गहरा दुःख।
बौद्धिक स्तर पर तृष्णा के दुःख की यह सच्चाई हम जानें भी, अनुभूत करें तब भी इसके बाहर नहीं निकल पाते। सारा जीवन मन को प्रतिद्वंद्विता की तृष्णाभरी होड़ में ही तो लगाए रखा। अतः इस आदत के बाहर निकल सकना सरल नहीं है। बचपन में मां ने संवारा-सजाया तथा औरों से अधिक खूबसूरत लगते रहना सिखाया; स्कूल गये तो परीक्षाओं में सबसे ऊंचे नम्बरों से पास होने की होड़ मन में भरी गई, खेल के मैदान में उतरे तो सबको पछाड़ कर आगे निकल जाने की ही ट्रेनिंग मिली, जवान होकर जीवन क्षेत्र में उतरे तो औरों से आगे निकल जाने की तमन्ना का ही पोषण करते रहे. अपने सजातीय बन्धुओं को पछाड़कर आगे निकल जाने का स्वभाव अनेक पशुओं में होता है।
हम मनुष्यों ने अपने भीतर यह पाशविक स्वभाव कितनी अधिक मात्रा में भर लिया है। प्रतिद्वंद्विता की इस होड़ में जीवन छीना-झपटी से भर गया है, आकुलता-व्याकुलता से भर गया है, हर राम भरत को अपनी गद्दी के नजदीक नहीं आने देता और हर भरत राम की गद्दी को छीनने के लिए ही उतारू है। कोई भाई तर्क करता है कि जीवन में तृष्णाएं नहीं होंगी, कामनाएं नहीं होंगी, प्रतिद्वंद्विता नहीं होगी तो काम करने की प्रेरणा कैसे जागेगी? लोग अधिक काम कैसे करेंगे? काम नहीं करेंगे तो उत्पादन नहीं बढ़ेगा और देश में समृद्धि, सम्पन्नता नहीं होगी, सुख-साधनों की प्रचुरता-बहुलता नहीं होगी।
सुनने में बात तर्कसंगत लगती है परंतु जब आदमी गहराई से सच्चाई को देखता है तो यह धोखा स्पष्ट समझ में आ जाता है।
जिसे हम समृद्धि कहते हैं, साधनों की प्रचुरता-बहुलता कहते हैं, आखिर वह सब है किसलिए? हमारी सुख-शांति के लिए ही है न? परंतु सुख-शांति कहां? जिसे प्राप्त करने के पूर्व प्रतिद्वंद्विता की होड़ में पड़कर हमारा मन अतृप्त-असंतुलित हो उठे, जिसे प्राप्त करने की चेष्टा करते हुए हमारा मन अपना संतुलन खो बैठे और जिसे प्राप्त कर लेने के बाद भी तृप्ति और संतुष्टि का सुख तो दूर, प्रत्युत और अधिक प्राप्त करने की व्याकुलता ही पैदा होती हो, ऐसा साधन हमारे किस काम का?
वह हमें अपने लक्ष्य से दूर ले जाने लगा। सारी भाग-दौड़ के आदि में भी दुःख, मध्य में भी दुःख और अन्त में भी दुःख ही दुःख । जिसका आरंभ ही दुःख में हो, जिसका प्रसार भी दुःख में हो और जिसकी परिणति भी दुःख में ही हो, ऐसी भौतिक उपलब्धि का सुख-शांति से क्या सम्बंध?
इसका अर्थ यह नहीं कि लोग भौतिक समृद्धि से दूर भागें और अभावभरी गरीबी का ही जीवन बिताएं। नहीं! नहीं! लोग अपनी तथा औरों की गरीबी दूर करने के लिए काम करें, खूब काम करें परंतु काम करते हुए अपना मानसिक संतुलन बनाए रखें। उद्विग्न-उत्तेजित न हों, अशांत बेचैन न हों, आसक्तियों से अभिभूत होकर मानसिक समता खो बैठेंगे तो कोरी भौतिक संपदा भले प्राप्त कर लें, सुख नहीं प्राप्त कर सकेंगे। सच्चा सुख प्राप्त करने के लिए मानसिक समता बनाए रखनी आवश्यक है।
आसक्तिजन्य प्रतिस्पर्धा की होड़ में आदमी अपना सुख चैन खो बैठता है और यह होड़ की बीमारी छूत की महामारी की तरह फैलती ही रहती है। सुखी स्वस्थ संयुक्त परिवार का एक सदस्य इस रोग का शिकार हो जाय तो हजार साधन सम्पन्नता के बावजूद भी धीरे-धीरे सारा परिवार इसका शिकार होकर पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष की आग में सुलगने-तड़पने लगता है।
एक परिवार से दूसरे में फैलती हुई यह आग सारे समाज को व्याकुल व्यथित बना देती है। जिसमें केवल व्यक्ति की ही नहीं बल्कि सामूहिक समाज की सुख-शांति भंग होती है, वह तृष्णा जन्य प्रतिद्वंद्विता की होड़ हमारे दुःख की ही जननी है, सुख की नहीं। इससे बचने में ही सुख है, सच्ची शांति है।
(लेखक मनोचिकित्सक, ध्यानप्रशिक्षक एवं चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)





