पुष्पा गुप्ता
वैदिक-छन्दों \मन्त्रों\स्तुतियों को ऋचा कहा जाता है ! बहुत सी ऋचाओं को मिला कर सूक्त बनता है ! वेद में बहुत से सूक्त हैं ! इन सूक्तों का संपादन -संकलन संहिता कहा जाता है !
ऋग्वेद भी संहिता है ! उस जमाने में लिखने की परंपरा नहीं थी , सुनने और याद करने की परंपरा थी ,इसलिए इनको श्रुति कहा जाता था ! वेदव्यास ने इन संहिताओं को क्रमबद्ध किया , संपादन किया था !
ऋग्वेद में १०१७ सूक्त हैं ! ११ सूक्त परिशिष्ट के हैं , जिन्हें बालखिल्य सूक्त कहा जाता है ! ये १०१७ सूक्त दस मंडलों में वर्गीकृत किये गये हैं !
पहले मंडल के मन्त्रद्रष्टा ऋषि मधुच्छन्दा हैं। मधुच्छन्दा विश्वामित्र के पुत्र थे ! फिर दूसरे मंडल के ऋषि हैं, गृत्समद ! विश्वामित्र तीसरे मंडल के ऋषि हैं ,इसी मंडल में ब्रह्मगायत्री है ! वामदेव चौथे मंडल के द्रष्टा ऋषि हैं ! पंचम मंडल के द्रष्टा ऋषि महर्षि अत्रि हैं ! ऋग्वेद के छटे मंडल के द्रष्टा ऋषि भरद्वाज हैं ! वसिष्ठ सातवें मंडल के ऋषि हैं !
आठवें मंडल में महर्षि कण्व और उनके गोत्रज ऋषियों का मन्त्रवैभव है। नवें और दसवें मंडल में अनेक ऋषियों का उल्लेख है, वैवस्वत मनु , शिवि ,औशीनर , प्रतर्दन , मधुच्छन्दा , आंगिरस , देवापि आदि ! लोपामुद्रा भी ऋषि हैं !
ऋग्वेद का एक संपादन अष्टक के आधार पर भी वर्गीकृत किया गया है ! इन ऋचाओं में धरती से लेकर सौरमंडल तक की विश्वशक्तियों की महिमा का गायन किया गया है ! पुरुषसूक्त, हिरण्यगर्भसूक्त, नासदीयसूक्त संज्ञान सूक्त अक्ष सूक्त ऋग्वेद के महत्त्वपूर्ण सूक्त हैं !
अनेक संवादसूक्त भी महत्त्वपूर्ण हैं, जैसे : पुरूरवा-उर्वशी-संवाद ,यम-यमी-संवाद सरमा-पणि-संवाद विश्वामित्र-नदी-संवाद अगस्त्य-लोपामुद्रा-संवाद इन्द्र-इन्द्राणी-वृषाकपि-संवाद विश्वामित्र-नदी-संवाद वशिष्ठ-सुदास-संवाद आदि !
यूरोप में ऋग्वेद का सबसे पहला अनुवाद जर्मन में प्रकाशित हुआ [१९५१] यह अनुवाद कार्लगेल्डर ने किया था ! तात्याना येलिजारेन्कोवा ने रूसी भाषा में ऋग्वेद का अनुवाद किया ! १९८६ में येलिजारेन्कोवा ने ऋग्वेद का अध्ययन करते हुए कुछ नये तथ्य भी प्रद्तुत किये और इसमें स्लाव-जन के साथ-साथ सेल्ट , ग्रीक , जर्मन तथा अन्य इंडोयूरोपीय जातियों के सांस्कृतिक – परंपराओं का भी उल्लेख लिया और इंडो-ईरानी मिथकशास्त्र की भी तुलना की !
रूस में ऋग्वेद का यह अनुवाद बहुत लोकप्रिय हुआ और इसकी चालीस हजार प्रतियाँ बिक गयीं !
येलिजारेन्कोवा ने कहा कि सुदूर अतीत में वैदिक-साहित्य का संबंध रूसी जनगण के साथ भी गुथा हुआ है ! उन्होंने ऋग्वेद में कालासागर स्थित स्थानों , नदियों के नामों की पहचान की तथा काकेशस में प्राप्त रथों के आलेखों में मध्य एशिया से प्राप्त बर्तनों के रूप और नामों में एवं धरती के गर्भ में छिपे हुए अन्य पुरातत्त्वों की खोज के लिए सहायक अध्ययन-सामग्री के रूप में भी रेखांकित किया !
आचार्य वासुदेवशरण अग्रवाल भारतविद्या के मूर्धन्य-विद्वानों में थे ! उन्होंने लिखा था, जब से मैने दीर्घतमस ऋषि के अस्यवामीयसूक्त की व्याख्या लिखी, तब से मुझे विश्वास हो गया है कि वेदविद्या सृष्टिविद्या है. यही सनातनी योगविद्या है !
इसी सूक्त का एक वाक्य है, एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति। इसी सूक्त में दीर्घतमस ऋषि कहते हैं, द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया ऋ.१.१६४.२० । एक ही डाल पर सुन्दर पंखों वाले दो पक्षी बैठे हैं , जिनमें से एक पक्षी उस पेड के फल को खा रहा है तथा दूसरा पक्षी उस फल को देख रहा है !
ऋग्वेद का वाक्य है :
नासदासीन्नोसदासीन्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परोयत।
जगत था। नहीं था! सृष्टि चेतन थी, अचेतन थी, आदि से चेतस विद्यमान था, तब था अव्यक्त एवं व्यक्त की प्रक्रिया का सर्वसाक्षी आकाश ।
ऋग्वेद ने कहा कि जाति नहीं कर्म आगे बढाता है। कवष ऐलूष। यह शूद्र था।जुआरी भी था। ऋग्वेद,मंडल १०, सूक्त३०-३४ का द्रष्टा। इसने अक्षसूक्त भी लिखा था, जिसमें इसने अपने से ही कहा है कि, मत खेल जुआ। इसका एक सूक्त विश्वेदेवा को समर्पित है। एक अपां- नपात को।
ऋग्वेद ने कहा – हमारे सोचने के तरीके में समन्वय का भाव हो , हमारे हृदयों में समानता के भाव हों , हमारे मन परस्पर संवादी हों , जिससे हम सब एक साथ सुख से रह सकें!
समानी व आकूति: समाना हृदयानि व: ।समानमस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति। ऋग्वेद १०.१९१.४.
ऋग्वैदिक मंत्र है -“संगच्छध्वं संवदध्वं सर्वे मनांसि जानताम्’. (१९/१९१/२)
ऋग्वेद ने कहा :
सक्तुमिव तितौना पुनन्तो, यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत।
अत्र सखाय: सख्यानि जानते ,भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि।
जैसे सत्तू को छाना जाता है ,भूसी अलग की जाती है। अनाज का शु्द्ध- तत्व ग्रहण कर लिया जाता है , उसी प्रकार ध्यान-परायण मनीषिय़ों ने मन:पूत वाणी की रचना की। भाषा का उदात्त-रूप ।यह वाणी है,जिसमें मित्र लोग मैत्री की पहचान कर लेते हैं ,जो परस्पर-मित्रत्व को पा चुके हैं ,उनकी शोभा इसी वाणी में निवास करती है।
ऋग्वेद [१०-७५-५ ] में भारत की नदियों की गंगा, यमुना ,शुतुद्रि= सतलज, पयोष्णी =रावी, असिक्नी= चिनाव ,वितस्ता = व्यास ,मरुद्वृधा= संगम ,आर्जीकीया= झेलम, सुषोमा = सिन्धु की वन्दना है !
इमं मे गंगे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्णया।
असिक्न्या मरुद्वृधे विवस्तयार्जिकीये शृणुह्या सुषोमया।
डा.रामविलासशर्मा ने ऋग्वेद का अध्ययन किया, फिर बोले, यूनान और भारत के दर्शन का विवेचन ऋग्वेद को छोड कर नहीं किया जा सकता। ऋग्वेद बहुत ऊंचे दर्जे का दार्शनिक-काव्य है।
इसके बिना भारतीय साहित्य के विकास का विवेचन नहीं किया जा सकता। ऋग्वेद और अथर्ववेद अनेक जनपदों की संस्कृतियों का संगम है।
ऋग्वेद ने बतलाया कि काम सृष्टि का मूल और मन का बीज है, काम ही मनुष्य की राग अथवा रसवृत्ति का स्रोत है!
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेत: प्रथमं य आसीत।
सतो बन्धुमसति निरविन्दं हृदि प्रतीष्य़ा कवयो मनीषा।
[ऋक १० सूक्त १२९, ]
कवियों ने मन्थन किया तथा सत और असत का संबंधसूत्र खोज निकाला , सत का स्रोत असत में खोजा, असत में सत को जन्म देने वाला काम है। काम मन का पहला स्पन्दन है।नासदीयसूक्त [४] की स्थापना है कि ब्रह्म के मन का रेत अर्थात बीज प्रथमत: निकला , वही सृष्टि की शक्ति है।
डाॅ.मुरलीधर चाँदनीवाला ने बयालीस वर्षों में अनवरत अनथक परिश्रम कर के वैदिक ऋचाओं का नव-रूपान्तर किया है ,जो ”वैदिक कविताएँ” शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है।





