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भारत के बजट पर ब्रिटेन और फ्रांस का कितना असर?

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हर साल एक फरवरी को भारत सरकार संसद में अपना वार्षिक बजट पेश करती है. इस साल भी ऐसा ही होने वाला है. बजट सत्र की शुरुआत हो चुकी है. गुरुवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आर्थिक सर्वेक्षण (इकोनॉमिक सर्वे) पेश किया. बजट केवल आय-व्यय का हिसाब नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं, सामाजिक दृष्टि और विकास-रणनीति का औपचारिक बयान भी होता है. आइए समझते हैं कि बजट का चलन कहां शुरू हुआ, यह परंपरा दुनिया के दूसरे देशों तक कैसे पहुंची और भारतीय बजट पर विदेशी प्रभावों की भूमिका क्या रही?यूं तो आमदनी के हिसाब से खर्चे की योजना बनाने की परंपरा राजशाही के दौर से चली आ रही है, लेकिन व्यवस्थित आधुनिक बजट पेश करने का चलन ब्रिटेन से शुरू हुआ. यह दुनिया के कई हिस्सों में फैला और भारत में इसकी एंट्री हुई.

बजट शब्द का मूल फ्रेंच शब्द Bougette माना जाता है, जिसका अर्थ होता है छोटा बैग या थैला. ब्रिटेन में वित्त मंत्री जब संसद में राजकोषीय प्रस्ताव रखते थे, तो दस्तावेज़ों का एक बैग लेकर आते थे. धीरे-धीरे वही बैग सरकार की वित्तीय योजना का प्रतीक बन गया. आज यह शब्द लगभग हर देश की वित्तीय योजना के लिए सामान्य रूप से इस्तेमाल होता है. और समय चाहे कितना बदल गया हो लेकिन हर साल वित्त मंत्री अपनी टीम के साथ एक छोटा सा ब्रीफकेस लेकर तस्वीरें करवाते या रहे हैं. यह कार्यक्रम प्रायः संसद भवन के मुख्य द्वार पर होता आया है.

किस देश से शुरू हुई आधुनिक बजट की परंपरा

आधुनिक संसदीय बजट प्रणाली का सबसे स्पष्ट और प्रभावी विकास ब्रिटेन में हुआ. 17वीं-18वीं शताब्दी में संसद की शक्तियां बढ़ीं और कर लगाने व खर्च मंजूर करने का अधिकार धीरे-धीरे राजा से संसद की ओर आया. इसी ने एक ऐसी व्यवस्था बनाई जिसमें सरकार को नियमित अंतराल पर यह बताना जरूरी हुआ कि राजस्व कहां से आएगा और खर्च किन मदों में होगा. 19वीं शताब्दी तक ब्रिटेन में बजट भाषण और वित्तीय दस्तावेज़ पेश करने की परंपरा अधिक औपचारिक और संस्थागत रूप ले चुकी थी. यह व्यवस्था मूलतः जनप्रतिनिधियों के सामने जवाबदेहीके सिद्धांत पर टिकी थी, यानी जनता के पैसे पर जनता के प्रतिनिधि की निगरानी.

Budget Nirmala

देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार 9वां बजट पेश रिकॉर्ड बनाने जा रही हैं.

दुनिया के दूसरे देशों तक बजट कैसे पहुंचा?

इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि बजट की परंपरा दुनिया में तीन मुख्य रास्तों से फैली.

  • औपनिवेशिक शासन और प्रशासनिक ढांचा: यूरोपीय शक्तियों, खासकर ब्रिटेन और फ्रांस ने जिन क्षेत्रों पर शासन किया, वहां कर-प्रशासन, लेखा-व्यवस्था और वार्षिक वित्तीय योजना जैसी प्रक्रियाएं भी स्थापित कीं. स्वतंत्रता के बाद भी कई देशों ने इन्हीं संस्थागत व्यवस्थाओं को अपने शासन में जारी रखा, क्योंकि प्रशासनिक निरंतरता और राजस्व प्रबंधन के लिए ये उपयोगी थीं.
  • राष्ट्र-राज्य का विकास और युद्धकालीन अर्थव्यवस्था: 19वीं और 20वीं शताब्दी में युद्ध, औद्योगीकरण और सार्वजनिक सेवाओं के विस्तार ने सरकारों के खर्च को बहुत बढ़ा दिए. खर्च बढ़ने के साथ योजनाबद्ध वित्तीय दस्तावेज़ों की जरूरत भी बढ़ी इसलिए बजट जरूरत से नियम बनता गया.
  • अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएं और वैश्वीकरण: दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था मजबूत हुई. आर्थिक अनुशासन, घाटा-प्रबंधन, कर-संग्रह, सब्सिडी-नीति और पारदर्शिता जैसे विषयों पर वैश्विक मानक बनने लगे. कई देशों ने निवेश आकर्षित करने और ऋण/अनुदान प्राप्त करने के लिए अपने बजट दस्तावेज़ों को अधिक मानकीकृत और तुलनीय बनाया.

Britishers Bombay Connection

ब्रिटिश साम्राज्य.

भारत में बजट की शुरुआत

भारत में बजट परंपरा का आरंभ ब्रिटिश शासन के प्रशासनिक ढांचे में देखा जाता है. औपनिवेशिक सरकार को सेना, प्रशासन और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए स्थिर राजस्व चाहिए था, इसलिए कर-व्यवस्था और वार्षिक लेखा-प्रस्तुति को व्यवस्थित किया गया. धीरे-धीरे बजट एक औपचारिक दस्तावेज़ और भाषण के रूप में उभरा. आज़ादी के बाद भारत ने संसदीय लोकतंत्र अपनाया और बजट-प्रक्रिया को लोकतांत्रिक जवाबदेही के साथ आगे बढ़ाया यानी अब बजट औपनिवेशिक जरूरत नहीं, बल्कि जनता के कल्याण और राष्ट्रीय विकास की नीति का औजार बन गया.

भारतीय बजट पर कितनी विदेशी छाप?

भारत का बजट पूरी तरह विदेशी या पूरी तरह स्वदेशी, इन दो सिरों में फिट नहीं बैठता. इसकी बुनियाद और भाषा में विदेशी (ब्रिटिश) प्रशासनिक-संसदीय परंपरा का असर जरूर है, लेकिन उद्देश्यों, प्राथमिकताओं और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में अब यह भारतीय जरूरतों के अनुसार ढल चुका है. विदेशी छाप को समझने के लिए इसे तीन स्तरों पर देखना उपयोगी है.

  • संस्थागत ढांचा और संसदीय प्रक्रिया (ब्रिटिश प्रभाव): बजट का संसद में प्रस्तुत होना, बजट भाषण, वित्त विधेयक, विनियोग विधेयक, लेखानुदान जैसी प्रक्रियाएं—इनमें ब्रिटिश संसदीय परंपरा का असर स्पष्ट है. जवाबदेही और नियंत्रण का सिद्धांत भी उसी परंपरा से जुड़ता है.
  • वित्तीय शब्दावली और लेखा-मानक (वैश्विक प्रभाव): राजकोषीय घाटा, प्राथमिक घाटा, सार्वजनिक ऋण, सब्सिडी-तार्किककरण, कर-आधार विस्तार, प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष कर जैसी अवधारणाएं वैश्विक अर्थशास्त्रीय भाषा का हिस्सा हैं. समय के साथ भारत ने भी अपनी वित्तीय रिपोर्टिंग को अधिक पारदर्शी और तुलनीय बनाया है, ताकि निवेशक, रेटिंग एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय बाजार भारत की स्थिति को समझ सकें.

Budget Trade Policy

इस बार बजट में ट्रेड पॉलिसी में बदलाव की तैयारी की जा रही है.

कभी बाहर से प्रेरणा, पर निर्णय देश के भीतर

आर्थिक सुधार, व्यापार, निवेश, डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, सामाजिक सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर इन क्षेत्रों में भारत ने दुनिया के अनुभवों से सीखा है. लेकिन बजट की अंतिम प्राथमिकताएं घरेलू राजनीति, सामाजिक जरूरतों, राज्यों की मांगों, रोजगार, महaगाई जैसी चुनौतियों और विकास लक्ष्यों के अनुसार तय होती हैं. यही कारण है कि भारत का बजट वैश्विक संकेतों को ध्यान में रखता है, पर उसकी दिशा अंततः भारतीय परिस्थितियां तय करती हैं.

परंपरा विदेशी, पर अर्थ और एजेंडा भारतीय

बजट की परंपरा के ऐतिहासिक स्रोतों में ब्रिटेन की भूमिका केंद्रीय रही है और औपनिवेशिक शासन के कारण भारत तक यह ढांचा पहुंचा. बाद में वैश्विक अर्थव्यवस्था ने बजट दस्तावेज़ों को मानकीकृत और पारदर्शी बनाने में भूमिका निभाई. फिर भी, भारत का बजट आज मुख्यतः भारतीय लोकतंत्र की जवाबदेही, भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों और भारतीय समाज के विकास लक्ष्यों से संचालित होता है. एक फरवरी का बजट इसलिए केवल वित्तीय दस्तावेज़ नहीं—यह इस बात का संकेत भी है कि देश अगले वर्ष किन प्राथमिकताओं को चुन रहा है, विकास, कल्याण, स्थिरता या इन सबका संतुलन.

Ramswaroop Mantri

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