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कुम्भकीय मिथक : क्या है शास्त्रीय अभिव्यक्ति का निहितार्थ 

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     कुमार चैतन्य 

     हमारे मिशन के डायरेक्टर डॉ. विकास मानवश्री को क़ुछ पाठकों ने लिखा : “कुम्भ पर जानकारी दें. विपक्ष में मत लिखना. आप पक्ष विपक्ष नहीं निष्पक्ष तथ्य लिखते हैं, लेकिन आपकी चेतना तक पहुंचने के लिए हम दोबारा जन्म लेंगे. अभी हमें भक्ति में जीने दें. इसलिये शास्त्र सम्मत बातें स्पस्ट करना.”

   उनके लिए यह मुश्किल काम था. उन्होंने मुझ को जिम्मेदारी सौंप दिया. मैं कितना सफल हुआ, मुझे नहीं पता 

 पढ़ें आप सभी मेरी यह अभिव्यक्ति.

       अनादि काल से मनुष्य के अन्दर अत्यधिक जीने की इच्छा जीवेष्णा रही है। मनुष्य जीने के लिए विभिन्न आयोजन करता रहता है मर रहा हो तो भी जीवन की लालसा बनी रहती है। आदमी अंधा हो जाए लंगडा हो जाए, लूला हो जाए, अपंग हो जाए, अपाहिज हो जाए, शरीर सड़ने लगे, कीड़े पड़ जाए, कैंसर हो जाए, कोढी हो जाए तो भी अधिक जीने की लालसा जीवेष्णा पीछा नहीं छोडती है। वह यही चाहता है कि किस प्रकार हम अधिक उम्र पा लें। 

     इसी कारण सदियों से लोग लम्बी आयु का वरदान लेते और देते रहे हैं। फिर भी मनुष्य की इच्छा यही रहती है कि वह कभी न मरे। अमर हो जाये। इसी कारण मनुष्य का अपने चारों ओर मरते हुए लोगों को देखकर, स्वयं भी मरेगा, यह सोच पाना कठिन हो जाता है। वह जीवन भर यही सोचता है दूसरे मरते होंगे। उनके अन्दर कोई बीमारी होगी। 

      दूसरे की मृत्यु के हजार कारण खोज लेता है। जिसमें अपने स्वयं को भुला देता है कि मुझे भी इसी तरह एक दिन मरना है। यह बात अलग है कि जब अचानक मौत आती है तो उसको हवा के झोंके की तरह मिटा जाती है। परन्तु जब तक मनुष्य जीवित रहता है तब तक स्वयं की मृत्यु का विचार नहीं कर पाता है। इसका कारण भय बताया जाता है कि प्रबल जीवेष्णा के कारण स्वयं की मृत्यु के विषय में, विचार करते ही वह भयभीत हो जाता है। 

     उसकी आत्मा, रूह तक कांप जाती है। इस कारण वह स्वयं को अपवाद समझने लगता है कि सब मरते होंगे, मैं अभी कहां मरूंगा?

       यहाँ गंभीरता से चिंतन करने की बात है। यहाँ विज्ञान का कार्य कारण का सिद्धांत कार्य करेगा कि यदि कोई वस्तु सामने दिखाई पड़ती है तो उसका वजूद जरूर पहले रहा होगा। दिखाई वर्तमान में पड़ती है, कारण भूतकाल में रहा होगा। यदि रेगिस्तान में कहीं झील दिखाई पड़ती है तो यह अचानक नहीं बन गई है इसके पीछे कोई न कोई जल का स्त्रोत रहा होगा जो उस समय दिखाई नहीं दे रहा था, आज विराट झील सामने दिखाई दे रही है। 

     पृथ्वी पर कोई विशाल वट वृक्ष खड़ा है तो पीछे उसका कोई कारण जरूर रहा होगा। कहीं अज्ञात में, सूक्ष्म में कोई बीज पृथ्वी के नीचे दबा होगा जो आज विराट वृक्ष के रूप में प्रकट है। बीज का विराट वृक्ष में प्रकट होना बीज की सम्भावना है। अन्यथा पृथ्वी में सड़ भी सकता था, गल भी सकता था। सभी बीज तो विराट वृक्ष नहीं बन पाते हैं। कार्य है तो कारण अवश्य रहा होगा। इसी प्रकार यदि मनुष्य सोचता है कि मैं नहीं मरूंगा दूसरे मरते होंगे। मनुष्य के अन्दर जो जीने की इतनी प्रबल जीवेष्णा है उसका भीतर कारण होगा कि अमृत का कोई बीज शरीर मन बुद्धि के भीतर कहीं अचेतन मन में अन्दर पड़ा होगा। 

     तभी तो वह स्वयं के न मरने का विचार अचेतन मन से करता है। परन्तु वह अमृत का बीज, बीज ही रह जाता है। कभी वृक्ष नहीं बन पाता है और मनुष्य अचानक मृत्यु के आगोश में समा जाता है। शरीर तो मरणधर्मा है। मगर इसके भीतर चेतना तो, अमरत्व को प्राप्त कर सकती है। अचेतन का कभी कोई बीज अंकुरित होकर वृक्ष बन पाता है। कहीं कोई शिव, कहीं कोई राम, कहीं कोई कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक आदि जैसा अमर वृक्ष देखने को मिलता है।

      मनुष्य कभी न मरे, अमृत का बीज जो भीतर अचेतन में पड़ा है। इसको कैसे अंकुरित और फलीभूत किया जाये। इसी विचार धारा के कारण धर्म और अध् यात्म का जन्म हुआ। कैसे मनुष्य अमर हो जाये? अमर होने के लिए अमृत की आवश्यकता होती है। भीतर अचेतन में पड़े अमृत के बीज को बाहर वृक्ष के रूप में प्रकट करने के लिए ऋषियों ने विधि खोजी थी, जिसे समुन्द्र मन्थन का नाम दिया गया है। विभिन्न पुराणों में कई प्रतीक कहानियों के रूप में वर्णन मिलता है।

      हिमालय के उत्तरी दिशा की ओर क्षीर सागर में देवताओं और असुरों ने मिलकर सागर का मन्थन किया। कछ्प अवतार के रूप में भगवान विष्णु कछुए के रूप में समुन्द्र तल पर बैठ गये। उनकी पीठ पर मन्दराचल पर्वत का दण्ड बनाया गया। समुन्द्र को मथने के लिए रस्सी के स्थान पर वासुकी नाग को साढ़े तीन फेरे लपेटा गया। मथने के लिए देवताओं ने वासुकी नाग की पूंछ की ओर पकड़ा और असुरों ने नाग के फन की ओर पकड़ा। समुन्द्र को मथना प्रारम्भ कर दिया। जिसमें चौदह रत्न निकले। 

     १. हलाहल विष, २. वारूणि, ३. पुष्पक विमान, ४. ऐरावत हाथी, ५. उच्चैनवा अश्व, ६. लक्ष्मी, ७. रम्भा, ८. चन्द्रमा, ९. कौस्तुभ मणि ,10. कल्पवृक्ष, 11. कामधेनु गाय, 12. वास्तुशास्त्र, 13. धन्वन्तरि वैद्युत, 14. अमृतकलश।

       इस प्रकार सर्वप्रथम हलाहल विष निकला और अन्त में अमृत कलश को लेकर भगवान धनवंतरि प्रकट हुए। यह अमृत कलश इन्द्र को दिया गया। इन्द्र ने जयंत को दिया। जयंत उस कलश को लेकर स्वर्ग की ओर भागने लगे। बारह दिनो तक लगातार भागते रहे, जिससे बारह स्थानों पर कुम्भ रखा गया। पीछे से असुर क्रोधित होकर कुम्भ को छीनने के लिए भागते रहे। इस कारण देवताओं और असुरों का घमासान युद्ध होता रहा। 

       इसे धर्म शास्त्रों में देवासुर संग्राम के नाम से जाना जाता है। यह संग्राम बारह दिनो तक चलता रहा। ब्रह्मा का एक दिन पृथ्वी के बारह वर्ष के बराबर होता है। इस गणना के अनुसार बारह वर्षों तक युद्ध चलता रहा। युद्ध के कारण अमृत कलश से पृथ्वी पर चार स्थानों पर तथा स्वर्गलोक में आठ स्थानों पर कलश से अमृत की बूंदे छलक कर गिर पड़ी।

       पृथ्वी पर हरिद्वार, इलाहाबाद, नासिक और उज्जैन में अमृतकी बूंदे गिरी। अतः पृथ्वी पर इन्हीं चार स्थानो में महाकुम्भ का पर्व मनाया जाता है। बाल्मीक रामायण, महाभारत, श्रीमद् भागवत, देवी भागवत, विष्णु पुराण आदि में विभिन्न रूपों में समुन्द्र मन्थन की कथा का वर्णन कई कथाओं में अलग-अलग देखने को मिलता है।

       समुन्द्र मन्थन में पहले विष निकला, जिसे शिव ने पिया और कंठ में रोक लिया। शिव को योगेश्वर कहा जाता है। यहाँ हलाहल विष का प्रयोग धार्मिक मृत्यु, मन बुद्धि की मृत्यु के लिए प्रयोग किया गया है। धर्म और ध्यान के क्षेत्र में जब तक मनुष्य अपना मन व बुद्धि चलाता रहता है, विचार और चिन्तन करता रहता है, वह विचार कितने ही धार्मिक क्यों न हो, तब तक परमात्मा के मूल अनुभवों से वंचित रहता है।

       परमात्म अनुभव के लिए मन का ठहर जाना, बुद्धि का स्थिर हो जाना पात्रता है। इसी अवस्था को निर्विचार कहा गया है। विचारों के मर जाने पर निर्विचार उपस्थित होता है। या कहें मन के मर जाने पर अ-मन उपलब्ध होता है। इसी मन को मारने के लिए हलाहल विष पैदा हुआ। विष के बाद जो अन्य बारह रत्न निकले ये रत्न योग की सिद्धियों के प्रतीक है। जिस मनुष्य ने विष के द्वारा मन को मार लिया, उसके सामने अनेकों सिद्धियां स्वतः प्रकट होने लगती हैं। यदि मनुष्य इन सिद्धियों के चक्कर में नहीं उलझा तो अन्त में मुक्ति रूपी अमृत को पीकर कैवल्य मोक्ष, निर्वाण का अनुभव करते हुए अमर हो जाता है।

     यह समुन्द्र मन्थन की पूरी कथा मनुष्य के अन्दर सुप्त कुण्डलिनी को जगाने की विधि का प्रतीकात्मक रूप में वर्णन है। इसमें कछुआ, मन्द्रांचल पर्वत, वासुकी नाग, छीर सागर, देवतागण, असुरगण, सागर मन्थन, हलाहल विष, चौदह रत्न और अन्त में अमृत कलश सभी कुण्डलिनी साधना के प्रतीक चिन्ह है।

      कछुआ जब कुण्डलिनी साधना के लिए बैठा जाता है तो शरीर स्थिर रहना चाहिए। इसी कारण आसनों में कूर्म आसन का नाम पड़ा। किसी एक आसन का अभ्यास, आपको अवश्य होना चाहिए, जिसमें आप शांत, स्थिर व जड़वत बैठ सकें। अपनी समस्त इन्द्रियों को कछुए की भांति सिकोड़ कर बैठना चाहिए। कछुआ अपने हाथ, पैर, मुख को अपने खोल के भीतर सिकोड़ कर शान्त हो जाता है। इसी प्रकार साधक को बैठना चाहिए। इसी प्रतीक को दर्शाने के लिए कछुए की पीठ पर समुद्र मंथन किया गया था। साधक जब कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है तो प्रथम मूलाधार चक्र सक्रिय होता है और मन्थन में ऊर्जा जाग्रत होती है। 

      यह विष का काम करती है। यदि साधक का चित्त थोड़ा भी कामातुर है, उस साधक के विचार सात्विक नहीं है तो यह ऊर्जा काम ऊर्जा बन जाती है। इसका परिणाम शोक, दुःख, पश्चाताप, निराशा, रोग और मृत्यु होता है। जब इस ऊर्जा को योग बल से ऊर्धगामी करके, इस विष के द्वारा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि समस्त बुरी प्रवृतियों को मार दिया जाता है। इसके पश्चात यह ऊर्जा कुण्डलिनी मार्ग के अन्तर्गत शक्तियों के स्त्रोत चक्रों को खोलते हुए आगे उर्ध्व मार्ग में गतिशील होती है। यदि ऊर्जा जग जाए और साधक को कुण्डलिनी ऊर्जा को उर्ध्वगामी मार्ग देने का ज्ञान नहीं है तो स्थिति गम्भीर हो जाती है।

       क्योंकि विज्ञान का नियम है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती है। तो यह ऊर्जा क्या करेगी? यह ऊर्जा

अन्तर चित्त वृत्ति के अनुसार स्वाभाविक पूर्व ज्ञान के मार्ग, काम ऊर्जा में बदल जायेगी। और साधक के विनष्ट का कारण बनेगी।

     इस प्रकार साधक के अन्दर देवी व आसुरी गुणों का युद्ध चलता रहता है। यही देवासुर संग्राम का प्रतीक है।

     दया करी गुरूदेव ने। कूरम को व्रत लेई।। सब इन्द्रिन को रोक कर। सुरत श्वांस में देई।। बिन रसना बिन माल के। अन्तर सुमिरन होय।।

    दया दया गुरूदेव की। बिरला ध्यावे कोय।। हृदय कमल में सुरत धरी। अजप जपै जो कोय।। विमल ज्ञान प्रगटे तहां। लख मख डारै खोय।।

       दया कहती है कि गुरूदेव ने हमारे ऊपर बड़ी कृपा की है। हमको कछुए का वृत लेना सिखा दिया है। कछुए से मुझे यह गुण मिल गया है कि ध्यान के समय पर साधना की स्थिति में अपनी समस्त इन्द्रियों को भीतर सिकोड़ कर, शान्त होने के पश्चात, अपनी आती-जाती श्वांस को, देखना अनुभव करना आ गया है। इससे मुझे बिना जीभ से बोले, बिना माला के, अन्तर जगत में परमात्मा के सुमिरन का मार्ग, मिल गया है। ऐसे ध्यान की विधि का अभ्यास बिरले लोग ही करते हैं। 

      गुरूदेव ने मेरे ऊपर बड़ी दया किया है कि इस विधि का अभ्यास व अनुभव करा दिया है। अब मैं उनके बताये मार्ग के अनुसार अपने हृदय में चित्त को स्थिर रख कर आती-जाती श्वांसों में अजपा सोहँ का जाप करती रहती हूँ। जिससे मुझे अन्तर ज्ञान का अनुभव होने लगा है।

      कुण्डलिनी जागरण विज्ञान के अन्तर्गत बहत्तर हजार नाड़ियों में से तीन नाड़ियों इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना व कुण्डलिनी का विशेष महत्व है। समुन्द्र मन्थन इन सभी नाड़ियों की कार्य विधि के गुणों की प्रतीक भाषा के रूप में अलंकारिक वर्णन है।

क्षीरसागर – संसार सागर का नाम ही क्षीर सागर है। जहां मनुष्य निवास करता है। 

      इसी संसार में रह कर परमात्मा के ज्ञान का, (मन्थन) मनन करना है। देश काल परिस्थितियों को अनुकूल बनाकर इसी संसार में रहते हुए अमृत रूपी आत्मतत्व को पाना है। जीवित मोक्ष को अनुभव करना है।

     वासुकी नाग- यह मेरूदण्ड के नीचे, स्वयं भू लिंग में साढ़े तीन फेरे लिपटी कुण्डलिनी नाड़ी का प्रतीक है।

    असुरगण – इनमें आसुरी शक्ति होती है। यह अविद्या के प्रतीक हैं। रंग काला है। स्वभाव से उग्र है। तामस गुण है। इड़ा नाड़ी इन सबका प्रतीक है।

    देवतागण – इनमें दैवीय शक्ति होती है। यह ज्ञान के देवता हैं। गोरा रंग होता है। स्वभाव से सरल है। दैवीय गुण से भरे हैं। पिंगला नाड़ी इन सबका प्रतीक है।

    मन्द्राचल पर्वत – मनुष्य शरीर के मेरूदण्ड स्पाईनल कॉर्ड के मध्य का

    स्थान सुषुम्ना नाड़ी का प्रतीक है। जिसके नीचे वासुकी नाग के रूप मेंn कुण्डल मारे कुण्डलिनी लिपटी रहती है।

     सूक्ष्म शरीर के बीचों बीच मेरूदण्ड में सुषुम्ना नाड़ी (मन्द्राचल पर्वत) इसमें मूलाधार के नीचे लिपटी कुण्डलिनी नाड़ी (वासुकी नाग) इसके दाहिने हाथ की ओर पूंछ की तरफ देवतागण (पिंगला नाड़ी) देवता सरल व विनम्र होते हैं। इनमें दैवीय शक्ति होती है। इस कारण समुन्द्र मथने में पूंछ का भाग पकड़े हैं। मेरूदण्ड के बायें हाथ की ओर नाग का फन और असुरगण (इड़ा नाड़ी), असुर तामसी शक्ति से भरपूर होते हैं। इस कारण यह वासुकी नाग का फन पकड़े हैं। यह पूर्ण विवरण मनुष्य शरीर के अन्दर सुप्त परमात्मा, कुण्डलिनी शक्ति जागरण हेतु व उसकी विधि का अन्तरंग चर्चा के विषय में प्रतीकात्मक चित्रण है। यह तप के रूप में की जाती है। अन्त में परिणाम स्वरूप अमरता (अमृत कुम्भ) आत्म साक्षात्कार, प्राप्त होता है।

      श्वेताश्वरोपनिषद में आया है कि दो अरणियों के आपस में घिसने से अग्नि पैदा होती है। जैसे वैदिक काल में हवन में लकड़ियों के मन्थन से अग्नि पैदा की जाती थी। अग्नि लकड़ियों में ही छिपी होती है। इसी प्रकार हमारे शरीर के अन्दर कुण्डलिनी नाम की अग्नि, परमात्म रूप में छिपी है जो उपरोक्त समुन्द्र मन्थन करने से प्रकट हो जाती है। यही अमृत रूपी आग है। यह दिव्य अग्नि है। शीतलता व आनन्द के साथ दिव्य शक्तियों को प्रदान करते हुए, अन्त में अमर, मुक्त बना देती है। यही वास्तविक अमृत कलश का महा कुम्भ स्नान है। यह आत्म स्नान है। 

      समुन्द्र मंथन की पूर्ण अन्तर क्रिया, द्वेत में घटा अद्वेत का अनुभव है। द्वेत में हलाहल विष पैदा होता है। समुन्द्र मंथन पश्चात परिणाम स्वरूप अमृत कलश निकला है। द्वेत का अनुभव विष, अद्वेत का अनुभव अमृत है समुद्र मंथन की पूर्ण क्रिया, द्वेत में घटा अद्वेत का अनुभव है।

*AI का समय और सत्य :*

        समय परिवर्तन शील है. बदलता रहता है. विज्ञान की दुनिया में, AI के जमाने  मे नवीनतम खोजो की गति बहुत तेज होती जा रही है। नई पीढ़ी मे एक धारणा लगातार जन्म ले रही है कि धर्म को विज्ञान की दृष्टि से खरा यानी सत्य उतरना चाहिये। जबकि ऐसा न कभी सत्य न था,न है और न आने वाले भविष्य मे हो सकता है। विज्ञान कभी धर्म को नही,पकड सकता है।

      जिस धर्म को या आध्यात्म को विज्ञान सिद्ध कर देगा। वह आध्यात्म व धर्म  नही होगा  या होगा तो धर्म के नाम पर और कुछ और  पाखण्ड चल रहा होगा।  विज्ञान या वैज्ञानिक जिसको अपनी प्रयोग शाला मे सिद्ध कर देगे, वह धर्म नही, धोखा या पाखण्ड होगा। आईन्टीन जैसे वैज्ञानिक जिसने विज्ञान के क्षेत्र मे सैकडो नवीनतम खोजे की, उसके जीवन के आखिरी पहर का वक्तव्य है। 

     जब उनसे पूछा गया कि  आपने अभी तक इतनी खोजे की अब बुढ़ाने मे आप क्या कर रहै है, तो उसने कहा कि अब मै इस आईन्सटीन के अन्दर उस आइन्सटीन की खोज कर रहा हू, जिसने इतनी खोजे की। मेरे अन्दर खोज करने वाला कोई और ही था अब मै उसी की खोज कर रहा हू। यह है धर्म और आध्यात्म। 

      अत:धर्म और आध्यात्म  बिषय के प्राचीन रुढिवादी विचारा धारा को बदलने की आवस्यकता है। लोग सोचने लगे है कि  पूजा पाठ जप तप ध्यान यह सब,अधिक उम्र यानी बुढ़ापे की आवश्यकता है।

    जबकि ऐसा नही है यह सब केवल  श्रृद्धा और विस्वास पर ही  निर्भर नही होता है यह  मनुष्य शरीर का विज्ञान है, जिसको तीन भागो मे बाट सकते है :

    01- शरीर का विज्ञान,-यह जवानी की आवस्यकता है। इससे शरीर और मन के सभी स्वास्थ्य ओर रोग के बिषय आते है। 

02- सूक्ष्म शरीर का विज्ञान-यह जवानी की आवस्यकता है।इसमे मनुष्य के अन्दर सोई हुयी शक्ति जिसे सस्पेन्ट पावर कुण्डलिनी कहते है।को जगाने के विषय मे है।  इससे धीरे धीरे अतीन्द्रिय ज्ञान होने लगता है,  अदृष्य की शक्ति का अनुभव होने लगता है।  आत्म बल बढता है।डर भय दूर होने लगता है। आज कल कम्प्यूटर और नेट वर्किंग का युग है आप लोग बी टेक,एम टेक, बी सी ए, एम सी ए, सी टेट, एस एस सी, यू पी एस सी, मेडिकल आदि से सम्बन्धित होगे। ।मार्केटिंग ,व्यापार,नौकरी,कम्यूटर, नेट वर्किंग आदि का कार्य करते होगे। ।उसमे नये नये आईडिया की आवस्यकता पडती रहती है वह ध्यान के अभ्यास से मन मे स्वत: ही आने लगते है। यह सब जवानी की आवस्यकताएँ हैं।

   03- कारण शरीर का विज्ञान- यह बुढ़ापे की आवस्यकता है, इसके अन्तरगत, शान्ति, शकून, आनन्द, ,मोक्ष, निर्वाण, कैवल्य, निर्विकार समाधि ,सहज समाधि, आदि आते है। 

इस प्रकार हर आयु मे ध्यान साधना के लाभ प्राप्त किये जा सकते है.

*ध्यान साधना के लाभ :*

1. ध्यान साधना करने से सभी प्रकार का टेन्शन व ड्रिप्रेशन समाप्त हो जाता है। किसी भी प्रकार का नशा, व ड्रग्स लेने की आवस्यकता नही होती है।*

2. आनन्दित व खुश रहने की कला आ जाती है. क्रोध अधिक आता है, तो धीरे धीरे कम होते होते समाप्त होने लगता है,*

3. स्मरण शक्ति का विकास होगा, आई क्यू का लेबिल बढने लगता है।

      4. मानसिक रोग जैसी समस्याएँ कभी पैदा ही नही होती है। सेक्स क्षमता में क्रन्तिकारी विकास होता है. बूढ़ापे में भी बुढापा महसूस नहीं होता.

5. नीद अच्छी आने लगेगी. शरीर और मन मे नयी चुस्ती और फुर्ती आयेगी. व्यक्तित्व मे  आकर्षण पैदा होने लगेगा।

6. भविष्य के शुभ संकेत मिलने लगते है. मन से एक बोझ सा उतराj महसूस होगा, और अपने को बहुत हल्का महसूस करने लगेगे.हर समय प्रशन्न चित्त रहेगे. हर समय रहने वाली चिडचिडाहट, बेचैनी, उलझन, समाप्त हो जायेगी.

7. जीवन मे उदासीपन, नीरसता, व्याकुलता दूर हो जायेगी. मन हर समय सन्तुष्ट, और शकून से भरा रहेगा.ध्यान योग साधना यदि निरन्तर,लगातार कई वर्षो तक जारी रखी जाय तो intuition, यानी अन्तर ज्ञान होने लगता है, और साधक अन्तर मुखी होने लगता है।

Ramswaroop Mantri

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