अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

*क्या है गंगा के पहाडों से मर्त्यलोक में अवतरण का अर्थ* 

Share

          प्रखर अरोड़ा

पुराणों में पहाडों को पुरुष कहा गया है जो पृथ्वी  का नियन्त्रण करते हैं।

अपनी देह के स्तर पर ऐसा कहा जा सकता है कि किसी घटना विशेष के कारण जो हारमोन हमारी देह में श्रवित होते हैं, वह जब रक्त की धारा में मिलते हैं तो हमारी प्रकृति में, व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है।

       यदि कामुक प्रकार के हारमोन स्रवित हो रहे हैं तो हम कामुक बन जाएंगे, यदि क्रोध के हारमोन स्रवित हो रहे हैं तो हम क्रोधित हो जाएंगे, सारा रक्त गर्म हो जाएगा। प्रश्न यह है कि क्या हारमोन के स्रवित होने और रक्त की धारा में मिलकर हमारे स्वभाव में परिवर्तन होने में कोई समय लगता है अथवा यह कार्य तुरन्त हो जाता है। हो सकता है दोनों ही स्थितियां हों। ऐसा भी हो सकता है कि जब तक हारमोन का अपनी ग्रन्थि विशेष से स्रवण नहीं हुआ है, वह निष्क्रिय स्थिति में है, तब तक उसे पर्वत पर  स्थित कहा गया हो।

उदाहरण के लिए, पैंक्रियस ग्रन्थि से इंसुलिन स्रवित होता है।

यह स्रवण तब होता है जब हम भोजन करते होते हैं। ऐसी स्थिति में पैंक्रियस गन्थि को पहाड कहा जा सकता है और हमारी देह को मर्त्य लोक।

  ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र या उसके निकट रहता है।

    ज्येष्ठ मास की दशमी तिथि में चन्द्रमा प्रायः हस्त नक्षत्र के निकट ही रहता है। हस्त का अर्थ हो सकता है – जो क्रिया के लिए प्रेरित करे – सवितुः प्रसविताभ्यां अश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णोर्हस्ताभ्यां। उपरोक्त दशाएं यदि भौतिक रूप से पूरी कर भी ली जाएं, तब भी इनका आगे आध्यात्मिक अर्थ खोजना पडेगा।

दशमी तिथि का एक अर्थ होता है…. जो दसों दिशाओं में फैला हो। दशमी तिथि को जिन प्राणों की प्रतिष्ठा होती है, उन्हें विश्वेदेव कहा जाता है। समझा जाता है कि यह प्राण ऐसे हैं कि इन्हें कहीं भी रख दिया जाए, यह अपने आपको परिस्थिति के अनुकूल विकसित कर लेंगे। दूसरी ओर, एकादशी के प्राण विशिष्ट प्रकार के हैं। यह ऐसी ही स्थिति है जैसे आज के भौतिक विज्ञान में बोस–आईन्स्टीन सांख्यिकी और फर्मी–डिराक सांख्यिकी। दशमी के प्राण अनादिष्ट हैं, स्केलर हैं, एकादशी के प्राण दिष्ट हैं, वैक्टर हैं।

   चिकित्सा विज्ञान में स्टेम कोशिकाओं का दिया जा सकता है जिनसे किसी भी प्रकार की विशिष्ट कोशिका का निर्माण किया जा सकता है।

    मर्त्यलोक में गंगा के प्रवेश के लिए गंगाद्वार या हरिद्वार या मायापुरी स्थल को चुना गया है। यह अन्वेषणीय है कि इस द्वार के क्या गुण होने चाहिएं। यदि यह माना जाए कि हमारी देह में हमारा पदांगुष्ठ द्वार है तो उसकी तुलना वनस्पति जगत की मूल से की जानी चाहिए। हमारा पदांगुष्ठ तो ब्रह्माण्ड की तरंगों को अवशोषित करने में अवरुद्ध रहता है लेकिन वनस्पतियां तो अपनी आवश्यकता का एक बडा भाग मूल से ही प्राप्त करती हैं। वनस्पति मूल का एक कार्य यह रहता है कि जिस द्रव का, जल का वह अवशोषण करती हैं, उसमें से जो हानिकारण तत्त्व हैं, वह मूल में ही अटके रह जाते हैं। पशु जगत में मूल का स्थान मुख ने ले लिया है।

पशु ब्रह्माण्ड की ऊर्जा का, गंगा का अवशोषण मुख द्वारा करते हैं। मुख की यह विशेषता है कि वह भोजन के हानिकारक तत्त्वों को यथाशक्ति निष्क्रिय करने का प्रयत्न करता है। पशुजगत भले ही ऊर्जा का अवशोषण मूल से न करता हो, लेकिन जठर में पाचन के पश्चात आगे शोधन का कार्य पादमूल से आरंभ होता है।

    हमारे पद जो रस शोधन करके देते हैं, वह देह के ऊपर के भागों को प्राप्त होता है, उन भागों से अन्त में वह सिर को प्राप्त होता है। यह अन्वेषणीय है कि भौतिक स्तर पर जिस द्वार – हरिद्वार की प्रतिष्ठा की गई है, वह शोधन का कार्य किस प्रकार करता है। हरिद्वार की प्रतिष्ठा में एक कार्य तो यह किया गया है ( नारद पुराण ) कि वहां चार दिशाओं में विशिष्ट लक्षणों की प्रतिष्ठा कर दी गई है। पूर्व दिशा में त्रिपथगा गंगा, दक्षिण दिशा में कनखल में दक्ष के यज्ञ का भंग करने वाले रुद्र देवता, पश्चिम दिशा में कोटितीर्थ तथा उत्तर दिशा में सप्तगंगा(सप्तर्षि आश्रम) की प्रतिष्ठा कर दी गई है।

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें