–सुसंस्कृति परिहार
आइए जानते हैं आम लोगों को जहां जज द्वारा किसी मामले में स्वत: संज्ञान लेने पर जहां खुशी व्यक्त की जाती है वहीं पिछले कुछ वर्षों से ऐसे जज के प्रति सरकार की नाराज़गी साफ़ दिखाई दे रही है।इसकी वजह की पड़ताल करते समय यह देखना और समझना होगा कि वे कौन से मुद्दे हैं जिन पर स्वत: संज्ञान जज ने लिया है।
अब तक प्राप्त जानकारी के मुताबिक पहला मौका तब देखने मिला जब हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश को पहले छत्तीसगढ़ भेजने की सिफारिश की गई लेकिन दमोह की पिछड़े वर्ग के द्वारा पंडित की पैर धुलाई पर त्वरित स्वत: संज्ञान लेते हुए दोषियों को रासुका के तहत कार्रवाई के आदेश पुलिस अधीक्षक को दिए इतना ही दूसरे दिन कार्रवाई में हीला हवाई करने कुछ धाराओं को छोड़ने के लिए दमोह जिला पुलिस अधीक्षक को फटकार लगाई।इस घटना ने भारत सरकार इतना दिल दुखाया कि उन्होंने तत्काल कालेजियम को निर्देश दिया कि उन्हें छत्तीसगढ़ नहीं इलाहाबाद भेजा जाए।

यह स्थानांतरण इसलिए किया था कि वे वहां शीघ्र ही मुख्य न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होते ही इस पद पर पदस्थ हो जाते जो सरकार के लिए हितकर नहीं होता। इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजने पर उनकी सीनियारिटी का लाभ मिलने से पहले वे सेवानिवृत्त हो जाएंगे।
14 अक्टूबर 2025 को सुनवाई के दौरान जस्टिस ने टिप्पणी की थी कि, “ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र सभी अपनी स्वतंत्र पहचान का दावा कर रहे हैं। यदि इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो डेढ़ सदी के भीतर खुद को हिंदू कहने वाले लोग आपस में लड़कर अस्तित्वहीन हो जाएंगे।” सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस श्रीधरन को पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजने की अनुशंसा की थी, लेकिन केंद्र सरकार के अनुरोध पर आदेश संशोधित कर उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया गया। इस ट्रांसफर के बाद उनकी सीनियरिटी सातवें नंबर पर रहेगी।
जस्टिस श्रीधरन ने 2016 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभाला था। इससे पहले वे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम के चेंबर में पांच साल कार्यरत रहे और फिर इंदौर में वकालत शुरू की। 2023 में उन्होंने स्वेच्छा से स्थानांतरण की मांग की थी, जिसके बाद उन्हें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट भेजा गया था।
दमोह मामले में उनके सख्त रुख के कारण पुलिस ने पांच आरोपियों पर एनएसए के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया। जस्टिस श्रीधरन के अन्य प्रमुख स्वत: संज्ञानों में शामिल हैं:
- 14 मई 2025 – मंत्री विजय शाह के कर्नल सोफिया कुरैशी पर दिए बयान पर संज्ञान, एफआईआर के निर्देश।
- 22 सितंबर 2025 – शिवपुरी के एडिशनल सेशन जज के खिलाफ न्यायिक मर्यादा उल्लंघन पर संज्ञान।
- 14 अक्टूबर 2025 – दमोह पैर धुलवाने प्रकरण में दोषियों पर एनएसए के तहत कार्रवाई।
सख्त, निष्पक्ष और बेबाक न्यायाधीश के रूप में पहचाने जाने वाले जस्टिस श्रीधरन के आदेश कानूनी दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के स्तर पर भी महत्वपूर्ण रहे हैं।
लेकिन उनके ये स्वत: संज्ञान लिए गए निर्णय सरकार के मनुवादी संविधान के विरुद्ध ठहरते हैं। इसलिए जस्टिस श्रीधरन और उनके निर्णय सरकार को परेशान करते रहे हैं इसलिए उन्हें इस तरह विदाई देने का कार्यक्रम बनाया गया है।
इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि जातीय भेदभाव मामले में सरकार का रुख क्या है।उधर सेना की प्रवक्ता कर्नल सोफिया मामला भी उनकी स्त्री के प्रति अवधारणा के साथ एक मुस्लिम महिला के प्रति नफ़रत भरी सोच है।
इन घटनाओं से तो अब ये लगता है कि कहीं दलित पुलिस अधिकारी की मौत के लिए जिम्मेदार उच्च जाति के अधिकारियों को किसी जज ने उन्हें दोषी माना तो उसकी खैर नहीं।ऐसा ही हाल शरजील की जमानत का हो रहा है जज दबाव में हैं।यदि कुछ सरकार विरुद्ध करते हैं तो वे भी श्रीधरन जैसी सजा या जस्टिस रोया जैसे हाल में पहुंच सकते हैं। लेकिन सभी एक जैसे नहीं होते ना सरकार के गुलाम। संविधान सर्वोपरि है ना कि सरकार।





