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बापू की हत्या पर क्या थी भारत और दुनिया की प्रतिक्रिया, पढ़िए यहाँ…

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30 जनवरी बहुत ही दुखद दिन है। यह सपनों के टूटने,अरमानों के ध्वस्त होने और आशाओं के बिखरने का दिन है। कन्नड़ के एक जानेमाने कवि ने लिखा कि 30 जनवरी 1948 को भारत में जो हुआ, उसके बाद क्या हुआ यह तो मैं नहीं जानता पर एक बात निश्चित रूप से समझ गया था कि 31 जनवरी की सुबह सूरज नहीं उगेगा।

31 जनवरी की सुबह सूरज भी उगा और उगना भी था क्योंकि गांधी का मतलब ही है अंधकार से आगे निकलकर चलना। मौत में से निकलकर जिंदगी को खोजना। 30 जनवरी 1948 को जो हुआ हम सब भारतवासी उसे रोक नहीं सके। यह दिवस इस बात का संकल्प भी है कि आगे हम ऐसा न होने दें। प्रायश्चित का मतलब यही है कि उसके साथ एक संकल्प भी जुड़ा हुआ है वो सिर्फ पछतावा ही नहीं है।

आज हम आपको बताते है की बापू के हत्या के बाद जहा देश भर में मातम का माहौल छा गया था, वही दुनिया भर में ग़ांधी जी की मौत से सनसनी फैल गई थी| दुनिया भर के दिग्गज हस्तियों ने गाँधी जी की हत्या पर अपनी प्रतिकिया व्यक्त की थी|

किसने क्या कहा

जवाहरलाल नेहरू-

‘’The light has gone and there is darkness everywhere.I don’t know what to tell you and how to say that our beloved leader Bapu as we call him the ‘’ Father of Nation” is no more.’’

(हमारे बीच से रोशनी चली गयी है और सर्वत्र अंधेरा छा गया है | मैं कैसे और किन शब्दों में कहूँ कि हमारे पूज्य बापू जिन्हें हम राष्ट्रपिता भी कहते हैं अब हमारे बीच नहीं रहे |)

प्रोफेसर अल्बर्ट आइन्स्टीन ने दृढ़ता से कहा है-

गांधी ने सिद्ध कर दिया कि केवल प्रचलित राजनैतिक चालबाजियों और धोखाधडि़यों के मक्कारी-भरे खेल के द्वारा ही नहीं, बल्कि जीवन के नैतिकतापूर्ण श्रेष्ठतर आचरण के प्रबल उदाहरण द्वारा भी मनुष्यों का एक बलशाली अनुगामी दल एकत्र किया जा सकता है।’’

संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपना झंडा चुका दिया

गांधीजी की मृत्यु पर संसारव्यापी प्रतिक्रिया स्वयं ही एक महत्वपूर्ण तथ्य था। उसने एक व्यापक मनःस्थिति और आवश्यकता को प्रकट कर दिया। न्यूयार्क के ’पीएम’ नामक समाचारपत्र में एल्बर्ट ड्यूत्श ने वक्तव्य दिया। ’’जिस संसार पर गांधी की मृत्यु की ऐसी श्रद्धापूर्ण प्रतिक्रिया हुई। उसके लिए अभी कुछ आशा बाकी है।’’

उपन्यास लेखिका पर्ल एस. बक ने गांधीजी की हत्या को ’ईसा की सूली’ के समान बतया

जापान में मित्रराष्ट्रों के सर्वोच्च सेनापति जनरल डगलस मैकआर्थर ने कहा-

’’सभ्यता के विकास में, यदि उसे जीवित रहना है। तो सब लोगों को गांधी का यह विश्वास अपनाना ही होगा कि विवादास्पद मुद्दों को हल करने में बल के सामूहिक प्रयोग की प्रक्रिया बुनियादी तौर पर न केवल गलत है बल्कि उसीके भीतर आत्मविनाश के बीज विद्यमान हैं।’’

न्यूयार्क की 12 साल की एक लड़की ने रसोईघर में किया था मौन

न्यूयार्क में 12 साल की एक लड़की कलेवे के लिए रसोईघर में गई हुई थी। रेडियो बोल रहा था और उसने गांधीजी पर गोली चलाए जाने का समाचार सुनाया। लड़की, नौकरानी और माली ने वहीं रसोईघर में सम्मिलित प्रार्थना की और आँसू बहाए। इसी तरह सब देशों में करोड़ों लोगों ने गांधीजी की मृत्यु पर ऐसा शोक मनाया, मानो उनकी व्यक्तिगत हानि हुई हो।

सर स्टैफर्ड क्रिप्स ने लिखा था-
’’मै किसी काल के और वास्तव में आधुनिक इतिहास के ऐसे किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं जानता, जिसने भौतिक वस्तुओं पर आत्मा की शक्ति को इतने जोरदार और विश्वासपूर्ण तरीके से सिद्ध किया हो।’’

गांधी जी के लिए शोक करने वाले लोगों को यही महसूस हुआ। उनकी मृत्यु की आकस्मिक कौंध ने अनंत अंधकार उत्पन्न कर दिया। उनके जमाने के किसी भी जीवित व्यक्ति ने, महाबली प्रतिपक्षियों के विरुद्ध लंबे और कठिन संघर्ष में सच्चाई, दया, आत्मत्याग, विनय, सेवा और अहिंसा का जीवन बिताने का इतना कठोर प्रयत्न नहीं किया और वह भी इतनी सफलता के साथ। वह अपने देश पर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध और अपने ही देशवासियों की बुराइयों के विरुद्ध तीव्र गति के साथ और लगातार लड़े परंतु लड़ाई के बीच भी उन्होंने अपने दामन को बेदाग रखा। वह बिना वैमनस्य या कपट या द्वेष के लड़े।(सप्रेस) श्री लुई फिशर की पुस्तक ’’गांधी की कहानी’’ के अंश।
साभार
Gandhi Darshan – गांधी दर्शन

Ramswaroop Mantri

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