अगले चुनावों में क्या है उम्मीद की किरण… .
हिमांशु जोशी
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले और अब भी उत्तर प्रदेश में कोरोना की वजह से कई घरों की आर्थिक हालत खराब है, महंगाई और बेरोज़गारी की वजह से गरीब तबका परेशान है। आवारा पशुओं से खेती का नाश हो रहा है और उन्हें भगाने के लिए परिवार के सदस्य बारी-बारी से खेतों में जमे हुए थे।
चुनावों तक फिर भी लोग यह कहते रहे कि योगी ठीक है, जानवर हमने छोड़े हैं योगी ने नही। नतीज़े भी वही हुए, उत्तर प्रदेश में भी भाजपा फिर से सत्ता पर काबिज़ हुई।
सपा ने चुनाव लड़ने में अपनी पूरी ऊर्जा लगाई थी, टिकट बंटवारे में वह सही थे पर फिर भी उनकी हार हुई। चुनाव के नतीजों का विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि सपा ने चुनाव की तैयारी चुनाव से दो-तीन महीने पहले से शुरू की थी। वहीं बीजेपी काफी समय पहले से ही चुनाव तैयारी में लग गई।सपा के पास गांव वालों से संचार की कोई रणनीति नही थी जबकि बीजेपी जो कह रही थी वही शब्द गांव वाले भी बोलते थे।जैसे बीजेपी ने गरीबों राशन दिया, सपा वाले सत्ता में आते हैं तो गुंडागर्दी करते हैं जैसे सन्देश जन-जन के बीच फैल चुके थे।
इसका मतलब बीजेपी के प्रचार तंत्र और उसमें खास तौर पर उनकी आईटी सेल का कोई तोड़ नही निकाल पाया।यह बात तो तय है कि जियो क्रांति का फायदा बीजेपी ने जमकर उठाया है।
सपा, बसपा या कांग्रेस कोई भी पार्टी बीजेपी की तरह अपनी नीतियों को जनता के बीच नही पहुंचा सकी।गरीबों को राशन पहले भी बांटे जाते थे पर उसके झोलों में प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ मुख्यमंत्री की तस्वीर कभी नही देखी गई थी।उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश दोनों जगह इस तरह के झोले देखे गए। मेट्रो भी योगी-मोदी के बहुत से विज्ञापनों से भरी देखी गई थी।
भाजपा की जल्द तैयारी की वजह से सपा ने जब तक अपना चुनाव प्रचार शुरू किया चुनावी नतीजे तय हो चुके थे। बीजेपी ने अपना फोकस उन वोटरों पर रखा था जो बीजेपी के पारंपरिक वोटर कभी नही थे और सपा अपने पक्के वोटरों को ही पकड़ कर बैठे रही।
पूरे देश भर में यही बात अन्य पार्टियों पर भी लागू होती है, विपक्षी दलों के सभी सदस्य जनता के उसी हिस्से से बात करते हैं जो उनकी बातों या विचारों से हां में हां मिलाते हैं। विपक्षी दल उन लोगों से बात ही नही करते या यूं कहें कि उन विचारों में घुसपैठ नही कर पाते जो उनसे संवाद करने की इच्छा नही रखते।
भाजपा ने देश में अधिकांश व्यक्तियों के मन में जगह बना ली है, उन्होंने जनता के मन में एक लकीर सी खींच दी है। जो अब भाजपा को अपना और दूसरों को पराया समझने लगी है।
भारत में राजनीति तीन मुद्दों पर की जाती है। राष्ट्रवाद, धार्मिक विरासत और सांस्कृतिक विरासत।आज आप गौर से देखेंगे तो बीजेपी ने इन तीनों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया है।आप देखेंगे कि राष्ट्रवाद को भाजपा जमकर भुनाती है , धार्मिक विरासतों पर नाम बदल-बदल कर धीरे-धीरे कब्ज़ा जमाया जा रहा है और सांस्कृतिक विरासतों को संभालने या विकसित करने के नाम पर जनता को साथ मिला दिया जाता है।
कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दलों ने इन तीन मुद्दों को हमेशा से हल्के में लिया था पर भाजपा इन तीन मुद्दों पर ही केंद्रित रही ।
भाजपा के बेहतरीन होम वर्क को भी उनकी जीत का श्रेय जाता है। गुजरात में इस साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी भाजपा ने अभी एक महीने पहले से ही शुरू कर ली है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वहां चुनावी रैली निकाली थी।
विपक्ष पार्टियों को अगर एकजुट होना है तो उन्हें संसद से बाहर निकल कर सड़क पर जनता से संवाद स्थापित करना होगा।यहां पर उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार Rajiv Nayan Bahuguna का बयान महत्वपूर्ण हो जाता है कि ‘कांग्रेस अब सड़क पर आने वाली पार्टी नही रही।’ विपक्षी पार्टियों को ऐसी बातों पर भी गौर फरमाना होगा।
किसान आंदोलन से सीख ली जा सकती है
किसान आंदोलन जनता से संवाद स्थापित कर किला फ़तह करने का सबसे बड़ा उदाहरण रहा। ‘आप’ की पंजाब में जीत इसका उदाहरण है, हालांकि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विपक्षी दल इससे पूरा लाभ नही ले सके पर फिर भी एक ज़मीन तो तैयार हुई ही है। हम कह सकते हैं कि जनता किसी बात को समझती है तो विकल्प की तरफ जरूर जाती है।
गोदी मीडिया पर कई बार बात होती है कि मीडिया भी वोटरों को प्रभावित कर रही हैं लेकिन यहां यह बात गौर करने वाली है कि अभी वैकल्पिक मीडिया भी अच्छा काम कर रही है। वैकल्पिक मीडिया के ज़रिए आपके पास सच और झूठ में अंतर करने की समझ बनती है।
किसान आंदोलन में हमने देखा कि आपसी संवाद की वजह से गोदी मीडिया की हार हुई थी,लोगों ने गोदी मीडिया को दरकिनार कर दिया था। वहीं वैकल्पिक मीडिया से जुड़े किसान आंदोलन को निष्पक्ष तरीके से कवर कर रहे SAKSHI JOSHI और Ajit Anjum जैसे पत्रकारों का किसानों द्वारा दिल खोल कर स्वागत किया गया।
क्या रहे भाजपा के जीत के कारण और कहां चूक गया विपक्ष…






