पटना. बिहार के सासाराम में राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ में रविवार को एक ऐसा सीन देखने को मिला, जिसको देखकर राजनीतिक पंडित भी अचरज में पड़ गए. जिस राहुल गांधी ने साल 2013 में लालू यादव को जेल में सड़ाने के लिए मनमोहन सरकार का अध्यादेश फाड़ा था, उसी लालू यादव को राहुल सासाराम रैली में पानी पिला रहे थे. इतना ही नहीं उसी लालू यादव के घर पर जाकर राहुल गांधी मटन बनाना भी सीख चुके हैं. राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार रैली’ की शुरुआत हो चुकी है. 17 दिनों तक राहुल गांधी की यह यात्रा बिहार के 20 से ज्यादा जिलों से गुजरेगी. लेकिन रविवार को लालू यादव को जिस अंदाज में राहुल गांधी ने सम्मान दिया, वह बताता है कि आरजेडी के साथ उनकी दोस्ती वक्त की मांग है और यह लंबी चलेगी. राहुल कांग्रेस को बिहार में न केवल जिंदा रखने का प्रयास कर रहे हैं, बल्कि 2029 में पीएम बनने की अपनी उम्मीदों को जीवित रखना चाहते हैं.

राजनीति में न दोस्त स्थायी होते हैं और न दुश्मन. वक्त, सत्ता और हालात हर समीकरण को बदलने की ताकत रखते हैं. बिहार के सासाराम में आयोजित राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ की रैली में जब राहुल गांधी ने मंच पर लालू प्रसाद यादव को पानी पिलाया और गले लगाया तो यह दृश्य सियासी नजरिए से केवल एक ‘तस्वीर’ नहीं था. यह भारतीय राजनीति में वक्त और वजूद के बदलते समीकरणों का आईना था. साल 2013 की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा है. उस वक्त कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक अध्यादेश लेकर आई थी, जिससे दोषी करार दिए गए सांसदों-विधायकों की सदस्यता रद्द होने से बचाई जा सके. यह अध्यादेश लालू यादव समेत कई नेताओं के लिए ‘संजीवनी’ माना जा रहा था, जिन पर भ्रष्टाचार के मामलों में सजा हो चुकी थी या सजा का खतरा मंडरा रहा था. लेकिन, तभी राहुल गांधी मीडिया के सामने आए और इस अध्यादेश को ‘पूर्णतया बकवास’ बताते हुए उसको फाड़ दिया. यह न केवल कांग्रेस के लिए बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सरकार के लिए सीधा सार्वजनिक अपमान था.
जब राहुल ने ‘अध्यादेश’ फाड़ा था
बता दें कि 2013 में यूपीए-2 सरकार संकटों से घिरी थी. भ्रष्टाचार के आरोपों और आर्थिक मंदी ने उसकी साख को कमजोर कर दिया था. अन्ना आंदोलन चल रहा था. इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई 2013 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि कोई भी सांसद या विधायक, जिसे दो साल या उससे अधिक की सजा होती है वह तत्काल अपनी सदस्यता खो देगा. यह फैसला लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं के लिए बड़ा झटका था, जो चारा घोटाले में मुकदमों का सामना कर रहे थे. यूपीए सरकार ने इस फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए एक अध्यादेश लाने का फैसला किया, जिसे कैबिनेट ने मंजूरी भी दे दी. लेकिन राहुल गांधी ने 27 सितंबर 2013 को इस अध्यादेश को फाड़कर अपनी ही सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया.
अब पिला रह हैं पानी
राहुल गाधी का यह कदम न केवल एक साहसिक था, बल्कि लालू जैसे सहयोगी दलों के लिए अपमानजनक भी माना गया. इसके बाद ही लालू यादव को चारा घोटाले के मामले में जेल जाना पड़ा. कहा गया कि अगर वह अध्यादेश पास हो गया होता तो लालू की सदस्यता बच सकती थी. लेकिन 12 साल बाद उसी लालू यादव को राहुल गांधी मंच पर न केवल सम्मान दे रहे हैं, बल्कि गर्मजोशी से गले मिल रहे हैं और पानी पिलाकर उनका ख्याल रखते नजर आते हैं. यह सीन केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति से भरा हुआ है.
क्या 2029 की पटकथा लिखी जा रही है?
राजनीतिक विश्लेषक संजीव पांडेय कहते हैं, ‘राहुल जानते हैं कि बिहार में कांग्रेस अकेले चुनावी जमीन पर नहीं टिक सकती. पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. ऐसे में राष्ट्रीय जनता दल और लालू परिवार के बिना बिहार में कांग्रेस की वापसी नामुमकिन सी लगती है. कांग्रेस इस समय अपने इतिहास के सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है. राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की स्वीकार्यता घट रही है और राज्यों में संगठन कमजोर है. वोट अधिकार यात्रा चाहे जितनी नैतिक बातों से भरी हो उसका असली उद्देश्य राजनीतिक पुनर्जीवन है.’
लालू ने ऐसे लूटी राहुल की ‘महफिल’
बिहार के सासाराम में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘वोटर अधिकार रैली’ में लालू यादव ने तकरीबन एक से डेढ़ मिनट के भाषण में ही लहेरिया लूट लिया. लालू यादव ने जैसे ही कहा ‘लागल-लागल झुलनियां में धक्का, बलम कलकत्ता चला’ लोग झूमने लगे. बिहार की राजनीति में लालू जब माइक पकड़ते हैं तो शब्द ही नहीं, बल्कि उनका अंदाज भी लोगों को खूब पसंद आता है. रविवार को सासाराम में भी राहुल गांधी की सभा में ऐसा ही देखने को मिला. राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ के दौरान कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला, जिसने जनता के साथ-साथ मंच पर बैठे राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के चेहरे पर भी चमक ला दी.
लालू ने कहा, ‘चोरों को हटाइए, बीजेपी को भगाइए. किसी भी कीमत पर भाजपा जो चोरी करता है आने नहीं दीजिए. सबलोग एक हो जाइए. एक होकर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव सभी मिलकर एकजुट होकर इसको उखाड़ फेंकिए. लोकतंत्र मजबूत होने दीजिए. लागल-लागल झुलनियां में धक्का, बलम कलकत्ता चला.’ लालू के इस छोटे भाषण से ने केवल जनता में उत्साह भर दिया, बल्कि राहुल गांधी के चेहरे में भी रौनक आया. बगल में बैठे मल्लिर्जुन खरगे और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव हंसने लगे.
सासाराम में लालू लौटे पुराने अंदाज में
सासराम में गर्मी और उमस के बीच हजारों की भीड़ को संबोधित करते हुए लालू यादव ने जब माइक संभाला तो वो वही पुराने लालू दिखे. चुटीले, व्यंग्यात्मक, जनभाषा में बोलते हुए और भीड़ की नब्ज़ को पहचानते हुए अपनी बात बोल दी. भीड़ में ठहाके गूंज उठे. भाषण के अंत तक लोग न सिर्फ उन्हें सुन रहे थे, बल्कि उनसे जुड़ भी चुके थे. यही लालू यादव की राजनीति की पहचान रही है. सासाराम की रैली महागठबंधन के लिए सिर्फ एक चुनावी सभा नहीं, बल्कि एकता और जोश का प्रदर्शन थी. राहुल गांधी, जो अक्सर गंभीर भाषण देने के लिए जाने जाते हैं, मंच पर लालू यादव की शैली देखकर बार-बार मुस्कराते रहे. उनके चेहरे की यह मुस्कान बताती थी कि उन्हें जनता के साथ यह जुड़ाव कितना उत्साहित कर रहा है.
लालू के सामने राहुल-तेजस्वी फेल
वहीं तेजस्वी यादव के लिए यह पल भावनात्मक भी था. एक तरफ वह अपने पिता को राजनीतिक मंच पर उसी जोश के साथ देख रहे थे, दूसरी तरफ वे यह भी महसूस कर रहे थे कि जनता के बीच लालू की पकड़ अब भी मज़बूत है और यह आगामी चुनावों में आरजेडी के लिए एक बढ़त साबित हो सकती है. लालू यादव ने अपने भाषण में जहां सत्ता पक्ष पर तीखे हमले किए, वहीं उन्होंने आम जनता की भाषा और मनोविज्ञान का भी पूरा ध्यान रखा.
इस रैली ने यह साफ कर दिया कि भले ही बिहार की राजनीति में चेहरे बदल रहे हों, लेकिन लालू यादव जैसे नेता आज भी ‘भीड़ खींचने’ से कहीं ज़्यादा ‘भीड़ को दिशा देने’ में सक्षम हैं. सासाराम में जो हुआ, वह केवल एक भाषण नहीं था. वह एक संकेत था कि बिहार की राजनीति में लालू स्टाइल अभी ज़िंदा है और उसकी ज़रूरत अब भी महसूस की जा रही है.




