सफेद वर्दी, डॉलर में सैलरी और पूरी दुनिया घूमने का सपना. भारत के लाखों युवाओं के लिए ‘मर्चेंट नेवी’ सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि एक ‘गोल्डन करियर’ है. लेकिन इस चमकते करियर के पीछे एक काली और डरावनी हकीकत छिपी है, जो समंदर की लहरों के बीच अक्सर दफन हो जाती है. हाल ही में ईरान ने इजरायल से जुड़े एक जहाज पर कब्जा कर लिया, उसमें 16 भारतीय नाविक थे. फ्रांस ने रूसी जहाज को जब्त किया तो उसमें भी पूरा क्रू भारतीय था. नाइजीरिया और इक्वेटोरियल गिनी की जेलों में तमाम अफसर महीनों तक बंद रहे. ऐसे में सवाल समंदर के मझधार में सबसे ज्यादा भारतीय क्यों पकड़े जाते हैं? इसे कुछ घटनाओं से समझने की कोशिश करते हैं.हाल ही में फ्रांस ने रूस के एक जहाज को पकड़ा, तो उसमें भी भारतीय क्रू मिला. इससे पहले ईरान ने इजरायल से जुड़े जहाज को जब्त किया, तो वहां भी हथकड़ी भारतीय नाविकों को लगी. सवाल यह है कि दुनिया के किसी भी कोने में जब कोई जहाज पकड़ा जाता है, तो उसका शिकार सबसे ज्यादा भारतीय ही क्यों होते हैं? क्या यह महज संयोग है या फिर हमारे नाविक ग्लोबल जिओ-पॉलिटिक्स के ‘सॉफ्ट टारगेट’ बन गए हैं?
हाल ही में एक घटना ने फिर सबका ध्यान खींचा, जब फ्रांस के अधिकारियों ने इंग्लिश चैनल में एक रूसी मालवाहक जहाज को रोक लिया. यह कार्रवाई यूक्रेन युद्ध के चलते रूस पर लगे प्रतिबंधों के तहत की गई थी. जहाज का मालिक रूसी था, झंडा किसी और देश का था, लेकिन जहाज को चलाने वाला क्रू कौन था? उसमें बड़ी संख्या में भारतीय शामिल थे. यह महज एक उदाहरण नहीं है. यह अब एक पैटर्न बन चुका है. जहाज मालिक (Ship Owner) लंदन, मॉस्को या तेल अवीव में अपने एसी ऑफिस में बैठा रहता है, लेकिन जब जहाज किसी प्रतिबंध, ड्रग्स तस्करी या युद्ध क्षेत्र के उल्लंघन में पकड़ा जाता है, तो हथकड़ी उस भारतीय कैप्टन या नाविक को लगती है जो सिर्फ अपनी नौकरी कर रहा होता है.
ईरान में फंसे भारतीय
सबसे ताजा और चिंताजनक मामला ईरान का है. होर्मुज स्ट्रेट, जो दुनिया के तेल व्यापार की नस है, वहां भारतीय नाविक अक्सर फंसते हैं. जब ईरान ने इजरायली अरबपति से जुड़े जहाज एमएससी एरीज को जब्त किया, तो उस पर सवार 25 क्रू मेंबर्स में से 17 भारतीय थे. इसमें कैप्टन से लेकर डेक कैडेट तक शामिल थे.
कसूर क्या था? कुछ नहीं
सजा क्यों मिली? क्योंकि वे एक ऐसे जहाज पर नौकरी कर रहे थे जिसका संबंध इजरायल से था. ईरान की दुश्मनी इजरायल से है, लेकिन उसका खामियाजा केरल, यूपी या बिहार के उस लड़के को भुगतना पड़ता है जो वहां जहाज चला रहा था. ईरान में भारतीय नाविकों का फंसना अब आम हो गया है. कभी तेल तस्करी के आरोप में, तो कभी सीमा उल्लंघन के नाम पर. मर्चेंट नेवी के अफसरों के लिए यह सबसे खतरनाक रूट बन चुका है, फिर भी पेट की आग और करियर की मजबूरी उन्हें इस ‘मौत के कुएं’ में जाने पर मजबूर करती है.
बड़ी घटनाएं: जब समंदर में बंधक बने भारतीय
- इक्वेटोरियल गिनी में ‘एमटी हेरोइक इदुन’ कांड
यह हाल के समय की सबसे भयावह घटनाओं में से एक थी. 2022 में, मर्चेंट नेवी के 16 भारतीय नाविकों को इक्वेटोरियल गिनी में गिरफ्तार किया गया. उन पर कच्चा तेल चोरी करने और समुद्री सीमा के उल्लंघन का आरोप लगाया गया. वे महीनों तक एक छोटे से कमरे में कैद रहे, उन्हें नाइजीरिया ले जाने की धमकी दी गई. उनका जहाज नॉर्वे की कंपनी का था, झंडा मार्शल आइलैंड का था, लेकिन जेल भारतीय काट रहे थे. भारत सरकार के भारी कूटनीतिक दबाव के बाद ही उनकी वापसी हो पाई. - ग्रेस-1 और जिब्राल्टर कांड
2019 में, ब्रिटेन की रॉयल मरीन ने जिब्राल्टर में एक ईरानी तेल टैंकर ‘ग्रेस-1’ को जब्त कर लिया. आरोप था कि यह सीरिया में तेल ले जा रहा था, जो प्रतिबंधों के खिलाफ था. इस जहाज का कैप्टन एक भारतीय था और बाकी क्रू में भी भारतीय थे. ब्रिटेन और ईरान की लड़ाई में भारतीय कैप्टन को गिरफ्तार कर लिया गया. वह कई दिनों तक अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में रहा, जबकि उसका कोई लेना-देना उस तेल या राजनीति से नहीं था. - गैलेक्सी लीडर का अपहरण
लाल सागर में हूतियों ने जहाज ‘गैलेक्सी लीडर’ को अगवा कर लिया. यमन के विद्रोहियों ने इजरायल-हमास युद्ध के विरोध में इस जहाज को हाईजैक किया. इस जहाज पर कोई इजरायली नहीं था, लेकिन क्रू में भारतीय और अन्य एशियाई नागरिक थे. वे आज भी बंधक हैं. - नाइजीरिया में समुद्री डाकुओं का कहर
पश्चिमी अफ्रीका का ‘गल्फ ऑफ गिनी’ समुद्री डाकुओं का गढ़ है. यहां अक्सर भारतीय नाविकों का अपहरण फिरौती के लिए किया जाता है. 2019 और 2021 के बीच कई ऐसी घटनाएं हुईं जहां मर्चेंट नेवी के अफसरों को जहाज से उतारकर जंगलों में ले जाया गया. चूंकि भारतीय सरकार और कंपनियां अपने नागरिकों को बचाने के लिए सक्रिय रहती हैं, इसलिए डाकू भारतीयों को ‘सॉफ्ट टारगेट’ मानते हैं.
आखिर भारतीय ही क्यों पकड़े जाते हैं?
1. दुनिया का ‘इंजन रूम’ है भारत
वैश्विक शिपिंग उद्योग में भारत श्रम शक्ति का एक पावरहाउस है. दुनिया भर के महासागरों में तैरने वाले जहाजों पर काम करने वाले लगभग 10-12% नाविक भारतीय हैं. दुनिया में करीब 17 लाख नाविक हैं, जिनमें से 2.5 लाख से ज्यादा भारतीय हैं. इसलिए अगर समुद्र में कोई भी जहाज पकड़ा जाएगा, तो इस बात की 90% संभावना है कि उस पर कम से कम एक भारतीय जरूर होगा. हम हर जगह हैं, इसलिए हम हर खतरे में भी हैं.
2. ‘सस्ती और कुशल’ लेबर की मांग
अमेरिका, यूरोप के लोग अब मर्चेंट नेवी में निचले स्तर की नौकरियां कम करते हैं. जहाज मालिक चाहे वे ग्रीस के हों या रूस के, भारतीय अफसरों और क्रू को पसंद करते हैं क्योंकि वे अंग्रेजी बोलते हैं, तकनीकी रूप से कुशल होते हैं और डॉलर में वेतन मिलने पर भी पश्चिमी नाविकों की तुलना में ‘किफायती’ होते हैं. यही कारण है कि रूसी जहाज हो या इजरायली, उसे चलाने वाला हाथ भारतीय ही होता है.
फ्लैग ऑफ कन्वीनिएंस का धोखा क्या है?
यह मर्चेंट नेवी का सबसे काला सच है. टैक्स और कानूनों से बचने के लिए जहाज मालिक अपने जहाज को पनामा, लाइबेरिया या मार्शल आइलैंड जैसे छोटे देशों में रजिस्टर कराते हैं. जहाज का मालिक रूसी है, जहाज पर झंडा पनामा का लगा है, कार्गो ईरान का है और क्रू भारतीय है. जब यह जहाज फ्रांस या अमेरिका पकड़ता है, तो रूसी मालिक गायब रहता है, पनामा पल्ला झाड़ लेता है, और कानून का डंडा जहाज पर मौजूद ‘कैप्टन’ पर चलता है. अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, जहाज का कैप्टन ही हर चीज के लिए जिम्मेदार है.
क्या दोस्ती भी पड़ती है भारी?
भारत के संबंध रूस, अमेरिका, ईरान और इजरायल सबके साथ अच्छे हैं. लेकिन यही बात नाविकों के लिए मुसीबत बन जाती है. जब अमेरिका ईरान पर प्रतिबंध लगाता है, तो वह किसी भी जहाज को पकड़ सकता है. उस जहाज पर मौजूद भारतीय नाविक को अमेरिकी कानून के तहत अपराधी मान लिया जाता है, भले ही उसे पता भी न हो कि कंटेनर में क्या है. भारतीय नाविक दो देशों की लड़ाई में ‘कोलेटरल डैमेज’ बनकर रह जाते हैं.





