इंदौर
आज 31 मई को इंदौर गौरव दिवस पर देवी अहिल्या जन्मोत्सव पर हम फिर से लाए हैं वो किस्से, जो देवी अहिल्या की संवेदनशीलता, प्रभावी शासिका और प्रजा के प्रति जिम्मेदारी का उनका व्यक्तित्व बताते हैं…
298 साल पहले आज ही यानी 31 मई को 1767 को देवी अहिल्या बाई का जन्म हुआ था। इसलिए आज के दिन को पूरा शहर गौरव दिवस के रूप में मना रहा है। इंदौर का नाम आते ही अहिल्या देवी का नाम सबसे पहले आता है। आज एक बार फिर पढ़िए शिव भक्त प्रजा के लिए वे जितनी मृदुभाषी थीं, राजपाट के नियमों में उतनी ही सख्त थीं। नियमों के पालन के मामले में वह अपने पति-पुत्र के प्रति भी सख्त रहती थीं।
अहिल्या देवी ने 13 मार्च 1767 को रियासत की कमान अपने हाथों में ली थी। वे जनता की गाढ़ी कमाई बचाने के लिए एक-एक आने का हिसाब रखती थीं। नियम कायदों को लेकर काफी सख्त थीं। एक मर्तबा तो उन्होंने अपने पति तक को अग्रिम वेतन देने से इनकार कर दिया था। 28 बरस के अपने शासनकाल में उन्होंने देशभर में 65 मंदिर, धर्मशालाएं, सड़कें, तालाब और नदियों के भव्य घाट बनवाए। इतना ही नहीं उनके किस्से इस बात का प्रमाण है कि वे कितनी निडर थी और इंदौर से कितना प्यार करती थी। बताते हैं कि वे शिव की इतनी अनन्य भक्त थीं कि रियासत के हर ऑर्डर पर हुजूर शंकर लिखा जाता था।
सबसे पहले जानिए कौन थीं अहिल्या देवी…
अहिल्या देवी का जन्म 31 मई 1725 ई. को महाराष्ट्र के अहमदनगर के चौंडी ग्राम में हुआ। उनके पिता मंकोजी राव शिंदे अपने गांव के पाटिल थे पर निर्धन थे। वे कई परेशानियों का सामना कर परिवार का लालन-पालन करते थे। पुणे जाते समय मालवा के पेशवा मल्हार राव होलकर चौंडी गांव में विश्राम के लिए रुके।
यहीं उन्होंने अहिल्या देवी को देखा। आठ साल की लड़की निष्ठा से भूखे और गरीब लोगों को भोजन करा रही थी। यह देख मल्हार राव ने अहिल्या देवी का रिश्ता अपने बेटे खंडेराव होलकर के लिए मांगा। 1733 में खंडेराव के साथ विवाह कर कम उम्र में ही अहिल्या देवी मालवा आ गईं।
मल्हारराव होलकर के वीर पुत्र खंडेराव होलकर की चार पत्नियां थीं- अहिल्या देवी, पाराबाई, पीताबाई और सुरताबाई। मल्हार राव होलकर को बेटे खांडेराव से ज्यादा बहू अहिल्या देवीपर भरोसा था। 1754 में खंडेराव की युद्ध में वीरगति प्राप्त होने पर ससुर मल्हारराव होलकर के कहने पर अहिल्या देवी सती नहीं हुई जबकि अन्य 3 रानियां सती हो गईं। इसके बाद ससुर मल्हार राव ने बहू अहिल्या देवी को होलकर साम्राज्य की कमान सौंप दी थी।
पति के साथ सती होने का निर्णय लिया, पर ससुर ने ऐसा करने नहीं दिया
1745 में अहिल्या देवी ने पुत्र को जन्म दिया, नाम रखा मालेराव। इसके तीन वर्ष बाद पुत्री ने जन्म लिया, नाम रखा मुक्ता। 1754 में पति खंडेराव का देहांत हो गया, वे युद्ध में मारे गए। यह खबर सुनकर अहिल्या देवी ने सती होने का निर्णय लिया, लेकिन ससुर के समझाने के बाद निर्णय बदला।
इसके बाद मल्हारराव अहिल्या देवी को राज्य कार्य संबंधी प्रशिक्षण देने लगे। वे युद्ध पर जाते तो अहिल्या देवी राज्य की व्यवस्था संभालती थीं। सुरक्षा, राजस्व, न्याय, नीति और सामान्य प्रशासन सभी क्षेत्रों में उन्होंने मार्गदर्शन किया। 20 मई 1766 को मल्हार राव का निधन हुआ, इसके बाद राजपाट अहिल्या देवी होल्कर के सुपुत्र माले राव होलकर को सौंपा गया।
वह केवल 9 माह तक राज कर पाए और उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद राज्य का सारा भार अहिल्या देवी पर आ गया। उन्होंने 13 मार्च 1767 में रियासत की कमान अपने हाथों में ली। पुत्र के जाने से दुखी अहिल्या देवी ने अपनी राजधानी महेश्वर बना ली और इंदौर छोड़कर चली गईं।
उनका शासनकाल करीब 28 बरस का था। साथ-साथ खासगी संपत्ति की देखरेख भी करती थीं। उनका भारतीय इतिहास की सर्वश्रेष्ठ योद्धा रानियों में शुमार है। उनके शासनकाल के दौरान मराठा मालवा साम्राज्य ने सफलता की नई ऊंचाइयों को छुआ। उन्होंने देशभर में कई मंदिरों और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। 13 अगस्त 1795 को महेश्वर में उनका स्वर्गवास हुआ।
लीडरशिप : संपत्तियों की देखरेख का बोझ जनता पर न पड़े इसलिए ट्रस्ट बनाया
होलकर रियासत की संपत्ति की देखरेख का बोझ जनता पर नहीं पड़े, इसके लिए खासगी ट्रस्ट बनाया। ट्रस्ट के खाते में 16 करोड़ रुपए जमा हो गए तो देवी अहिल्या देवी ने इससे देश में मंदिर, धर्मशालाएं बनवाईं।
ट्रस्टीशिप : पारिवारिक खर्च जनता के पैसों से नहीं, व्यक्तिगत कोष से
होलकर परिवार के सारे खर्च राजकोष (दौलत) से नहीं किए जाते थे। जब ससुर मल्हार राव के अभिन्न मित्र बाजीराव पेशवा का निधन हुआ तो सारे क्रियाकर्म का खर्च राजकोष से करना चाहा तो बहू देवी अहिल्या देवी ने ससुर को रोक दिया और कहा- यह खर्च मना कर दिया। यह खर्च पारिवारिक कोष (खासगी ट्रस्ट) से ही होगा।
जवाबदेही : युद्ध में जीते धन पर सबसे पहला हक राजकोष का
पति को तक कह दिया था कि जब तक आप अग्रिम वेतन चुका न देंगे, एक नया पैसा नहीं मिलेगा। पति खंडेराव के कक्ष में जीत में मिले धन को देख कहा, इस पर भी पहला हक राजकोष का है।
कायदों की पक्की : जमीन विवाद आने लगे तो बना दिया खसरा नियम
जमीन के विवाद खड़े होने लगे तो अहिल्या देवी ने खसरा व्यवस्था लागू की। आवेदकों से जमीन पर लंबाई में 7 फलदार पेड़ और चौड़ाई में 12 फलदार पेड़ लगाने को कहा। इस तरह विभाजन बराबर हुआ।
वे किस्से जो बताते हैं कि वे कितनी निडर और इंदौर से कितना प्यार करती थीं
किस्सा-1 : होलकर रियासत के दीवान गंगाधर यशवंत चंद्रचूड़ के एक षड्यंत्र का पता चलते ही अहिल्या देवी गरज कर बोलीं… ‘यह वैभव मेरे पुरखों ने हंसी-मसखरी या नाच-गाकर प्राप्त नहीं किया है। उन्होंने अपना खून पसीना एक कर यह राज्य स्थापित किया है। ऐसा कोई न समझे कि मैं अबला या असहाय औरत हूं। हाथ में माला लेकर अड़ जाऊंगी तो सारी योजना धरी रह जाएगी। मैं पेशवा की चाकरी करने को सदा तैयार हूं, पर किसी ने मेरे राज्य की ओर आंख उठाई तो वह कभी सफल नहीं होगा।’
किस्सा-2 : एक बार महादजी सिंधिया जो ग्वालियर के तत्कालीन राजा रणोजी सिंधिया के उत्तराधिकारी थे, वे किसी राजनैतिक स्वार्थ के लिए अहिल्या देवी के पास महेश्वर आए। महादजी सिंधिया को पेशवा ने समस्त उत्तर, मध्य, पश्चिम भारतीय राज्यों से कर वसूलने और साम्राज्य विस्तार की जिम्मेदारी दी थी। वे महेश्वर आए तो अहिल्या देवी ने उनका आदर सत्कार किया। एक दिन उन्होंने धमकी भरे लहजे में अपनी योजना देवी को सुनाई। मां अहिल्या देवी क्रोध में बोलीं …’जैसे तुम अपने घर की स्त्रियों को सुपारी के टुकड़े के समान मुंह में डालकर गटक जाते हो, वही सलाह तुकोजी होलकर (प्रथम) को देकर तुम दोनों फौज लेकर आओ। जिस दिन इंदौर पर तुम्हारी फौज कूच करेगी, उसी दिन हाथी के पांव की साकल से तुम्हें बांधकर तुम्हारा स्वागत करने मैं आऊंगी.. तभी मैं मल्हारराव होलकर की बहू कहलाऊंगी।’
प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था से जुड़ी दो घटनाएं…
प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए वे पति व ससुर का विरोध भी कर लेती थीं। उनके दो उदाहरण हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं।
घटना-1 : चाहे खासगी (पारिवारिक ट्रस्ट) का खजाना हो या दौलत (राजकोष) का खजाना। वे दोनों का हिसाब बराबर रखती थीं। बात उस समय की है जब मल्हारराव होलकर के अभिन्न मित्र बाजीराव पेशवा का निधन मालवा क्षेत्र में हुआ। पेशवा के परिवार के लोगों के वहां आने से लेकर सूतक शांति तक के सारे क्रियाकर्म, मृत्युभोज, दान पुण्य का खर्च मल्हारराव ने ‘दौलत के खजाने’ से किया। मातोश्री ने जब यह खर्च देखा तो बोलीं कि यह होलकर का घर, पारिवारिक मामला है, सूबेदार जी ने यह मित्रता में किया है, इसलिए यह खर्च जनता के पैसों से नहीं बल्कि खासगी से होना चाहिए। उसके तुरंत बाद उन्होंने उक्त राशि खासगी से दौलत के खजाने में ट्रांसफर करवा दी।
घटना-2 : अहिल्या देवी के पति खंडेराव होलकर को युवराज होने के नाते नियमित रूप से दौलत और खासगी ट्रस्ट दोनों खजाने में से वेतन दिया जाता था। उनको खर्च कम पड़ता था तो वे एडवांस सैलरी ले लेते थे। जब अहिल्या देवी ने यह देखा तो बोलीं कि आपने क्यों एडवांस लिया। आज यदि आप प्रजा के सामने उदाहरण नहीं रखेंगे तो होलकर परिवार की छवि खराब होगी। जब तक आप अग्रिम रूप में ले चुके वेतन को न चुका दें, आपको एक नया पैसा नहीं मिलेगा। इसके बाद जब वह खंडेराव के कक्ष में गईं तो उन्हें वहां लूट में या जीत में मिला धन दिखता है। वह बोलतीं हैं कि इस धन को भी आप नहीं रख सकते। इस पर पहला हक राजकोष का है। प्रशासन को लगा कि यह आपको देना चाहिए तो देंगे।
अहिल्या देवी के दो निष्पक्ष फैसले…
फैसला-1 : जमीन के टुकड़े पर विवाद पर मां अहिल्या देवी की दो टूकएक बार किसी जमीन के टुकड़े को लेकर काफी दिनों से ग्वालियर राज्य और होलकर राज्य में मतभेद चल रहा था। इसका फैसला अहिल्या देवी पर छोड़ दिया गया। उन्होंने निर्णय दिया कि न तो यह जमीन ग्वालियर राज्य की है न ही होलकर राज्य की। इस जमीन का इस्तेमाल गोचर भूमि के रूप में होगा। इस पर कोई लगान भी नहीं लिया जाएगा।
फैसला-2 : यह राजपाट शिव का है
पति, ससुर और बेटे की मौत के बाद अपना राज्य भगवान शिव को समर्पित कर दिया। वे सिर्फ सेविका के रूप में राज्य का कार्य करती थीं। यहीं से शुरुआत हुई थी हुजूर शंकर ऑर्डर की, जो महाराजा यशवंत राव होलकर द्वितीय के समय तक चलते रहे। यह विश्व में एक मिसाल भी है। यही कारण है कि अहिल्या देवी के काल के सिक्कों पर शिव लिंग अंकित होता था।
7/12 का उतारा (खसरा) नियम उन्हीं ने बनाया
जमीन के मालिक होने के सबूत के तौर पर अहिल्या देवी ने 7/12 खसरा नियम बनाया। उनके शासनकाल में जब जमीन के विवाद आने लगे तो उन्होंने आवेदकों से जमीन पर लंबाई में 7 फलदार पेड़ और चौड़ाई में 12 फलदार पेड़ लगाने को कहा। इस तरह विभाजन बराबर हुआ। उसके बाद उन्होंने नियम बनाया कि फल आने के बाद 7 फलदार पेड़ के फलों से होने वाली कमाई वार्षिक टैक्स के रूप में राजकोष में जमा करें और 12 पेड़ों के फलों से होने वाली कमाई अपनी आजीविका के लिए रखें। महाराष्ट्र राज्य का राजस्व विभाग अब भी इसके जरिए हर जिले की भूमि का रिकॉर्ड रखता है।
मां अहिल्या देवी के व्यक्तित्व के ये पहलू भी खासभगवान शिव की अनन्य भक्त : अहिल्या देवी शिव की अनन्य उपासक रहीं। होश संभालने के बाद से मृत्यु शैया तक महादेव के लिए समर्पित रहीं। बचपन में एक बार जब वह मंदिर जा रही थीं, तभी औरंगाबाद परगने के ग्राम चौंडी में आए मल्हारराव होलकर की नजर उन पर पड़ी। गोल सुंदर चेहरे वाली वाली उस 8-10 वर्षीय बालिका के हाथ में पूजा की थाली, उन्नत ललाट, खिंची हुई भृकुटी, मनोहर नासिका और बड़ी आंखों में कुछ ऐसा आकर्षण था कि मल्हारराव वहीं रुक गए। वे अहिल्या देवी के पिता मनकोजी तथा माता सुशीलाबाई शिंदे के घर पहुंचे और अपने पुत्र के लिए अहिल्या देवी का हाथ मांग लिया। यह संबंध बनते देर न लगी और 31 मई 1725 को जन्मी अहिल्या देवी का विवाह 1735 में खंडेराव से हुआ।
अहिल्या देवी ने देश भर में बनवाए 65 मंदिरमंदिरों के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण के लिए अहिल्या देवी का नाम सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने न सिर्फ अपने राज्य में बल्कि पूरे भारत में करीब 65 मंदिर, धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। इसके अलावा सड़कें, कुएं, तालाब, बावड़ियां, घाट और पानी की टंकी को मूलभूत सुविधाओं के साथ बनवाया। महेश्वर में रहते हुए देश के दूरस्थ स्थलों जैसे अमरकंटक, बद्रीनाथ, केदारनाथ, अयोध्या, गंगोत्री, पुष्कर, मथुरा, रामेश्वर तथा हरिद्वार में धर्मशालाएं बनवाईं। उज्जैन में 9 मंदिर और 13 घाटों का निर्माण उनके नाम है। ये हैं उनके द्वारा कराए प्रमुख निर्माण…।
1. काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी – भगवान शिव का यह प्राचीनतम मंदिर गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। कहा जाता है कि यह मंदिर भगवान शिव और माता पार्वती का आदि स्थान है। मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1780 में देवी अहिल्या देवी ने करवाया था।
2. सोमनाथ मंदिर, वेरावल, गुजरात – कहा जाता है कि सोमनाथ का मंदिर ईसा के पूर्व भी था। मंदिर पर बार-बार आक्रमण हुए। 1783 में अहिल्या देवी ने पुणे के पेशवा के साथ मिलकर ध्वस्त मंदिर के पास अलग मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर के गर्भगृह को जमीन में बनाया गया।
3. विष्णुपद मंदिर, गया, बिहार – माना जाता है विश्व में यही एक ऐसा मंदिर है जहां भगवान विष्णु के चरण चिन्ह की पूजा होती है। इसे धर्मशिला के नाम से भी जाना जाता है। फालगु नदी के तट पर बने इस मंदिर का पुनर्निर्माण 1787 में अहिल्या देवी ने कराया था।
4. बैजनाथ मंदिर, कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश – यह नागर शैली में बना हिंदू मंदिर है। इसे 1204 ईस्वी में अहुका और मन्युका नामक दो स्थानीय व्यापारियों ने बनवाया था। यह वैद्यनाथ (चिकित्सकों के प्रभु) के रूप में भगवान शिव को समर्पित है।
5. एलोरा के गणेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार अहिल्या देवी होलकर द्वारा कराया गया।
टाउन प्लानिंग हो, स्वच्छता हो या शिक्षा, शहर को विश्व स्तर का बनाया; दिलाई खास पहचान
देवी अहिल्या बाई के जन्मोत्सव को इंदौर गौरव दिवस के रूप में मना रहा है। इंदौर का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। इसकी अलग पहचान रही है। टाउन प्लानिंग हो, स्वच्छता हो या शिक्षा, संस्कृति हो या खान-पान, सभी क्षेत्रों में ये देश ही नहीं दुनिया में भी चर्चा में रहता है। इंदौर को इस स्तर पर पहुंचाने में उन अनगिनत हस्तियों का योगदान रहा है, जिन्होंने सड़क, बिजली, पानी, पुल, अस्पताल, स्कूल सहित कई सुविधाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए जुटाईं। 60 के दशक में इंदौर की आबादी 3 लाख 59 हजार थी। 55.8 वर्ग किमी में शहर फैला था। अब यह तेजी से बढ़ गया है। 550 वर्ग किमी के हिसाब से मास्टर प्लान तैयार हो रहा है।
औद्योगिक क्षेत्र, कपड़ा मिलें, पेयजल से लेकर रेलवे ट्रांसपोर्ट तक राजा-महाराजाओं का योगदान

इंदौर के विकास की इबारत लिखने में यहां के राजघरानों की बड़ी भूमिका है। शुरुआती दौर के इंजीनियर, व्यापारी, डॉक्टर्स, शिक्षक सहित कई समाजसेवियों का भी खास योगदान है। इंदौर की कपड़ा मिल प्रसिद्ध है तो उसके पीछे सैकड़ों लोगों की मेहनत है, जो इसे शहर में स्थापित करने में सफल हुए। इंदौर को विश्वस्तरीय शहर बनाने में वे भी शामिल हैं, जिन्होंने ब्रिज बनवाए। सड़कें बनवाईं। अस्पताल बनवाए।
1958 में हुई पोलो ग्राउंड औद्योगिक क्षेत्र की शुरुआत
30 अक्टूबर 1956 को केंद्रीय रक्षा मंत्री महावीर त्यागी ने इंदौर में 3 औद्योगिक क्षेत्रों के विकास का शिलान्यास किया। मार्च 1958 में केंद्रीय वित्त मंत्री मोरारजी देसाई ने पोलो ग्राउंड औद्योगिक क्षेत्र का उद्घाटन किया। इस औद्योगिक इकाई में कई तरह की इंडस्ट्रीज थीं। यह इंदौर की पहली सुव्यवस्थित औद्योगिक बस्ती थी, जिसने शहर व आसपास के कारीगरों को रोजगार उपलब्ध कराया।
पोलोग्राउंड में इस समय करीब 200 उद्योग संचालित हो रहे हैं। करीब 5 हजार लोगों को यहां रोजगार मिलता है। मशीनरी के साथ कुछ फार्मा कंपनी भी यहां स्थापित है।
हाथी पर खंडवा से लाए थे मिल की बड़ी-बड़ी मशीनें

पहली कपड़ा मिल यानी पुतलीघर का निर्माण महाराजा तुकोजीराव होलकर ने 1866 में करवाया था, जिस पर आज का न्यू सियागंज स्थापित है। निर्माण के समय हाथियों पर लादकर खंडवा से मिल की बड़ी-बड़ी मशीनें लाई गई थीं। शहर में द मालवा यूनाइटेड मिल का उद्घाटन 1907 में हुआ था। 25 मार्च 1916 को 15 लाख रुपए की लागत से हुकुमचंद मिल का निर्माण किया गया। उसके बाद अन्य मिलें स्थापित हुईं।
वर्तमान में टेक्सटाइल सेक्टर में बड़ी ग्रोथ होने से परदेशीपुरा क्षेत्र में रेडीमेड कॉम्प्लेक्स बन गया है। पीथमपुर सेंट्रल इंडिया का सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल हब बन चुका है। यहां 4 हजार से ज्यादा उद्योग हैं।
1866 में इंदौर में नल लगना शुरू हुए थे

1866 में पहली बार इंदौर के कागदीपुरा में नल लगना शुरू हुए थे। शहर में पेयजल समस्या के समाधान के लिए ठोस कदम महाराजा यशवंतराव होलकर द्वितीय ने उठाए। 1939 में इंदौर से 15 मील दूर गंभीर नदी पर बांध बनवाया। यह चित्र यशवंत सागर के बांध के निर्माण के समय का है, जिसमें स्टेट के इंजीनियर यशवंत सागर बांध का निरीक्षण कर रहे हैं।
फिलहाल, नर्मदा नदी के इंदौर में अब तक तीन चरण आ गए हैं। शहर की 25 लाख से अधिक आबादी को नर्मदा का पानी नलों के माध्यम से सप्लाई किया जा रहा है।
तुकोजीराव द्वितीय के प्रयासों से मिली रेल

होलकर स्टेट रेलवे का निर्माण महाराजा तुकोजीराव द्वितीय द्वारा कराया गया था। पहला ट्रायल 1 जनवरी 1875 में महू से इंदौर के बीच हुआ था। 1877 में यह लाइन पूरे खंडवा से जोड़ दी गई थी। 1878 में इस पर आवागमन शुरू हुआ। पातालपानी के 32 मील की ऊंचाई में कई टनलों के निर्माण में जटिलताएं आईं। इस तरह इंदौर पहली बार रेलवे से कनेक्ट हुआ।
70 के दशक के बाद रेल सुविधाओं का तेजी से इजाफा हुआ। फिलहाल शहर में 80 से अधिक ट्रेनें हर दिन आती-जाती हैं। देश के सभी बड़े शहरों से कनेक्टिविटी है।
1953 में मिली थी पहले रेलवे फ्लाईओवर की सौगात

इंदौर शहर का पहला रेलवे फ्लाईओवर 12 जनवरी 1953 में बनकर तैयार हुआ था। इसका उद्घाटन तत्कालीन परिवहन मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किया था। इसी वजह से इस ब्रिज का नाम शास्त्री ब्रिज पड़ा, जिसने इंदौर शहर के ट्रैफिक को कई दशकों तक संभाला।
फिलहाल, ट्रैफिक सुधार के लिए बाईपास पर चार फ्लाईओवर्स का निर्माण कार्य शुरू होना है। शहर के भीतर भी तीन फ्लाई ओवर्स का काम चल रहा है।
व्यवस्थित बसाहट के गौरव हेमचंद्र डे

होलकर साम्राज्य में टाउन प्लानर रहे हेमचंद्र डे के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता। शहर की सबसे पहली सुनियोजित कॉलोनी मनोरमागंज को बसाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। फडनीस कॉलोनी और राजबाड़ा के आसपास क्षेत्रों की प्लानिंग में उनका योगदान रहा। यशवंत सागर डैम जब बनाया जा रहा था, तब वे उस टीम का भी हिस्सा थे। उनके परिवार की डॉ. हीना डे बताती हैं कि उन्होंने प्लानिंग ऐसी की थी कि किस तरह लोगों के लिए सुविधाएं जुटाई जाएं।
वर्ष 1953 में शहर में कार के शोरूम लाए सांघी मोटर्स और लीलाराम हसीजा
इंदौर में सबसे पहला कार शोरूम सांघी मोटर्स लेकर आए। ये टाटा कंपनी का था। लीलाराम हसीजा हिंदुस्तान मोटर्स के डीलर्स रहे। जब आबादी बमुश्किल 5 लाख भी नहीं थी, उस दौर में कार के शोरूम इंदौर में आ चुके थे। यह 1947 से 50 के दशक के बीच की बात है। एकसाथ ही दोनों शोरूम इंदौर में खुले थे। लीलाराम हसीजा के पोते कौशल हसीजा कहते हैं कि उस समय इंदौर के आसपास के लोग भी गाड़ियां खरीदने आते थे। ये शोरूम भोपाल और इंदौर में एकसाथ शुरू किए गए थे।
डॉ. एसके मुखर्जी एमजीएम में मेडिसिन विभाग के पहले प्रोफेसर बने, 60 साल तक सेवा की
डॉ. एसके मुखर्जी। यह नाम मप्र के चिकित्सा क्षेत्र की पहचान रहा है। कोलकाता में 1898 में जन्मे डॉ. संतोष कुमार मुखर्जी ने 1925 में केईएच मेडिकल स्कूल में जॉइन किया था। 1948 में एमजीएम मेडिकल कॉलेज में स्थापित पहले मेडिसिन विभाग में यह प्रोफेसर थे। डॉ. मुखर्जी एकमात्र डॉक्टर हैं, जिनकी मूर्ति एमवायएच में स्थापित है। एमवायएच को स्थापित व विस्तारित करने में योगदान रहा है। उन्होंने केईएच मेडिकल स्कूल को मेडिकल कॉलेज में बदलवाया। चिकित्सा के क्षेत्र में 60 साल तक उन्होंने इंदौर के लोगों की सेवा की।

(ऐतिहासिक फोटो और कंटेंट इतिहासकार जफर अंसारी ने उपलब्ध करवाए हैं।)
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