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अमेरिका जैसे देश से त्रस्त विश्वमानवता उससे कब मुक्त होगी  !

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निर्मल कुमार शर्मा

यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि मानवप्रजाति का सारा इतिहास सत्ता के लिए,अपने साम्राज्य के अधिकाधिक विस्तार करने के हवस के लिए अतिविध्वंसक अतिघृणित इंसानियत की हत्याओं से उसके खून से सना पड़ा है ! सुप्रसिद्ध भौतिक और रसायन विज्ञानी तथा खगोलशास्त्री स्वर्गीय कार्ल सैगन ने मानवप्रजाति के इसी लोभ-लालच में इस धरती के ही किसी दूसरे छोर पर शांति और अमन-चैन से रहनेवाले अपने ही तरह के इंसान के खून के प्यासे और उद्यत नरपिशाचों के लिए फरवरी 1990 में यह निम्नलिखित कालजयी वक्तव्य दिया था कि ‘ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि अगर सोचें कि ये केवल हमारे लिए है तो यह सोचकर मायूस हो जाएंगे कि हम बहुत सारी जगह का प्रयोग ही नहीं कर पा रहे ! उस बिंदु पर फिर से एक नज़र डालिए,वह हमारा घर है,हमारी धरती है,हर इंसान जिसे तुम प्यार करते हो,जिसे तुम जानते हो, जिसके बारे में तुमने सुना है,वह जो कभी पैदा हुआ है,उसने इसी बिंदु पर पूरा जीवन बिता दिया,हमारे सारे सुख-दुःख,हजारों धर्म और मान्यताएं,हर एक शिकारी,जांबाज़ और कायर, राजा और किसान,प्रेम में डूबा हर जवान जोड़ा, हर माता और पिता,उम्मीदों से भरा हुआ हर बच्चा और वैज्ञानिक,पढ़ाने वाला हर शिक्षक,हर भ्रष्ट नेता,हर सुपरस्टार,हमारे इतिहास का हर संत और पापी वहीं जीया,इस धरती पर मौजूद बड़े से बड़े शहर आदि सभी कुछ सूर्य की एक किरण में तैरते हुए धूल के उस कण पर ! इस विशाल ब्रह्माण्ड में हमारी पृथ्वी एक बहुत ही छोटी जगह है, अनगिनत इंसानों की उन हत्याओं के बारे में सोचिए जो उन सेनापतियों और शहंशाहों ने की,ताकि अपनी शान और जीत में वे इस बिंदु के किसी छोटे से हिस्से के कुछ पलों के लिए मालिक बन सकें ! उन अनगिनत घोर और अकथ्य और क्रूर अत्याचारों के बारे में सोचिए जो इस बिंदु के एक कोने में रहने वाले लोगों ने किसी दूसरे कोने पर शांति से रह रहे अपने ही जैसे लोगों पर किए ! हमारी कितनी गलतफहमियां हैं,एक दूसरे को मार डालने का कितना उतावलापन है ! दूसरे इंसानों के प्रति कितनी नफरत है ! हम इंसानों के ढकोसले,हमारा घमंड,हमारा यह भ्रम कि समूचे ब्रह्मांड में हम लोगों का एक ख़ास स्थान है ! इन तमाम बातों को यह धुंधला प्रकाश बिंदु चुनौती देता है ! जबकि हकीकत और वास्तविकता यह है कि हमारा ग्रह ब्रह्माण्ड के इस घने से अंधेरे कोने में छोटा सा अकेला एक धब्बा मात्र है ! ब्रह्माण्ड की इस विशालता में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि हमारी दुनिया को हमारी बुराइयों से बचाने के लिए दूसरे ग्रह से कोई अन्य सभ्य और समझदार प्राणी आएगा !अभी तक इस ज्ञात संपूर्ण ब्रह्मांड में अरबों तारों,ग्रहों और उपग्रहों में केवल पृथ्वी ही ऐसी एकमात्र ग्रह है जिसमें सांसों के स्पंदन से युक्त भरपूर जीवन है ! ऐसी दूसरी कोई जगह है ही नहीं,जहां निकट भविष्य में हम रह सकें ! शायद अभी यह भी संभव नहीं कि हम लाखों-करोड़ों प्रकाशवर्ष दूर दूसरे ग्रहों को देखने भी जा पाएं ! तो उस स्थिति में वहां बसना फिलहाल हमारी पहुंच से अभी बहुत-बहुत दूर है !या एकतरह से हम कह सकते हैं,यह बिल्कुल असंभव ही है ! हमें अच्छा लगे या न लगे,परन्तु अभी के वर्तमान समय के लिए केवल और केवल पृथ्वी ही वह जगह है,जहां हम रह सकते हैं,ऐसा कहा गया है कि खगोलविज्ञान एक विनम्र करने वाला और बेहतर इंसान बनाने वाला अनुभव होता है,हमारे घमंडों की,मूर्खता की हमारी इस छोटी सी दुनिया की इस तस्वीर से बेहतर शायद ही कोई और सबूत हो ! यह मुझे एक दूसरे के प्रति और अधिक दयालु होने की जिम्मेदारी की याद दिलाता है और हमारे इस धुंधले नीले धब्बे को बचाने और संवारने की भी है,जो हमारा एकमात्र घर है ! ‘
क्या इंसानियतभरी उक्तलिखित बातों का वर्तमानसमय के अमेरिकी साम्राज्यवाद के क्रूर,बर्बर और हिंसक कर्णधारों पर जरा भी असर नहीं पड़ रहा है ? निम्नवर्णित तथ्यपरक उदाहरणों से हमें तो यह महसूस हो रहा है कि यह किंचित भी नहीं लगता कि अरबों निरपराध बच्चों,स्त्रियों, वृद्धों,आमजनों और सैनिकों की निर्मम हत्या और उनका रक्त को पीने के बाद भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के कर्णधारों की मानवरक्त पीने की हवश अभी भी मिटी हो ! यह कटु सच्चाई है कि 26दिसम्बर 1991 को सोवियत संघ के पतन के बाद उसके बिखरने के बाद रूस की शक्ति भी बहुत ही क्षीण हो गई थी ! वह सोवियत संघ के जमाने के महाबली का दर्जा भी खो दिया था,वह एक निस्तेज,एक शक्तिहीन तथा रक्षात्मक मुद्रा वाले एक देश के रूप में बदलकर रह गया था ! अब दुनिया का एकमात्र दारोगा के रूप में अमेरिकी साम्राज्यवाद ही रह गया था ! लेकिन महाबली सोवियत संघ के पराभव के बाद रूस एक बेहद लिजलिजा और आर्थिक दृष्टि से बेहद कमजोर देश बनने के बाद भी अमेरिकी साम्राज्यवादियों को सोवियत संघ के जमाने में बना सैन्य संगठन नाटो के विस्तार की हवस खत्म नहीं हुई थी ! यहाँ तक कि सोवियत संघ के दौर की वार्सा संधि के देशों यथा पोलैंड,पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया,हंगरी,रोमानिया और बुल्गारिया को भी अपने नाटो सैन्य गठबंधन में सम्मिलित कर लेने के बाद भी इससे भी आगे बढ़कर रूसी सीमा से बिल्कुल सटे देशों यथा एस्टोनिया, लाटविया,लिथुआनिया और यूक्रेन तक को सम्मिलित करने के कुकृत्यों को अंजाम देने लगा ! यह वही अमेरिका है,जो तत्कालीन सोवियत संघ के निकिता ख्रुश्चेव के जमाने में वर्ष 1962में क्यूबा में 3000 किलोमीटर से 5000 किलोमीटर दूर तक अचूक मार करने वाली इंटरमीडिएट रैंज बैलिस्टिक मिसाइल, Intermediate Range Ballistic Missile की तैनाती करने पर हाय-तोबा मचाकर आकाश सर पर उठा लिया था, क्यूबा के उस स्थान से जहाँ ये मिसाइलें तैनात की गईं थीं वहाँ से अमेरिकी शहर फ्लोरिडा मात्र 150 किलोमीटर दूर था,जबकि वह मिसाइल भी तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा इसी अमेरिका की कुटिलतापूर्ण कृत्यों यथा 1958 में इंग्लैंड में और 1961में इटली और टर्की में मास्को को लक्ष्य करके लगाई गई इंटरमीडिएट रैंज बैलिस्टिक मिसाइलों, Intermediate Range Ballistic Missiles के प्रतिक्रियास्वरूप ही लगाई गईं थीं !
जरा इमानदारी से सोचिए कि आपके देश की सीमा के नजदीक जब खतरा हो तो आप खूब शोर-शराबा मचाना शुरू कर देते हैं,लेकिन वही कुत्सित खेल आप किसी दूसरे देश की सीमा पर खेल रहे हैं,तब आपको बहुत मजा आने लगता है,यह तो बहुत दोहरा मापदंड है ! आजकल अमेरिकी मिडिया विशेषकर न्यूयॉर्क टाइम्स रूस, चीन,उत्तर कोरिया के शासकों को चुन-चुनकर गालियाँ दे रहा है और उन्हें खलनायक जैसे पेश कर रहा है ! यथा ‘रूस में एक ताकतवर तानशाह है,जो अपने पड़ोसी पर हमले की धमकी दे रहा है, चीन अपने ही लोगों की सामूहिक हत्याओं को अंजाम दे रहा है,व्लादिमीर पुतिन कट्टरपंथ को नए सिरे से परिभाषित कर खुद को विश्व नेता बनना चाहता है,पुतिन,शी जिनपिंग आदि कट्टरवादी नेताओं ने उदारवादी समाजों को विफल करने का काम किया है,रूस की सेना यूक्रेन की सीमाओं पर है,क्योंकि पुतिन एक उथल-पुथल भरा विश्व चाहते हैं,वर्ष 2014 में क्रिमिया पर कब्जा जमा चुके व्लादिमीर पुतिन अब यूक्रेन पर कब्जा करना क्यों चाहते हैं,पुतिन एक क्रूर नेता हैं,जिनकी हिंसक मानसिकता रूसी संस्कृति से घुली-मिली है,वह देख रहे हैं कि यूरोपीय संघ में शामिल होता यूक्रेन रूस के तानाशाही शासन के बरक्स ज्यादे विकसित हो रहा है,वह चाहते है कि यूक्रेन विफल हो,यूरोपीय संघ विखंडित हो और अमेरिकी राष्ट्रपति के पद पर डोनाल्ड ट्रंप जैसे लोग सत्तासीन हों,ताकि वैश्विक स्तर पर उथल-पुथल की स्थिति बनी रहे, पुतिन हमेशा ही गलत जगह पर गरिमा पाने की कामना करते रहे हैं,इस लिहाज से वे बहुत ही दयनीय हैं,लेकिन वे सशस्त्र व ख़तरनाक़ भी उतने ही हैं आदि-आदि बहुत सी आलोचनात्मक बातें ‘ ,जिनको इस संक्षिप्त लेख में उद्धृत करना संभव ही नहीं है ! उक्त रिपोर्टिंग से लग रहा है,जैसे अमेरिकी चमची और एकपक्षीय मिडिया को पता ही न हो कि आखिर यूरोप की पूर्वी सीमा पर लिथुआनिया से लेकर यूक्रेन तक रूस की सीमा पर अमेरिकी कर्णधारों द्वारा क्या-क्या कुत्सित सैन्य चक्रव्यूह की रचना की जा रही है ! जिससे न चाहते हुए भी रूस को उसका सशक्त विरोध करने को मजबूर होना पड़ रहा है !
अमेरिका जैसे देश का यह विगत इतिहास रहा है कि वह सिर्फ अपने स्वार्थ की खातिर दुनिया के तमाम देशों यथा उत्तर कोरिया, वियतनाम,इराक,क्यूबा,सीरिया,लिबिया,ईरान, अफगानिस्तान आदि पर पहले आर्थिक प्रतिबंध लगा कर वहाँ दवाइयों,पेट्रोल,खाद्यान्न पदार्थों आदि की बेहद कमी करके वहाँ की जनता का जीवन बेहद नारकीय बनाकर रख देता है,फिर भी अगर वहाँ के लोग और वे देश अपने स्वाभिमान पर अडिग रहते तो उस स्थिति में पहले से ही जर्जर आर्थिक स्थिति वाले इन देशों पर जबरन सीधा युद्ध थोप देता है ! और उस देश की लाखों-लाख जनता को युद्ध की बलि चढ़ा देना इस युद्धपिपाषु अमेरिका का शौक रहा है ! यह कटुसच्चाई है कि दुनिया का बड़ा से बड़ा और खूंख्वार आतंकवादी संगठन भी हजार-पांच सौ लोगों की हत्या करता है,लेकिन अमेरिका जैसे रक्तपिपासु और वैश्विक आंतकवादी देश दुनिया के तमाम गरीब व कमजोर राष्ट्रों की प्रत्यक्षतः हत्या ही कर देता रहा है ! अमेरिका द्वारा कुछ देशों पर युद्ध थोपकर वहाँ के लाखों सैनिकों और वहाँ के निरपराध लोगों को मौत के घाट उतारा है उसका एक नमूना देखिए कोरियाई प्रायद्वीप में हुए युद्ध में दक्षिण कोरिया के अनुसार उसके 4 लाख लोग मरे,उत्तर कोरिया के मृतकों की संख्या अनुपलब्ध है,वियतनाम युद्ध में 30लाख वियतनामी सैनिक और जनता मरी,जापान के हिरोशिमा और नागसाकी पर परमाणु बम गिराकर 2लाख 46 हजार निरपराध जापानी लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया और अब अमरीकी कर्णधार अफगानिस्तान में पिछले 20 सालों में 2लाख 40 हजार सैनिक सहित आम जनता का कत्ल करने के बाद उसके हाल पर छोड़कर अपने देश को भाग खड़े हुए हैं !
सबसे बड़ी बिडम्बना और पूरे विश्व के लिए त्रासद स्थिति यह है कि अमेरिका जैसे देश के कर्णधारों द्वारा इतनी बड़ी मानवीय हत्याकांड करने के बावजूद अपने द्वारा किए गए विश्वमानवता की इस तरह की जघन्यतम हत्या के लिए किसी तरह की आत्मग्लानि व अपराध बोध तक नहीं है ! आश्चर्यजनक व कटुयथार्थ ये है कि अमेरिकी कर्णधारों को एक देश या एक राष्ट्रराज्य को नेस्तनाबूद करने के तुरंत बाद तुरंत ही किसी नये और अन्य राष्ट्रराज्य को किसी न किसी बहाने ‘शिकार ‘करने के लिए कोई नया बहाना ढूंढ़कर उधर अपने लाव-लश्कर के साथ चल पड़ने की एक पैशाचिक आदत सी हो गई है ! इस एक देश से इस धरती की समस्त मानवता बेहद व्यथित और त्रस्त है ! विश्वमानवता प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका से दग्ध इस दुनिया के करोड़ों लोगों की असमय मौत को साढ़े सात दशक पूर्व देख चुकी है ! यह त्रासद स्थिति अब हर हाल में रूकनी ही चाहिए,इतनी बड़ी मानवीय हत्याओं को हर हाल में रोकने के लिए इस दुनिया में गंभीर चिंतन-मनन होनी ही चाहिए,और बेलगाम अमेरिकी साम्राज्यवाद की मानव की खून की होली का बीभत्स खेल अब इंसानियत के नाते हर हाल में रूकनी ही चाहिए,ताकि कहीं तृतीय विश्वयुद्ध का आगाज़ हर हाल में न हो,क्योंकि तृतीय विश्वयुद्ध के बाद संभवतः यह धरती जीवन के स्पंदन से मुक्त होकर इस ब्रह्मांड के अरबों ग्रहों,उपग्रहों और तारों की तरह जीवन के स्पंदन से एकदम मुक्त एक वीरान,उजाड़ ग्रह में तब्दील होकर रह जाने की ज्यादे संभावना है ! यह कपोलकल्पना नहीं अपितु कटुसच्चाई है क्यों कि इस समूची धरती को कई बार नष्ट कर देनेवाले विनाशकारी हथियारों का बहुत बड़ा अंबार इसी धरती पर बिल्कुल तैयार रखा हुआ है,बस एक बटन पर अंगुली रखने की देर है,इसलिए हर हाल में इस धरती के कुछ नरपिशाचों की हवस को रोकना ही होगा !

निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड, अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक, पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ‘, गाजियाबाद, उप्र

Ramswaroop Mantri

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