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कहां गायब हो गई अफगान स्नो…भारत की पहली स्वदेशी ब्यूटी क्रीम

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भारत की पहली स्वदेशी ब्यूटी क्रीम ‘अफगान स्नो’ की कहानी बेहद दिलचस्प है. यह सिर्फ एक कॉस्मेटिक उत्पाद नहीं था, बल्कि स्वदेशी और स्वाभिमान का प्रतीक भी था. इसका नाम अफगान स्नो क्यों पड़ा. इसकी भी दिलचस्प कहानी है.

भारत ने 100 सालों से कहीं ज्यादा पहले एक शानदार स्वदेशी क्रीम लांच की. इसका नाम अफगान स्नो. ये बाजार में हॉट केक की तरह बिकती थी. इसको भारत के एक प्रसिद्ध उद्योगपति ने बनाया. इसको बनाने वाले ई एस पाटनवाला की भी कहानी उतनी ही दिलचस्प है, मामूली आदमी से एक उद्योगपति बनने की, जो सपनों को पूरा करने के लिए गुजरात से मुंबई आ गया था.

अफगान स्नो क्रीम को ई.एस. पाटनवाला ने 1919 में लॉन्च किया. पहले पाटनवाला की ही कहानी जान लेते हैं. उन्होंने मामूली शुरुआत की थी. वह मामूली शुरुआत के बाद एक औद्योगिक साम्राज्य खड़ा करना चाहते थे. वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ‘मेक इन इंडिया’ का सपना उस समय सच किया जब भारत गुलाम था.

काम की तलाश में मुंबई आए 

पाटनवाला का जन्म गुजरात के कच्छ जिले के एक छोटे से गांव में हुआ. बहुत कम उम्र में काम की तलाश में वह बॉम्बे आ गए. उनके पास बहुत पूंजी नहीं थी, लेकिन इत्र और जड़ी-बूटियों की गहरी समझ थी. उन्होंने मुंबई के पायधुनी इलाके में एक छोटी सी दुकान से अपना काम शुरू किया, जहां वह खुद इत्र और क्रीम के मिश्रण तैयार करते थे.

अफगान स्नो की बढ़ती मांग को देखते हुए पाटनवाला जी ने मुंबई में बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू किया. उनकी मुख्य और सबसे प्रसिद्ध फैक्ट्री मुंबई के भायखला इलाके में स्थित थी. ये जगह उस समय मुंबई के प्रमुख औद्योगिक केंद्रों में एक थी.

आज भी भायखला में ‘पाटनवाला मार्ग’ और ‘पाटनवाला इंडस्ट्रियल एस्टेट’ के नाम से जगहें मौजूद हैं, जो इस ब्रांड की ऐतिहासिक विरासत की गवाह हैं. जैसे-जैसे व्यापार बढ़ा, उन्होंने महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों और मुंबई के बाहरी इलाकों में भी अपनी इकाइयां स्थापित कीं. पाटनवाला की फैक्ट्री उस दौर में बहुत उन्नत मानी जाती थी. वह विदेशी मशीनों के बजाय स्थानीय स्तर पर तकनीक विकसित करने पर जोर देते थे.

क्रीम के डिब्बी पर लिखा मेड इन इंडिया

उनकी फैक्ट्री ने हजारों भारतीयों को रोजगार दिया, जो उस समय अंग्रेजों के खिलाफ आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में एक बड़ा कदम था. उन्होंने उस समय अपनी क्रीम के डिब्बे पर “Made in India” लिखना शुरू किया, जब लोग विदेशी सामान को श्रेष्ठ मानते थे.

कैसे मिला अफगान स्नो नाम

पाटनवाला जी ने अपनी क्रीम का एक सैंपल अफगानिस्तान के तत्कालीन राजा अमानुल्लाह खान को भेंट किया. राजा इसकी खुशबू और बनावट से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, “यह तो अफगानिस्तान की बर्फ की तरह है. बस यहीं से इसे ‘अफगान स्नो’ नाम मिला.

कहा जाता है कि जब अफगानिस्तान के राजा ने 1919 में भारत का दौरा किया, तो उनकी मुलाकात बंबई में कुछ युवा उद्यमियों से हुई. उनमें से एक थे इब्राहिम सुल्तानअली पाटनवाला. उन्होंने राजा को अपने द्वारा निर्मित उत्पादों से भरी एक टोकरी भेंट की. इस टोकरी में बिना नाम की एक सफेद क्रीम का जार था. राजा ने टिप्पणी की कि यह उन्हें अफगानिस्तान की बर्फ की याद दिलाती है. इस तरह उस क्रीम को उसका नाम मिला. अफगान स्नो एक बहुउद्देशीय क्रीम थी, जो मेकअप बेस, मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन का काम करती थी.

पाटनवाला भारत के महानगरों में बॉल और पार्टियों के आयोजन के लिए लोकप्रिय था, जिनमें नरगिस और राज कपूर जैसे सितारों सहित समाज के प्रतिष्ठित लोग शामिल होते थे. इस ब्रांड ने 1952 में बॉम्बे में आयोजित भारत की पहली मिस इंडिया प्रतियोगिता को भी प्रायोजित किया.

विदेशी क्रीमों को कड़ी टक्कर दी

उस समय बाजार में ब्रिटिश और विदेशी क्रीमों का बोलबाला था. अफगान स्नो पहली भारतीय क्रीम थी जिसने विदेशी ब्रांड्स को कड़ी टक्कर दी. 20वीं सदी के मध्य तक अफगान स्नो हर भारतीय घर का हिस्सा बन चुकी थी. इसे दिग्गज अभिनेत्रियां प्रमोट करती थीं. भारत की पहली मिस इंडिया एस्तेर विक्टोरिया अब्राहम और अभिनेत्री नूतन इसके विज्ञापनों का चेहरा रहीं.

क्यों पीछे छूटा ये ब्रांड

इसकी पहचान इसकी छोटी कांच की बोतल और उस पर लगा खास लेबल था, जो उस समय काफी प्रीमियम माना जाता था. इतनी लोकप्रियता के बावजूद, समय के साथ यह ब्रांड धीरे-धीरे पीछे छूट गया. 80 और 90 के दशक में हिंदुस्तान यूनिलीवर और लक्मे जैसे ब्रांड्स ने भारी मार्केटिंग और नए फॉर्मूले के साथ बाजार पर कब्जा कर लिया.

जहां नए ब्रांड्स टीवी और रंगीन विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च कर रहे थे, अफगान स्नो अपनी पारंपरिक छवि और सीमित मार्केटिंग तक ही सिमट कर रह गया. हैरानी की बात यह है कि अफगान स्नो पूरी तरह बंद नहीं हुई है. ये अब भी ई एस पाटनवाला प्राइवेट लिमिटेड द्वारा बनाई जाती है, लेकिन इसकी उपलब्धता बहुत सीमित है.

महात्मा गांधी ने भी की तारीफ

महात्मा गांधी ने भी स्वदेशी आंदोलन के दौरान अफगान स्नो की सराहना की थी क्योंकि यह पूरी तरह शाकाहारी थी. इसमें जानवरों की चर्बी का इस्तेमाल नहीं किया गया था.

Ramswaroop Mantri

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