नवरात्रि के बाद दसवें दिन विजयादशमी का त्योहार मनाया जाता है, जिसे दशहरा कहते हैं। इस दिन परंपरा अनुसार रावण के पुतले का दहन कर, असत्य पर सत्य की विजय का पर्व मनाया जाता है। हमारी संस्कृति में भले ही रावण को खलनायक के रूप में देखा जाता हो, लेकिन हमारे ही देश में कुछ स्थान ऐसे भी हैं, जहां रावण का दहन नहीं बल्कि उसका पूजन किया जाता है। सदियों से चल रही आ रही इस परम्परा को आज तक किसी ने ना हिन्दू विरोधी ठहराया और ना रावन पूजकों को पाकिस्तान भगाने की धमकी दी lपूजा -पाठ , आस्था और खानपान की विविधता का भारत में हमेशा स्वागत हुआ है इसलिए परस्पर विरोधी विचार और परम्पराओं में कभी टकराव नहीं हुआ ,l सहिष्णुता और सहअस्तित्व पर टिकी हमारी बुनियाद को कमजोर कर भारतीय जन की एकता को खंडित करने के लिए संकीर्ण और साम्प्रदायिक तत्व लगातार सक्रीय रहे है l दुर्भाग्य से इस तरह के साम्प्रदायिक तत्व अब सत्ता पाकर बहुत प्रभावी हो गए है l यह चिंता की बात है l
जी हां, यकीन नहीं होता, तो जानिए रावण पूजा के इन 10 स्थानों के बारे में –
( 1 ) मंदसौर – मध्यप्रदेश के मंदसौर में रावण को पूजा जाता है। कहा जाता है कि मंदसौर का असली नाम दशपुर था, और यह रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी का मायका था। इसलिए इस शहर का नाम मंदसौर पड़ा। चूंकि मंदसौर रावण का ससुराल था, और यहां की बेटी रावण से ब्याही गई थी, इसलिए यहां दामाद के सम्मान की परंपरा के कारण रावण के पुतले का दहन करने की बजाय उसे पूजा जाता है। मंदसौर के रूंडी में रावण की मूर्ति बनी हुई है, जिसकी पूजा की जाती है।
( 2 ) उज्जैन – मप्र के उज्जैन जिले के एक गांव में भी रावण का दहन नहीं किया जाता, बल्कि उसकी पूजा की जाती है। रावण का यह स्थान उज्जैन जिले का चिखली गांव है। यहां के बारे में कहा जाता है, कि रावण की पूजा नहीं करने पर गांव जलकर राख हो जाएगा। इसी डर से ग्रामीण यहां रावण दहन नहीं करते और उसकी मूर्ति की पूजा करते हैं। ( 3) अमरावती – महाराष्ट्र के अमरावती में भी रावण को भगवान की तरह पूजा जाता है। यहां गढ़चिरौली नामक स्थान पर आदिवासी समुदाय द्वारा रावण का पूजन होता है। दरअसल आदिवासियों का पर्व फाल्गुन, रावण की खास तौर से पूजा कर मनाया जाता है। कहा जाता है कि यह समुदाय रावण और उसके पुत्र को अपना देवता मानते हैं। (4 ) बिसरख – यूपी के बिसरख नामक गांव में भी रावण का मंदिर बना हुआ है, जहां उसका पूजन होता है। ऐसा माना जाता है कि बिसरख गांव, रावण का ननिहल था। बिसरख का नाम पहले विश्वेशरा था जो रावण के पिता के नाम पर पड़ा था।
( 5 ) बैजनाथ – हिमाचल प्रदेश में स्थित कांगड़ा जिले का यह कस्बा भी रावण की पूजा के लिए जाना जाता है। यहां के बारे में कहा जाता है, कि रावण ने यहां पर भगवान शिव की तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे मोक्ष का वरदान दिया था। इसलिए शिव के इस भक्त का इस स्थान पर पुतला नहीं जलाया जाता। (6 ) आंध्रप्रदेश – आंध्रप्रदेश के काकिनाड नामक स्थान पर भी रावण का मंदिर बना हुआ है, जहां भगवान शिव के साथ उसकी भी पूजा की जाती है। यहां पर विशेष रूप से मछुआरा समुदाय रावण का पूजन अर्चन करता है। यहां के लेकर उनकी कुछ और भी मान्यताएं हैं।
(7) जोधपुर – राजस्थन के जोधपुर में भी रावण का मंदिर और उसकी प्रतिमा स्थापित है। कुछ समाज विशेष के लोग यहां पर रावण का पूजन करते हैं और खुद को रावण का वंशज मानते हैं। इस स्थान को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कुछ लोग इसे रावण का ससुराल बताते हैं।
( 8) कनार्टक – कर्नाटक के मंडया जिले के मालवल्ली तालुका नामक स्थान पर रावण का मंदिर बना हुआ है, जहां लोग उसे पूजते हैं। इसके अलावा कर्नाटक के कोलार में भी लोग शिवभक्त के रूप में रावण की पूजा करते हैं।
(9 ) दक्षिण भारत में रावण को विशेष रूप से पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है, कि रावण परम ज्ञानी, पंडित, शिवभक्त था। दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर रावण के इन्हीं गुणों के कारण वह पूजा जाता है। वे रावण दहन को दुर्गुणों का दहन मानते हैं।
(10 ) उत्तर प्रदेश के जसवंतनगर में दशहरे पर रावण की आरती उतार कर पूजा की जाती है। फिर उसे मार-मारकर टुकड़े कर उसके टुकड़े किए जाते हैं। इसके बाद लोग रावण के टुकड़ों को घर ले जाते हैं और तेरहवे दिन रावण की तेरहवीं भी की जाती है।
पं. सुशील शर्मा ‘सरल’ जी के अनुसार आज जब पूरा देश विजयादशमी पर भगवान श्रीराम की पूजा करेगा और रावण के पुतले का दहन किया जाएगा, वहीं मध्यप्रदेश के विदिशा जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव ऐसा है जहां रावण बाबा की पूजा की जाएगी। विदिशा की नटेरन तहसील के रावण गांव में देश की परम्परा के विपरीत रावण को देवता मानकर पूरे भक्ति भाव से उसकी पूजा आराधना की जाती है। रावण को यहां रावण बाबा कहा जाता है। रावण बाबा के नाम से प्रसिद्ध यहां के मंदिर में रावण की वर्षों पुरानी विशाल प्रतिमा है। इसका पूजन ग्रामवासी पूरे भक्ति भाव से करते हैं और बरसों से चली आ रही इस परम्परा को ग्रामीण निभाते चले आ रहे हैं। गांव में कोई भी शुभ कार्य या मांगलिक कार्य, बिना रावण बाबा की पूजा के अधूरे माने जाते हैं। विवाह के बाद वर वधु बिना रावण बाबा को प्रणाम किए घर में प्रवेश नहीं करते हैं। इतना ही नहीं जो लोग गांव छोड़ कर चले गए हैं वह भी कोई भी शुभ कार्य बिना रावण की आराधना के शुरू नहीं करते हैं। रावण बाबा गाँव के प्रथम पूज्य देवता हैं। उनके नाम से ही गांव का नाम पड़ा है ‘रावण’। यहां तो हमेशा उनकी पूजा होती है। कोई भी काम हो सबसे पहले इनकी ही पूजा होती है।ग्रामवासियों का कहना है कि यहां पर रावण बाबा को कुलदेवता के रूप में माना जाता है। शादियां होती हैं तो सबसे पहले तेल की रूई का फोहा रावण बाबा को चढाया जाता है। यहां पर लोग जो भी नया सामान, वाहन आदि खरीदते हैं, उन सभी पर जय लंकेश लिखा जाता है।ग्राम रावण में रावण मंदिर के पास एक गूदे की पहाडी है। किवदंती है कि उस पर एक दानव रहता था, वह बहुत बलशाली था। उसके सामने जो भी आता था उसकी आधी शक्ति उस दानव में चली जाती थी, लेकिन जब वह रावण के सामने आता था तो बलहीन हो जाता था। इस पर रावण ने उससे कहा कि वह उससे यहां नहीं उसकी गुफा में जाकर ही युद्ध करेगा। रावण ने गुफा में उस दानव को मारा और तभी से शक्ति के प्रतीक रावण बाबा की प्रतिमा यहां लेटी अवस्था में है।