चंचल भू
तापमान गिर कर सात पर । सुबह के सात बजे हैं । राहुल गाँधी पैण्ट और “ वही “ टी शर्त पहने हुए हैं , अटल जी की समाधि पर फ़ूल चढ़ा रहे हैं ।
खबर लोप करने वाले भी , ख़बर के पीछे दौड़ पड़े हैं ।
“ तक” वालियों के मुँह खुले पड़े हैं । सवाल झर रहे हैं । गिरोही मुँह बाये खड़ा है –
-राहुल गाँधी अटल जी की समाधि पर क्यों आये ? “दिखावा” है या “श्रद्धा “ ? ( बेवक़ूफ़ियों की खूबी होती है , वो पहले आपको अपने धरातल पर खड़ा करेगी , फिर आपके मुँह में अपनी ज़बान रखेगी । आप इसी के इर्द गिर्द घूमेंगे । पूछने वाले के सामने महज़ दो विकल्प है – बताओ यह “ दिखावा “ है या श्रद्धा ? देवी जी ! अनगिनत विकल्प हैं , “सामान्य शिष्टाचार “ “ इंसानी फ़र्ज़ “ “ रवायत “ वग़ैरह वग़ैरह । लेकिन ये सब आपको नहीं भायेगा । आपको तो राहुल गाँधी को हरहाल में कटघरा खोलना है । )
बंधु ! इसे कहते हैं समबोध । मतभेद का कोई भी रिश्ता म्मनभेद से नहीं बनता । तुमने यहाँ भी राहुल गाँधी को मौक़ा दिया कि सिखा दो रवायत क्या होती है ? इतिहास हंसने लगता है – कांग्रेस (पार्टी ) का संविधान , कांग्रेस के धुर और मुखर आलोचक मशहूर समाजवादी आचार्य नरेंद्र देव बनाते हैं । मतभेद होगा , होना चाहिये , लेकिन मनभेद कहाँ से आ गया ? ६३ में पंडित नेहरू हर तरफ़ से यह चाहते थे , देश की संसद में डॉ लोहिया और दादा कृपलानी आयें । ये दोनों पंडित नेहरू के मुखर विरोधी रहे । कांग्रेस से समाजवादी कांग्रेसी अलग हुए । आचार्य नरेंद्र देव विधान सभा सदस्य थे , पंडित नेहरू नहीं चाहते थे की आचार्य जी विधान सभा सदस्य से हटें लेकिन आचार्य जी नहीं माने और इस्तीफ़ा देकर चुनाव मैदान में उतरे । पंडित नेहरू नहीं चाहते थे कि आचार्य के ख़िलाफ़ कोई कांग्रेसी चुनाव में आये लेकिन गोविंद बल्लभ पंत ने ज़िद करके बाबा राघव दास को कांग्रेस उम्मीदवार बनाया । आचार्य जी हारे ।
पंडित नेहरू ही नहीं , विजयी बाबा राघवदास भी दुखी हुए और यहाँ टतक कह डाला कि आचार्य जी को चुनाव जीतना चाहिये था । डॉ लोहिया पंडित नेहरू के सघन आलोचक रहे लेकिन मूतमइन हैं “- जब कभी हम बीमार होंगे तो जानते हो हमारी सबसे अच्छा देखभाल कहाँ होगा ? पंडित ( नेहरू ) जी के घर “ । खोलो इतिहास और देखो – शेख़ अब्दुल्ला को पंडित नेहरू ने जेल में डाला हुआ है । उनका बेटा फ़ारूख़ अब्दुल्ला डाक्टरी की पढ़ाई कर रहा है फ़ीस कहाँ से दे ? अपनी माँ ( बेगम अकबर जहाँ बेगम ) से पूछा पैसे चाहिये । माँ शेरनी थी , महात्मा गाँधी की दत्तक पुत्री , बोली – जाओ पंडित नेहरू से लो जिन्होंने शेख़ साहब को जेल में डाला हुआ है ।
पंडित नेहरू अपनी तनख़ाह से भरपायी करते रहे । गिरोहियो ! आज जब राहुल गाँधी कहते हैं कि हमारी टकराहट किसी व्यक्ति से नहीं विचार से है तो दोनों में ( संघ और कांग्रेस ) यही फ़र्क़ है । “अटल जी की बीमारी का इलाज राजीव गाँधी जी कराते हैं , सोनिया जी अटल जी का हाल चाल लेती रहती हैं , यह है कांग्रेस की रवायत । दूसरी ओर उन्ही राजीव जी की बीमार पत्नी , श्रीमती सोनिया गाँधी जी को बीमारी की हालत में संघी सरकार नाजायज़ ढंग से E D दफ़्तर में घंटों बिठाये रखा जाता है । यह फ़र्क़ है ।
टी शर्ट ?
- ठंढ नहीं लगता ?
बहुत सहज जवाब दिया राहुल गाँधी ने –
– किसान को देखो , मज़दूर को देखो , अभाव में खड़े युवजन को देखो ।
सुनाई नहीं पड़ा ? जो इतिहास कह रहा है – 1916/17 में चंपारन ने मोहनदास करमचंद गाँधी के कान में कहा था – “ चंपारन अधनंगा है । अभाव है । एक आने पर ज़िंदगी बसर कर रहा है । “ विलायत पलट करमचंद महात्मा गाँधी बन कर लौटा है । ब्रिटेन में जाकर अंग्रेज साम्राज्य के वैभव को उनके महल में खड़ा होकर चुनौती दिया है । दसलखिया कोट ! चर्चा इस टी शर्त की है
देश अब भी अभाव में है ।
( चित्र में नेहरू जी के साथ दिल्ली की प्रथम मेयर श्रीमती अरुणा आसफली )





