अग्नि आलोक
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  कौन जात हो भाई ?

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 डाक्टर नरेश ‘सागर

 खेत में काम करने वाले एक मजदूर से एक तिलक लगाएं और रूद्राक्ष की माला पहने एक व्यक्ति ने उसकी जाति क्या पूछ ली…..!

वहां उपस्थित सभी जानवर विचित्र -विचित्र व्यवहार करने लगे !

              कुत्ते भौंकने लगे !

          कौआ काउं काउं करने लगे !

      लोमड़ी मुस्कराने लगी !

  बंदर नाचने लगे !

       ये सब देखकर जाति पूछने वाले व्यक्ति ने चिंताजनक स्थिति में सवाल किया, ‘तुम सब जानवर ऐसा कृत्य क्यों कर रहे हो ? ‘

          सारे पशु – पक्षी एक साथ बोल उठे !

            हम तो आप दोनों को मनुष्य ही समझ रहें थे…!आपकी भी जात होती है ? आज हमें ये पता चला !

                  इससे पहले कि वो उजले कपड़े पहने हुआ व्यक्ति कुछ कह – सुन पाता..!

          कुत्ता बोला,

              ‘ तुम कितने पापी और पाखंडी हो ? ‘

‘जात पूछकर बात करते हो, तुमसे अच्छे तो हम जानवर लोग ही हैं,जो एक दूसरे की जाति जानने के बाद भी एक साथ रह लेते हैं ! ,’

               कौआ गुस्से में बोला,

            ‘ मैं कितनी ही जाति के जानवरों की पीठ पर जा बैठता हूं और वो मेरी जाति जानकर भी मेरा विरोध नहीं करते….. डूब मरो । ‘

         गुस्से से लाल मुंह करें अब बंदर कहने लगा,

               ‘हम सभी अलग-अलग जातियों के पशु -पक्षी एक साथ एक ही तालाब में पानी पीते हैं, स्नान करते हैं, खेलते हैं, अच्छा है ईश्वर ने हमें मनुष्य नहीं बनाया ! ‘

               ‘ आज तुम्हें देखकर शर्म आ रही है। ‘

            ये सब सुनकर जाति पूछने वाला व्यक्ति नजरें गड़ाए आगे के लिए कदम बढ़ा ही रहा था कि,

              एक लोमड़ी ने उसे रोकते हुए कहा,

              ‘जिस आदमी के बनाये हुए कुओं और तालाबों से तुम पानी पीते हो उसी से ही तुम उसकी जाति पूछने में तुम्हें शर्म नहीं आती ? ‘

         ‘जिस आदमी के हाथों उगाएं अन्न से पेट भरते हो उसी से जाति पूछने में जरा सी भी लज्जा नहीं आती तुम्हें ? ‘

              ‘ जिस आदमी के द्वारा निर्मित मकानों में तुम रहते हो,उनसे ही उनकी जाति पूछने पर तुम डूब कर मर क्यूं नहीं जाते ? ‘

                    ‘जिस आदमी के निर्माण से तुम्हारी आस्था के मंदिर चमक रहें हैं, उससे जाति पूछने पर तुम्हें मौत क्यों नहीं आ आती ? ‘

              जिस आदमी ने तुम्हारे नंगें बदन को ढकने के लिए कपड़ा और कंकर ,पत्थर और  शूलों की चुभन से बचाने के लिए जूते बनाएं उनसे जाति पूछने जैसी बेशर्मी लाते कहां से हो तुम ? ‘

               ‘जिस आदमी ने तुम्हारे लिए भोजन और स्वास्थ्य के लिए फल,सब्जियां,औषधियों के साथ – साथ तुम्हारे सम्मान के लिए भिन्न -भिन्न तरह के फूल उगाएं उससे जाति पूछने वाले तुम होते कौन हो….? ‘

         लोमड़ी का गुस्सा तेज होता जा रहा था, उसने अपने आप को संभालते हुए पूछा ?

             ‘क्या तुम्हारा भी कोई योगदान है इस धरती को संवारने,सजाने और इस पर रह रहे जीवों के भलाई के लिए ? ‘

        ‘ तुम अपना एक भी काम बताओ जो इस धरती,इसके रहवासियों और इसकी प्रकृति के लिए जो तुमने बिना स्वार्थ किया हो ? ‘

                वो तिलकधारी व्यक्ति जाने ही वाला था कि…!

             अचानक वहां एक गिरगिट आ धमका और कहने लगा…!  

           ‘ मैं तो अपने भोजन करने के लिए और स्वयं के दुश्मनों से बचाव के लिए रंग बदलता रहता हूं , परंतु तुम किस लिए अपना रंग बदलते रहते हो ? ‘

           ‘हमें तो शर्म आ रही है आज आदमी की जाति को देखकर जो अपने अंदर भी जाति लेकर घूमता रहता है। अपने ही साए से उसका पता पूछता है ! ‘

          ‘थू ! है तुम्हारी घटिया,नीच और शर्मनाक मानसिकता पर ! !

           जैसे ही वो तिलकधारी पुरूष ऊपर की और देखने लगा…!

         कौआ ने उसके मुंह पर बीट कर दी !

          ये देख सभी पशु -पक्षी जोर से हंसने लगें !            मगर इतना सब कुछ होने के बाद भी उस आदमी ने दूसरे आदमी से जात पूछनी नहीं छोड़ी !

          उस तालाब पर अपने गंदे चेहरे को धोने से पहले तालाब की रखवाली करने वाले पहरेदार से भी वह तिलकधारी पाखंडी उससे उसकी जाति पूछने लगा….!

     ‘कौन जात हो भाई ???? :

     -इंटरनेशनल साहित्य अवार्ड से सम्मानित, सुप्रसिद्ध जनकवि ,बेखौफ शायर,लेखक,- डाक्टर नरेश ‘सागर ‘

प्रस्तुतकर्ता -शिवाजी पाल , अत्यंत प्रखर व्यक्तित्व, उत्तर प्रदेश, संपर्क – 93225 98532संकलन व संपादन -निर्मल कुमार शर्मा गाजियाबाद उप्र संपर्क – 9910629632

Ramswaroop Mantri

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