शशिकांत गुप्ते
कुछ लोगों की बुद्धि बहुत तीक्ष्ण होती है। ऐसा वे लोग स्वयं ही कहतें हैं? अपनी कुशाग्र बुद्धि को प्रमाणित करने के लिए, ये लोग इन कहावतों का इस्तेमाल करतें हैं। उड़ते हुए परिंदे के पर गिन लेतें हैं दूसरी कहावत लिफाफा देख कर मज़मून भांप लेतें हैं।
इस तरह स्वयं के द्वार स्वयं की स्तुति करना मतलब अपने मुँह मिया मिठ्ठू बनने जैसा ही है।
गांधीवादी विचारक विनोबा भावेजी कहा है, कोई व्यक्ति अपने माथे पर गुदवाले, मै शरीफ हूँ, यह उचित नहीं है। समाज ने कहना चाहिए कि फलाँ व्यक्ति शरीफ है।
थोड़ी देर के लिए मान लेतें हैं कि, कुछ लोगों की बुद्धि तीक्ष्ण हो सकती है?
लिफ़ाफ़े को खोले बगैर मज़मून भाप लेने की क्षमता रखने वालों को साइकिल के साथ बंम का सम्बंध स्थापित करने कोई संकोच नहीं होता है,लेकिन पुलवामा में हुए विस्फोटक रसायन के धमाके की आवाज सुनाई नहीं देती है।
हाल ही में हिमायल निवासी एक अदृश्य बाबा की चर्चा समाचार माधयमों हो रही है। आश्चर्यजनक बात यह है कि, यह बाबा अदृश्य होतें हुए भी इंटरनेट का उपयोग बखूबी कहते हुए ईमेल भेज सकतें है, लेकिन दिखाई नहीं देतें हैं? ऐसे बाबा तक सम्भवतः तीक्ष्ण बुद्धि वालों की क्षमता कम पड़ती होगी?
तीक्ष्ण बुद्धि का आवरण ओढ़ने वालों को विपक्ष की आतंकवाद से अंतरंगता दिखाई देती है। लेकिन इनकी नजर से धर्म संसद के आयोजन ओझल हो जातें हैं?
मै यह व्यंग्य लिख ही रहा था, उसी समय मेरे व्यंग्यकार मित्र सीतारामजी प्रकट हुए क्षमा करना सीतारामजी मेरे घर पधारें। सीतारामजी कोई अदृश्य बाबा नहीं है?
सीतारामजी मेरा लिखा हुआ पढ़ कर कहने लगे इसतरह के व्यंग्य लिखने में इतना दिमाग़ खर्च मत करो।
आप व्यंग्यकार हो आप तो इन छद्म कुशाग्र बुद्धि वालों पर व्यंग्य करने में अपना मूल्यवान समय बर्बाद मत करों।
व्यंग्य करना होतों बर्बाद हो रही देश की अर्थ व्यवस्था पर चिंता करों।
आमजन को immunity बढाने के सलाह देने के बजाए लोगों में Humanity जागृत करने की सलाह दो। Immunity मतलब रोग प्रतिरोधक क्षमता की सलाह सिर्फ खास लोगों के लिए होती है,आम लोगों में अन्याय का विरोध करने की क्षमता जागृत होनी चाहिए।
अन्याय का विरोध करने की क्षमता आमजन में Humanity मतलब इंसानियत के जागृत होने से अपने आप आएगी।
सीतारामजी ने कहा इस विषय पर व्यंग्य लिखने के लिए,
फ़िल्म पहचान का गीत जो गीतकर वर्मा मलिकजी ने लिखा इस गीत की कुछ पंक्तिया लिख दो।
सब से बड़ा नादाँ वही है
जो समझे नादाँ मुझे
कौन कौन कितने पानी में
सब की है पहचान मुझे
कोई शान की खातिर पैसे को
पानी की तरह बहता है
इस सभा की सुन्दर चेहरों से
रौनक तो बढाती है लेकिन
रौनक वाले चेहरों के
पीछे मिले है दिल सुनसान मुझे
धर्म कर्म सभ्यता मर्यादा
नज़र न आई मुझे कहीं
गीता ज्ञान की बाते देखो
आज किसी को याद नहीं
माफ़ मुझे कर देना भाइयो
झूठ नहीं मैं बोलूंगा
वही कहूँगा आपसे जो गीता से
मिला है ज्ञान मुझे
सीतारामजी की बातें सुनकर मेरे भ्रम दूर हो गए।
मै स्वयं को पहचानने का प्रयास करने लगा कि,मै स्वयं कितने पानी में हूँ।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





