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कौन सेट कर रहा ‘ब्राह्मण बनाम बीजेपी’ का नैरेटिव ?

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फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ पर ब्राह्मणों की नाराजगी बारूद बन रही है. लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है. यूपी से एमपी तक ‘ब्राह्मण बनाम बीजेपी’ का एक नैरेटिव सेट हो रहा है. बीजेपी के राजनीतिक उत्थान की कहानी में अगर किसी एक समुदाय का बिना शर्त और एकमुश्त समर्थन रहा है, तो वह ब्राह्मण समुदाय है. 90 के दशक के राम मंदिर आंदोलन से लेकर 2014 और 2019 की मोदी लहर तक, ब्राह्मण वोटर भाजपा के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ माना जाता रहा. लेकिन पिछले कुछ समय से, विशेषकर यूपी और मध्य प्रदेश के सियासी गलियारों में एक सवाल तैर रहा है- क्या पंडित जी नाराज हैं?

यूपी हो या एमपी इन द‍िनों एक खास नैरेट‍िव देखने को मिल रहा है. दावा क‍िया जा रहा क‍ि बीजेपी से ब्राह्मण नाराज हैं. यहां तक कहा गया क‍ि 2024 के लोकसभा चुनावों में यूपी की कुछ सीटों पर भाजपा की हार का कारण राजपूत और ब्राह्मणों की नाराजगी और घर बैठना यानी वोटिंग न करना था. ब्राह्मण व‍िधायकों की बैठक, यूजीसी नोट‍िफ‍िकेशन से लेकर अलंकार अग्निहोत्री विवाद ने इसे और बड़ा बना द‍िया है.

यह सवाल हवा में नहीं है.  कानपुर में अलंकार अग्निहोत्री कांड हो, विश्वविद्यालयों में यूजीसी (UGC) के नियमों को लेकर असंतोष हो, या फिर यूपी-एमपी में बंद कमरों में हो रही ‘ब्राह्मण बैठकें’… ये सब उस नैरेटिव’ के टुकड़े हैं जो यह इशारा कर रहे हैं कि कोर वोटर अब खुद को इग्नोर वोटर महसूस कर रहा है. लेकिन हकीकत क्‍या यही है? या फ‍िर इसके पीछे कोई कहानी है? क्‍योंक‍ि सोशल मीडिया में रोज नई जंग जैसा महसूस होता है. नई-नई कहानी ढूंढकर लाई जा रही है.

यूपी में बीजेपी के ब्राह्मण व‍िधायकों के एक कमरे में बैठक की तस्‍वीरों ने हलचल मचा दी.

इस ‘नैरेटिव’ की नींव असल में यूपी में तब पड़ी, जब सत्ताधारी दल के ही ब्राह्मण विधायकों ने बंद कमरे में मीटिंग की. व‍िधायकों ने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन व‍िपक्ष की ओर से प्रचार‍ित क‍िया जाने लगा क‍ि ब्राह्मण व‍िधायक ही जब सरकार से खुश नहीं हैं तो सामान्‍य लोगों की बात कौन करे? सपा अध्‍यक्ष अख‍िलेश यादव ने तो इसे योगी सरकार के ख‍िलाफ बिगुल बता द‍िया. हालांक‍ि, उसके बाद कहानी में ट्व‍िट आया और अब तक कुछ भी नहीं हुआ. बीजेपी ने भी साफ मैसेज दे द‍िया क‍ि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा.

यूपी के ब्राह्मण संगठनों जैसे अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा की बंद कमरों की बैठकों में एक आंकड़ा अक्सर दोहराया जाता है- थानों में एसओ (SO) कौन है? जिलों में डीएम-एसपी कौन है? आरोप है कि ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘एनकाउंटर नीति’ की आड़ में एक जाति विशेष (ब्राह्मण) को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि दूसरी जाति को अभयदान प्राप्त है. खुशी दुबे का मामला हो या बिकरू कांड के बाद की कार्रवाई, ऐसे प्रचार‍ित क‍िया गया, जैसे समुदाय के एक वर्ग को लग रहा हो कि न्याय के नाम पर ‘बदला’ लिया गया.

मध्य प्रदेश: विंध्य और चंबल का असंतोष

मध्य प्रदेश में मुद्दा सत्ता में हिस्सेदारी का है. एमपी में भाजपा ने ओबीसी चेहरे को सीएम बनाकर एक बड़ा दांव खेला. यह सोशल इंजीनियरिंग के लिहाज से मास्टरस्ट्रोक था, लेकिन इसका साइड इफेक्ट ब्राह्मणों की नाराजगी के रूप में सामने आया. विंध्य क्षेत्र रीवा, सतना ब्राह्मण बाहुल्य है. यहां से भाजपा को बंपर वोट मिले, लेकिन जब मंत्रिमंडल और सीएम पद की बारी आई, तो दावा क‍िया गया क‍ि इस क्षेत्र को वह तवज्जो नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी. हाल ही में भोपाल और ग्वालियर में कई बैठकों की बात सामने आई है. हालांक‍ि, नाराजगी बीजेपी से नहीं दिखती. मगर एक नैरेट‍िव जरूर है.

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यूजीसी नोट‍िफ‍िकेशन से आया उबाल

असंतोष का सबसे बड़ा ‘विस्फोट’ यूजीसी नोट‍िफ‍िकेशन लेकर आया. सवर्ण खासकर ब्राह्मण समुदाय पूरी तरह खुलकर सामने आ गया. खुलकर कहने लगा क‍ि हमसे बदला ल‍िया जा रहा. स‍िटी मज‍िस्‍ट्रेट अलंकार अग्‍न‍िहोत्री के इस्‍तीफे और बाद में उनके ख‍िलाफ हुई कार्रवाई ने आग में घी का काम क‍िया.

व‍िपक्ष की ओर से चुप्‍पी थी, कोई नहीं बोल रहा था, लेकिन बीजेपी को समझ आ चुका था क‍ि उनकी नींव ह‍िलाने की कोश‍िश हो रही है. फ‍िर क्‍या था बीजेपी ने ब्राह्मण नेताओं को मैदान में उतार द‍िया. खुलकर बात की जाने लगी. अपनी ही संस्‍था की ओर से जारी नोट‍िफ‍िकेशन के ख‍िलाफ लोग बोलने लगी. आख‍िरकार सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने गुस्‍से की इस आग को ठंडा क‍िया. मगर क्‍या सच में गुस्‍सा थम चुका है? या च‍िंगारी को आग बनना अभी बाकी है.

सोशल इंजीनियरिंग का साइड इफेक्ट

बीजेपी की राजनीति ‘ओबीसी+दलित’ और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी के इर्द-गिर्द घूम रही है. पार्टी को लगता है कि हिंदुत्व की छतरी के नीचे सब आ जाएंगे. ब्राह्मण तो हमारा ही है, जाएगा कहां? अखिलेश यादव की सपा और कांग्रेस ब्राह्मणों को गले नहीं लगा पाएगी. बीजेपी इसी TINA फैक्‍टर यानी देयर इज नो अल्‍टरनेट‍िव फैक्टर पर खेल रही है. लेकिन इसमें क‍ितना दम बचा है, उस पर सवाल है.

विपक्ष की रणनीति: आग में घी डालने का काम

  1. विपक्ष इस नैरेटिव को लपकने में पीछे नहीं है. यूपी में सपा प्रमुख एक तरफ ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ बीजेपी में फूट का दावा. उन्‍होंने ही ब्राह्मण व‍िधायकों की बैठक को एक बड़ा नैरेट‍िव देने की कोश‍िश की थी.
  2. एमपी और यूपी में कांग्रेस अब सॉफ्ट हिंदुत्व के साथ-साथ ‘जातिगत जनगणना’ की बात कर रही है. यह दोधारी तलवार है, लेकिन कांग्रेस स्थानीय स्तर पर नाराज ब्राह्मणों को टिकट देकर अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है.

Ramswaroop Mantri

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