श्रवण गर्ग
इजरायल की एक कम्पनी द्वारा ‘हथियार’ के तौर पर विकसित और आतंकवादी तथा आपराधिक गतिविधियों पर काबू पाने के उद्देश्य से ‘सिर्फ’ योग्य पाई गईं सरकारों को ही बेचे जाने वाले अत्याधुनिक और बेहद महंगे उपकरण का चुनिन्दा लोगों की जासूसी के लिए इस्तेमाल किए जाने को लेकर देश की विपक्षी पार्टियों के अलावा किसी भी और में कोई आश्चर्य, विरोध या गुस्सा नहीं है। मीडिया के एक धड़े द्वारा किए गए इतने सनसनीखेज खुलासे को भी पेट्रोल, डीजल के भावों में हो रही वृद्धि की तरह ही लोगों ने अपने घरेलू खर्चों में शामिल कर लिया है। यह संकेत है कि सरकारों की तरह अब जनता भी उदासीनता के गहराते कोहरे की चादर में दुबकती जा रही है।सरकार ने अभी तक न तो अपनी तरफ से यह माना है कि उसने स्वयं ने या उसके लिए किसी और ने अपने ही देश के नागरिकों की जासूसी के लिए इन ‘हथियारों’ की खरीदारी की है और न ही ऐसा होने से मना ही किया है। सरकार ने अब किसी भी विवादास्पद बात को मानना या इंकार करना बंद कर दिया है। नोटबंदी करने का तर्क यही दिया गया था कि उसके जरिये आतंकवाद और काले धन पर काबू पाया जाएगा। लॉक डाउन के हथियार की मदद से कोरोना के महाभारत युद्ध में इक्कीस दिनों में विजय प्राप्त करने की गाथाएँ गढ़ी गईं थीं। दोनों के ही बारे में अब कोई बात भी नहीं छेड़ना चाहता। विभिन्न विजय दिवसों की तरह देश में ‘नोटबंदी दिवस’ या ‘लॉक डाउन दिवस’ नहीं मनाए जाते।





