सरकार कहती है कि इन कोड के लागू होने से कर्मचारियों को कई तरह की राहत मिलेंगी लेकिन इन दावों के बावजूद नए लेबर कोड का देशभर में विरोध हो रहा है। मजदूर संगठनों का कहना है कि यह बदलाव कर्मचारियों के बजाय कंपनियों और मालिकों को फायदा पहुँचाएगा।
भारत में केंद्र सरकार ने पुराने लेबर लॉ की जगह चार नए लेबर कोड लागू कर दिए हैं. सरकार इस कोड को कर्मचारियों और मज़दूरों के हित में बता रही है, जबकि कई मज़दूर संगठनों ने इसे मज़दूर विरोधी और उद्योगपतियों के हित में बताया है.
उनके मुताबिक़, “यह हमारे कामगारों को बहुत ताक़तवर बनाता है. इससे कम्प्लायंस भी काफ़ी आसान हो जाएगा और यह ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ को बढ़ावा देने वाला है.”हालाँकि कई मज़दूर संगठनों का मानना है कि इससे कामगारों का शोषण बढ़ेगा और इसे पूंजीपतियों के दबाव में तैयार किया गया है.
लेबर कोड के ख़िलाफ़ इंटक, एटक, एचएमएस, सीआईटीयू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, एईडब्लूए, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ़ और यूटीयूसी जैसे मज़दूर संगठनों ने 26 नवंबर को देशभर में विरोध प्रदर्शन का फ़ैसला भी किया है. क्या ये कोड भारत के मज़दूरों की न्याय के लिए इन 5 ज़रूरी मांगों को हक़ीक़त बना पाएंगे?

- मनरेगा समेत पूरे देश में हर किसी के लिए 400 रुपये की न्यूनतम मज़दूरी
- ‘राइट टू हेल्थ’ क़ानून जो 25 लाख रुपये का हेल्थ कवरेज देगा
- शहरी इलाक़ों के लिए एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट
- सभी असंगठित श्रेत्र के मज़दूरों के लिए पूरी सोशल सिक्योरिटी, जिसमें लाइफ़ इंश्योरेंस और एक्सीडेंट इंश्योरेंस शामिल है
- प्रमुख सरकारी क्षेत्रों में कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी पर रोक
मोदी सरकार को कर्नाटक सरकार और राजस्थान की पिछली सरकार से सीखना चाहिए, जिन्होंने नए कोड से पहले अपने ज़बरदस्त गिग वर्कर क़ानूनों के साथ 21वीं सदी के लिए लेबर रिफ़ॉर्म की शुरुआत की थी.”

आइए जानने की कोशिश करते हैं कि नए लेबर कोड में क्या है और इसके लागू होने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा.केंद्र सरकार ने ‘कोड ऑन वेज’ यानी पगार या मज़दूरी से जुड़ा कोड साल 2019 में ही संसद से पारित करा लिया था. इसके बाद साल 2020 में संसद के दोनों सदनों से तीन लेबर कोड को पारित कराया गया.
इनमें ऑक्यूपेशनल सेफ़्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड (ओएसएच), कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी और इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड शामिल हैं.हालांकि कई लोगों का मानना है कि किसानों से जुड़े क़ानून का विरोध शुरू होने के बाद सरकार ने लेबर कोड को लागू करने में सावधानी बरती है.
नया लेबर कोड क्यों हो रहा विवाद?
बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि कई बड़े मजदूर संगठन-जैसे इंटक, एटक और सीआईटीयू-नए लेबर कोड का भारी विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन नियमों की वजह से कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा कमजोर हो जाएगी और मालिकों को मनमानी करने का ज्यादा अधिकार मिल जाएगा। संगठनों का सबसे बड़ा आरोप ‘फिक्स्ड टर्म जॉब’ मॉडल पर है। उनके मुताबिक कर्मचारी को स्थायी नौकरी का कोई भरोसा नहीं होगा। इससे नौकरी की अनिश्चितता बढ़ेगी और मजदूर हर समय असुरक्षा में रहेंगे।कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, “मज़दूरों से जुड़े 29 मौजूदा क़ानूनों को 4 कोड में री-पैकेज किया गया है. इसका किसी क्रांतिकारी सुधार के तौर पर प्रचार किया जा रहा है, जबकि इसके नियम अभी तक नोटिफ़ाई भी नहीं हुए हैं.”
मजदूरों को सबसे ज्यादा डर हड़ताल से जुड़े नियमों में बदलाव से है। अब अगर कोई संगठन हड़ताल के नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे अवैध माना जाएगा। यूनियन की मान्यता भी रद्द हो सकती है। इतना ही नहीं, हड़ताल करने वाले कर्मचारियों को जेल या भारी जुर्माने का सामना भी करना पड़ सकता है। पहले जरूरी सेवाओं से जुड़े मजदूरों के लिए हड़ताल से पहले 14 दिन का नोटिस देना होता था, लेकिन अब 60 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है।
मजदूर संगठन कहते हैं कि हड़ताल मजदूरों का सबसे बड़ा हथियार होता है और अगर इसे कमजोर कर दिया जाएगा तो मालिकों की मनमानी और बढ़ जाएगी। क्या कहता है संविधान ? भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में मजदूरों, रोजगार, ट्रेड यूनियनों और श्रमिक कल्याण जैसे विषय समवर्ती सूचीमें आते हैं। इसका मतलब यह है कि इन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों के पास है। नए लेबर कोड पूरे देश पर लागू होंगे, लेकिन राज्यों को भी अपने-अपने नियम बनाने होंगे।
इसलिए इन नए कानूनों को लागू करने में राज्यों की भूमिका बहुत बड़ी होगी। भारत में कुल 50 करोड़ से ज्यादा कामगार हैं, जिनमें से लगभग 90 फीसदी असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। नए कोड इन सभी पर लागू होते हैं। मजदूर संगठनों का कहना है कि इस सुधार से मजदूरों के मौलिक अधिकार कमजोर हो जाएंगे, खासकर असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए यह बदलाव अधिक नुकसानदेह साबित हो सकता है।
पुराने 44 कानून बनाम नए चार कोड भारत में मजदूरों ने लंबे संघर्ष के बाद कुल 44 कानून बनवाए थे। इन कानूनों ने कर्मचारियों को कई अधिकार दिए थे-जैसे निर्धारित काम के घंटे, यूनियन बनाने का अधिकार, सामूहिक बातचीत और कामगारों की सुरक्षा के नियम जैसे प्रावधान शामिल थे। लेकिन नए कोड लागू होने के बाद मजदूर संगठनों का आरोप है कि 15 पुराने कानून खत्म कर दिए गए और जो बचे उन्हें मिलाकर ऐसा कानून बनाया गया है जो मजदूरों की जगह मालिकों के हित में ज्यादा दिखता है।
नए प्रावधान मालिकों के हित में रखे गए उनके मुताबिक नए नियमों से मजदूरों के अधिकारों में कटौती दिखाई देती है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, पहले किसी भी फैक्टरी में अगर 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे और मालिक उसे बंद करना चाहता था तो उसे सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती थी। नए कोड में यह संख्या बढ़ाकर 300 कर दी गई है। यानी अगर किसी फैक्टरी में 300 से कम लोग काम करते हैं तो मालिक बिना किसी सरकारी मंजूरी के उसे बंद कर सकता है। इसके बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि आज मशीनों की वजह से फैक्टरियों में कर्मचारियों की संख्या पहले से ही कम हो गई है। ऐसे में बड़े शहरों में जहां जमीन की कीमत बहुत ज्यादा है, वहां मालिक फैक्टरी बंद करके जमीन बेचकर भारी मुनाफा कमा सकते हैं। मजदूर संगठनों को डर है कि ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर मजदूरों की सुरक्षा कमजोर की जा रही है।
कांग्रेस ने क्या लगाए आरोप
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने नए लेबर कोड को मजदूर-विरोधी बताया है। उन्होंने कहा है कि यह सुधार मजदूरों की मूल मांगों को नजरअंदाज करता है। उन्होंने पूछा कि क्या सरकार मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाएगी, क्या मजदूरों को ‘राइट टू हेल्थ’ दिया जाएगा, क्या रोजगार की गारंटी दी जाएगी और क्या असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी? उनका कहना है कि सरकार को कर्नाटक और राजस्थान की तरह गिग वर्करों के लिए नए कानून बनाने चाहिए, जिन राज्यों ने मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए बेहतर कदम उठाए हैं।
कांग्रेस का कहना है कि सरकार को कर्नाटक और राजस्थान की तरह गिग वर्करों के लिए पक्के कानून बनाने चाहिए, जहाँ मजदूर अधिकारों को मजबूत किया गया है। मजदूरों और सरकार का टकराव जारी रहेगा नया लेबर कोड एक बड़ा बदलाव है, जिसे सरकार सुधार बता रही है। सरकार का कहना है कि इससे उद्योग बढ़ेगा, रोजगार आएगा और कर्मचारियों को भी नई सुविधाएँ मिलेंगी। लेकिन मजदूर संगठन इसे मालिकों के हित में उठाया गया कदम मानते हैं। उन्हें लगता है कि इससे नौकरी की सुरक्षा खत्म होगी, यूनियन कमजोर होंगी और मजदूरों की आवाज़ दब जाएगी। इतना तय है कि नया लेबर कोड भारत के मजदूरों, फैक्टरियों और रोजगार व्यवस्था पर बड़ा असर डालने वाला है।
नए लेबर कोड मज़दूरों को ग़ुलाम बना रहे हैं: अमरजीत कौर
नए लेबर कोड्स को लेकर मज़दूर संगठनों का विरोध तेज़ हो गया है। इस विशेष बातचीत में एआईटीयूसी की महासचिव अमरजीत कौर बता रही हैं कि ये क़ानून मज़दूरों के हित में हैं या उनके अधिकारों का हनन कर रहे हैं। पूरी बातचीत देखिए।




