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भारत में लोगों का पुलिस के ऊपर भरोसा इतना कम क्यों हैं,वर्दी की नहीं रही इज्जत!

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एक कैदी को ‘मुठभेड़’ में मार दिया जाता है. दूसरे को हिरासत में यातना दी जाती है. ठीक से जांच न होने के चलते पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता. इस सबके साथ भ्रष्टाचार, सबूतों से छेड़छाड़, जातिवाद, धमकियां, अवैध तरीके से निगरानी, ​​उत्पीड़न और दुर्व्यवहार की लगभग अंतहीन कहानी चलती रहती है, सो अलग.

भारत में जब भी पुलिस का जिक्र आता है, यही कुछ चीजें सुनने को मिलती हैं. आश्चर्य नहीं कि भारत में लोगों का पुलिस के ऊपर भरोसा इतना कम क्यों हैं.तमिलनाडु से लेकर केरल, महाराष्ट्र से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक पुलिसिया जुर्म की ऐसी दास्तानें भरी पड़ी हैं. यहां ज्यादतियां बस रूप बदलती हैं. इनके पीछे एक बड़ी वजह है पुलिस को मिला राजनीतिक संरक्षण या जुर्म करके बच निकलने की संस्कृति.

तमिलनाडु से लेकर केरल, महाराष्ट्र से लेकर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक पुलिस की ज्यादतियां कई रूप लेती हैं। जो चीज उन्हें एकजुट करती है वह दण्डमुक्ति की संस्कृति है।

न्यूज़लॉन्ड्री और द न्यूज़ मिनट उन राज्यों में इन ज्यादतियों की जांच करेंगे जो पुलिस की बर्बरता और अतिरेक के सबसे ज्यादा मामले रिपोर्ट करते हैं। हमारी टीम – बसंत कुमार, प्रतीक गोयल, मारिया टेरेसा राजू, अनीशा शेठ, जाह्नवी, हरिता मानव, कोरह अब्राहम, निदर्शना राजू और जिशा सूर्या – इस संस्कृति का सावधानीपूर्वक दस्तावेजीकरण करने और यह कैसे रोजमर्रा के भारतीयों को प्रभावित करती है, इसके लिए पूरे भारत में प्रचार करेगी।

सामान्यतः किसी अपराध के घटने में पुलिस को दोषी बताकर उसे कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। लेकिन क्या वाकई में सारा दोष अकेले पुलिस के सिर मढ़ दिया जाना उचित है ? क्या अपराधों के घटने में समाज और शासन का कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता ?इस प्रश्न के उत्तर की जड़ें दूर कहीं कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलती हैं, जहाँ राज्य के प्रारंभ और उसमें पुलिस के उद्भव एवं उसकी भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। हमारी आधुनिक पुलिस तो ब्रिटिश शासन के दौरान अस्तित्व में आई। उस दौरान अपने कानूनों को जनता से मनवाने के लिए पुलिस-व्यवस्था की गई थी। उस समय अपराधों की संख्या बहुत कम थी, और वे इतने संगीन भी नहीं थे। परंतु आज बढ़ते अपराधों के कारण हमारी जनता, खासतौर पर बच्चे और महिलाएं भयाक्रांत हैं। पुलिस का कर्तव्य है कि वह जनता को भयमुक्त करे। लेकिन हमारी बहुत सी सरकारें आज भी पुलिस का इस्तेमाल जनता की सुरक्षा से ज़्यादा अपने लाभ के लिए कर रही हैं।

  • पुलिस पर विश्वास क्यों नहीं ?

अगर हम पुलिस के कर्तव्यों की बात करें, तो सबसे पहले सवाल यह आता है कि आखिर एक आम आदमी पुलिस से क्या अपेक्षा रखता है, और क्या पुलिस उन अपेक्षाओं पर खरी उतर पाती है? अनेक सर्वेक्षणों में यह बात सामने आती है कि लोगों को संपत्ति से ज़्यादा अपने जीवन की रक्षा के लिए पुलिस-सहायता की आवश्यकता होती है। विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र और लोगों के जीवन की बढ़ती असुरक्षा को देखते हुए अन्य प्रजातांत्रिक   देशों की तुलना में भारत में पुलिस दल की संख्या में असाधारण वृद्धि की जा चुकी है। फिर भी यहाँ एक लाख लोगों के लिए 140 पुलिसकर्मी रहते हैं, जो कि अन्य प्रजातांत्रिक देशों की तुलना में बहुत ही खराब अनुपात है।

पुलिस की आलोचना सबसे ज़्यादा उसके महत्वपूर्ण व्यक्तियों की जी हजूरी और उनकी सुरक्षा में संलग्न रहने को लेकर की जाती है। इसे देखते हुए संवैधानिक प्रजातंत्र में दी जाने वाली समानता सिर्फ नाम की रह जाती है। यही कारण है कि देश में 10,000 से भी अधिक पुलिस थाने होते हुए भी लोग निजी सुरक्षा-व्यवस्था पर अधिक भरोसा करते है। ऐसी सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि पुलिस पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। भारत के लिए यह शर्मिंदगी वाली बात है। लेकिन ऐसा ही हो रहा है।

  • विदेशों की पुलिसव्यवस्था से सबक

पुलिस की क्षमता बढ़ाने के लिए अगर हम विदेशों में अपनाए गए साधनों को अपनाने के बारे में सोचें, तो शायद छवि बेहतर की जा सकती है। न्यूयार्क पुलिस ने लगभग एक दशक से काम्स्टेट (COMSTAT-COMPUTER STATISTIC) प्रोग्राम का सहारा लिया है। यह अपराध-प्रधान क्षेत्रों को पहचानकर उनकी सुरक्षा करने में मदद करता है। न्यूयार्क के पुलिस कमांडर को  हर हफ्ते अपने उपायुक्त को इस बात की जानकारी देनी होती है कि वह अपने क्षेत्र के अपराधों से कैसे निपट रहा है। इस प्रक्रिया से अपराध की जड़ तक पहुँचकर उसे कम करने में बहुत मदद मिली है। न्यूयार्क पुलिस ने एक निजी एजेंसी की सहायता से पुलिस के बारे में लोगों के दृष्टिकोण का भी सर्वे कराया है। प्रश्नावली बनाकर लोगों के पास उसे फोन पर भेजा गया है।

लंदन में अपराध बहुत बढ़ गए थे। इससे निपटने के लिए न्यूयार्क की तर्ज पर ‘रोको और जाँचो‘ वाला अभियान चलाया गया। यह जरूर है कि इस अभियान के लिए पुलिस दल की बड़ी संख्या लगती है, लेकिन यह प्रभावशाली है। हालांकि अमेरिका में इस अभियान की कड़ी आलोचना के बाद वहाँ की पुलिस ने इसमें थोड़ी ढील डाल दी थी। जनता की सुरक्षा के लिए कई बार पुलिस को इस प्रकार की आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। भारत की पुलिस में तो भ्रष्टाचार इतना अधिक व्याप्त है कि यहाँ पर इस प्रकार की योजनाओं को लागू करने से इसमें वृद्धि होने की ही संभावना अधिक है।

  • भारतीय पुलिस में परिवर्तन कैसे हो ?

भारत की जनता को सुरक्षित रखने और अपराध में कमी के लिए दो तरह से काम किया जा सकता है। (1) भारतीय पुलिस के युवा अधिकारियों का एक ऐसा दल तैयार किया जाए, जो जनता के बीच जाकर नए प्रयोग करने के लिए तैयार हों। ये अधिकारी सरकार के कम-से-कम खर्च पर जनता की सुरक्षा के तरीकों को अपग्रेड करने की कार्ययोजना तैयार करें। (2) पुलिस की कार्यवाही में इंटरनेट के प्रयोग को बढ़ाया जाए। दिन-प्रतिदिन की पुलिस व्यवस्था में सोशल मीडिया को जरिया बनाया जाए। ऐसा किया भी जा रहा है। लेकिन व्यापक स्तर पर करने की जरूरत है। अपराधों और अपराधियों की जानकारी को शहर के प्रमुख केंद्रों पर प्रचारित किया जाए। लोगों को ई-मेल या सोशल मीडिया के जरिए अपराध दर्ज कराने को पे्ररित किया जाए। इस क्षेत्र में प्रकाशन जगत और टेलीविजन जैसे माध्यम बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।भारतीय पुलिस के भीमकाय स्वरूप के बावजूद उस पर लगातार दबाव बनाए जाने की जरूरत है, जिससे वह अपनी मुस्तैदी को बरकरार रखे।

वर्दी की ‘इज्जत’ पग-पग पर नीलाम क्यों?

 बिहार से लेकर एमपी तक में पुलिस वालों पर हमले बढ़े हैं। वर्दी के प्रति लोगों के मन में अब न तो वो खौफ रहा है और न ही कथित रूप से वह इज्जत। चंद फीसदी वर्दी वालों को छोड़ दें तो अधिकांश के मन में अब दूसरी भावना रहती है। मध्य प्रदेश हो या देश का कोई अन्य प्रदेश… किसी भी थाना क्षेत्र में जाकर आप पीड़ितों से बात कर लीजिए। पुलिसवालों के प्रति उनके बारे में क्या ख्याल आते हैं। थानों में पदस्थ अधिकांश पदाधिकारी वर्दी को चंद रुपए के लिए ‘गिरवी’ रख देते हैं। एमपी के मऊगंज में घटी घटना भी उसकी बानगी कह सकते हैं। पुलिस आदिवासियों का भरोसा नहीं जीत पाई।मध्य प्रदेश में खाकी पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। पुलिस विश्वास खोती जा रही है और न्याय की आस में लोग आपा खो रहे हैं। मऊगंज की घटना उसी की बानगी है। आइए आपको समझाते हैं कि वर्दी की इज्जत क्यों घट रही है। वहीं, सुलगते सवालों से एमपी के डीजीपी कैलाश मकवाना मुंह मोड़ रहे हैं।


मऊगंज में एएसआई रामचरण गौतम की हत्या कर दी है। उनका आरोप था कि गांव के जिस युवक की मौत को पुलिस सड़क हादसा बता रही है, उनकी हत्या हुई है। पुलिस ने सही से जांच नहीं की। पुलिस ने अपनी जांच में इसे सड़क हादसा ही बताया था। मगर इस बात का भरोसा मृतक के परिवार वालों को नहीं दिलवा पाई। इसके बाद आदिवासियों ने ब्राह्मण युवक को कैद कर पिटाई शुरू कर दी। पुलिस बने पहुंची तो गांव के लोगों ने उन पर हमला कर दिया। इसमें एएसआई की मौत हो गई।

वर्दी की नहीं रही वो इज्जत!

पुलिस लोगों की सेवा के लिए है। हमारी आपकी सुरक्षा के लिए है। तमाम मुश्किल परिस्थितियों में वह हमारे लिए खड़ी रहती है। मगर थानों की स्थिति अब बदतर होती जा रही है। फरियादी अगर अपनी फरियाद लेकर पहुंचते हैं तो पुलिसवालों की प्राथमिकता होती है कि पहले यह देखा जाए कि जेब कितनी मोटी है। फिर जिस पार्टी के खिलाफ शिकायत है, उसकी हैसियत कितनी है। इस हिसाब से कथित रूप से थानों में डील के लिए तैनात दलालों का रैकेट एक्टिव हो जाता है। फिर रुपए दीजिए और सारी चीजें मैनेज होने लगती हैं। इसका जीता जागता उदाहरण भोपाल में सामने आया है।
नाम काटने के लिए थाना प्रभारी ले रहे थे 25 लाख की राशि

पुलिस में रिश्वतखोरी का बड़ा मामला हाल ही में भोपाल में सामने आया है। एक थाने के थाना प्रभारी ने कॉल सेंटर पर छापेमारी की थी। छापेमारी के बाद कई लोगों के नाम सामने आया है। ऐसे में पुलिस के पास डील का ऑफर आया है। थानेदार ने इस ऑफर को सहस्त्र स्वीकार किया और 25 लाख रुपए में डील फाइनल हो गई। डील करवाने वालों में एक बीजेपी का नेता था, जिसे पार्टी ने अब निकाल दिया है। मामले का खुलासा हुआ तो थानेदार, एक एएसआई और चार पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज हुआ।
टीआई ने मार ली गोली

ऐसा ही मामला एक छतरपुर में आया है। वर्दी पहनते वक्त संविधान की शपथ लेने वाले टीआई अरविंद कुजूर खुद ही ब्लैकमेलिंग में फंस गए। एक 21 साल की युवती से परेशान होकर टीआई ने खुदकुशी कर ली है। टीआई ने दोस्ती के बाद उसे कई महंगे तोहफे दिलाए। कथित रूप से आरोप है कि टीआई को एक साल में उतनी सैलरी नहीं मिलेगी, जितने के गिफ्ट वह युवती को दिए। अब चर्चा है कि आखिर वो रुपए उनके पास आए कैसे। जिले में कई तरह की चर्चाएं हैं लेकिन जांच कौन करेगा।


इंदौर में दौड़ा-दौड़ाकर पीटा

आए दिन प्रदेश के किसी न किसी जिले से रिश्वत के साथ पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी की खबरें भी आती हैं। हालांकि ये बहुत छोटी मछलियां होती हैं। इंदौर पुलिस की बेबसी भी कुछ दिन पहले देखने को मिली थी। कुछ अपराधी कार में बैठाकर एक एएसआई को पीट रहे थे। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस की काफी फजीहत हुई। बाद में गुंडों पर कार्रवाई की गई।

Ramswaroop Mantri

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