सुसंस्कृति परिहार
आसाराम, राम-रहीम बाबा के जेल में जाने के बावजूद बाबाओं का तिलिस्म जिस तेजी से बढ़ रहा है वह आश्चर्यचकित करने वाला है। आज जब पढ़ें लिखे युवा बाबाओं के पास पहुंचकर अर्जी लगाते हैं या कर्मचारी स्थानांतरण की मांग करते हैं तो अफसोस होता है कि पढ़ने लिखने में ज़रुर कोई कसर रह गई।बीते 60साल में जितना प्रचार प्रसार अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ किया गया उसका असर जिन पर पड़ा है वे आज सनातन धर्म विरोधी माने जाते हैं।अंध श्रद्धा निर्मूलन अभियान के संस्थापक डा नरेन्द्र दाभोलकर को अंधश्रद्धा में डूबे व्यक्ति ने सरेआम मार डाला था।वे सनातनी हिन्दू थे। इससे पूर्व महात्मा गांधी को जो अंधविश्वास और रुढ़िवादी विचारों के खिलाफ थे सच्चे रामभक्त थे आज़ादी के नायक थे, सद्भभाव के प्रतीक थे उन्हें सनातनी नाथूराम ने मार डाला। इसका मतलब ये हुआ कि सनातन धर्म में पाखंडियों और अंधश्रद्धा रखने वालों का विरोध करने वाला हिन्दू नहीं या आज की भाषा में कहें तो सच्चा राष्ट्रभक्त नहीं है।तो क्या इन बाबाओं पर श्रद्धा रखना ही राष्ट्र भक्ति है उनके चमत्कार पर ताली बजाकर उनकी भक्ति में लीन होना ही सनातन धर्म है दूसरे शब्दों में कहें तो आज बाबाओं का अंधानुकरण ही राष्ट्रवादिता का परिचायक है।
लगता है यही हाल रहा और बाबाओं का जादू यूं ही चलता रहा तो सती प्रथा, बाल-विवाह भी एक दिन मान्य हो जायेंगे। विधवा विवाहों को बंद कर दिया जाएगा।लड़की का पढ़ना लिखना मुश्किल होगा।धर्म और जातपात के बन्धन में हम फिर जकड़ दिए जायेंगे।वही हिंदुत्व की पहचान होगी।तब लव-जिहाद के खिलाफ आग तेजतर होने लगेगी ।ऊपरी तौर पर ऐसा ही समझ में आता है पर ऐसा आज के प्रगतिशील दौर में संभव नहीं हो सकता ये बात वे भी जानते हैं तो क्या है हिंदुत्व के बहाने उनका लक्ष्य।
आपने कभी इस बात पर गौर किया कि बाबा चुनाव काल में ही क्यों मुखर हो जाते हैं। हिंदू मुस्लिम होने लगता है 2014 के आम चुनाव में बाबा रामदेव ने योगासनों के जरिए लोगों को जाल में फंसाया फिर वोट भाजपा को दिलवाई।तब जाके वे आज बाबा से कुशल व्यापारी बने। आज फिर हिंदू राष्ट्र निर्माण की बात क्यों बाबा कर रहे हैं वह भी बेखौफ होकर। वहीं अखंड भारत का सपना धूर्त बाबाओं द्वारा दिखाया जाने लगा है यह उनकी चालाक नियत को दर्शाता है। वे जानते कि इन बातों का असर कमजोर हिंदू खासकर बहुजन समाज पर पड़ता है। सदियों से जिन्होंने राजाओं और उनके कारिंदो का दंश सहा है आज भी वे समाज में प्रताड़ित हैं, परेशान हैं क्योंकि वे बाबाओं के भ्रमजाल में शीघ्र ही फंस जाते हैं उन्हें जब शासन से वह सब प्राप्त नहीं होता जिसकी उन्हें दरकार है तो वे तथाकथित भगवानों के चरण वंदन में लग जाते हैं। सरकार के खिलाफ मोर्चा नहीं खोलते। पीड़ित महिलाओं की तादाद इनमें सर्वाधिक होती है।अब तो बेरोजगार लोग भी इन दरबारों में बड़ी संख्या में रोजगार मांगने जाने लगे हैं।
बाबाओं के पीछे कौन सी ताकत काम कर रही है इसका खुलासा बराबर जब तब हो जाता है यदि इसकी पड़ताल करें तो पाते हैं इसके पीछे संघ पोषित एक पूरा चैनल सक्रिय हैं जो भारत को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने एक और,अंतिम बार इसी मुद्दे पर चुनाव जीतना चाहते हैं। अगर देखें तो आज तो सोशल मीडिया में इसके लिए पहलकदमी करने वाले लोग भी जिम्मेदार है जिसके ज़रिए इन बाबाओं के झूठे करिश्माई किस्से जन जन तक पहुंच रहे हैं। दूसरे इसमें राजनैतिक लोगों का बड़ी तादाद में जाना लोगों को आकृष्ट करता है। प्रशासनिक अधिकारी भी इसमें धड़ल्ले से जाते हैं, फिल्मी कलाकार, पत्रकार भी स्वयं जब इनका यश गाएं तो समाज पर इसका असर तो होना ही है हालांकि राजनीति में आदिकाल से बाबाओं का हस्तक्षेप रहा किन्तु आज की राजनीति का जो घृणित स्वरुप नज़र आ रहा है वह दुखदाई है। अब तो चुनाव आयोग को धता बताते हुए एक बाबाजी मुख्यमंत्री बनाने के काम लग गए हैं ये बात वे खुलकर कहने भी लगे हैं तथा मोदीजी के साथ भी बाबाजी के नकली वीडियो प्रदर्शित कर रहे हैं जिसका कहीं विरोध दिखाई नहीं देता मतलब साफ है। वहीं तथाकथित साध्वियां भी भी चाकू छुरी तेज रखने और सनातन के विरोध में बोलने वालों को मार देने की बात कहने लगी है ये सब दर्शाता है कि इन्हें वर्तमान सरकार का पूरा संरक्षण मिला हुआ है।
यकीनन बाबाओं की आई बाढ़ के पीछे तथाकथित हिन्दू हित वाली राष्ट्रवादी सरकार और उसके रिमोट संघ का हाथ है।उसे मालूम है देश इस वक्त जिस बुरी हालत में पहुंच चुका है सरकार घोटालों में फंसी हुई है जीत मुश्किल है इसलिए बहुजन वर्ग को साधने बाबाओं का प्रयोग ही कारगर होगा।वजह साफ़ है आज भी बाबाओं के चमत्कारों में उनकी अटूट श्रद्धा वे उनकी तिरछी भृकुटी से खौफ खाते हैं इसी डर से वे चुपचाप उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। राहुल गांधी ने सही कहा था कि डरे लोग कभी बदलाव नहीं ला सकते।
वस्तुत:देखा जाए तो ये बढ़ता बाबावाद हमारी सरकार का पुख्ता वोट बैंक है। लगता है बाबाओं का बढ़ता साम्राज्य एक दिन गौतम अडानी पर भी भारी पड़ सकता है।बाबा रामदेव जैसे कई कारोबारी बाबा निरंतर उभर रहे हैं जो विश्व के सेठियों की सूची में शामिल होने बेताब हैं। संघ और भाजपा सरकार अपने इन दत्तक बाबाओं को पूरा प्रशय दिए हुए है वरना संविधान विरोधी हिंदू राष्ट्र की बात करने वाले को देशद्रोही करार देकर जेल भेज दिया जाता।याद रखिए अडानी की तरह ही एक दिन इन तथाकथित पाखंडियों के मेल जोल की पोल कोई विदेशी मीडिया संस्थान ही खोलेगा क्योंकि यहां तो सर्वत्र दहशतज़दा माहौल है। सबसे अहम सवाल यह भी है कि इनके बढ़ते साम्राज्य और अरबों की कमाई का कोई हिसाब सरकार नहीं लेती ना ही ईडी सीबीआई अधिकारी यहां पहुंचते हैं ये तो पी एम केयर फंड की तरह की खेती है जिसमें कोई जवाब तलब नहीं हो सकता।
बहरहाल चिंतन का विषय यह है कि हमारे धर्म से पाखंड और अंधविश्वास को निकालने हम कब तैयार होंगे।पोंगापंथियों के सहारे सनातनधर्म को छोड़ना ख़तरे से खाली नहीं।एक योगी बाबा किस तरह सत्ता पर बैठकर कहर ढा रहा है कि मां बेटी को ज़िंदा जला दिया। एक और बुलडोजर बाबा और सामने आ चुके हैं।
अहम बात यह है कि पिछड़ा वर्ग जो बहुजन है ये कब समझेगा कि देश में हर पाखंड में उसने बढ़ चढ़ कर हमेशा हिस्सा लिया है उसे अब तक क्या सिला मिला? जो मिला है वह उसे हमारे संविधान ने दिया है लोग मज़ाक में कहते हैं कि लक्ष्मी पूजा हम करते हैं और सर्वाधिक लक्ष्मी अमेरिका में हैं आखिरकार क्यों? इन बातों पर यदि सोचा जाए तो देश को बाबावाद और उससे पैदा होने वाले कथित राष्ट्रवाद से मुक्ति मिल सकती है। बाबाओं के इस भूत को जनता के बीच से उतारकर ही देश को विकासवान बनाया जा सकता है इसके लिए जरुरी है लोग अपने आत्म बल को बढ़ाएं गलत को ग़लत कहें और एकजुट होकर उसका प्रतिरोध करने वालों का साथ दें निडर बने।




