डॉ. विकास मानव
हमारे शरीर में जो मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी)है वह छोटे-छोटे हड्डी के टुकड़ों से जोड़कर बना है।
यह बीच में खाली है और इस खाली जगह में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाम की तीन नाड़ियां आपस में लिपटी हुई रहती हैं।
मस्तिष्क में शरीर के प्रत्येक भाग को नियंत्रित करने के लिए नाड़ियों का जाल इसी मेरुदण्ड से होकर, कई स्थानों पर निकलकर शरीर के विभिन्न भागों में फैल जाता है। शरीर में छोटी-बड़ी कुल बहत्तर हजार नाड़ियां हैं जिनका नियंत्रण-केंद्र मस्तिष्क में होता है। मेरुदण्ड के जिस-जिस स्थान से नाड़ियां निकलकर बाहर शरीर में फैलती हैं, वहां नाड़ी-गुच्छ बने हुए हैं वही ‘चक्र’ कहलाते हैं।
मेरुदण्ड नीचे जहां समाप्त होता है वहां पर ये तीनों मुख्य नाड़ियां इडा, पिंगला और सुषुम्ना सर्प की तरह कुंडली बनाए हुए हैं। ज्योंकि इनका सिरा या सर्प का फन नीचे की ओर रहता है, इसलिए यह कहा जाता कि कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई है।
इसे ही साधना से जगाया जाता है। जागते ही यह फन जैसा सिरा ऊपर की ओर उठता है। तब कुण्डलिनी जागृत होना कही जाती है।
यहां से बारह नाड़ियां ऊपर की ओर और 12 नाड़ियां नीचे की ओर गयी हैं। गांधारी नाड़ी बायीं आंख में, हस्तजिह्वा दायीं आँख में, यशस्विनी बाएं कान में, पूषा दाहिने कान में, अलम्बुषा मुख में, कुहू लिंग में, शंखिनी गुदा स्थान में रहती है।
वैसे तो सभी नाड़ियां प्राण पर आश्रित हैं, लेकिन इडा, पिंगला और सुषुम्ना तो प्राण-मार्ग पर ही स्थित हैं। प्राण 10 हैं जिनमें पांच मुख्य प्राण हैं प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान तथा पांच उपप्राण हैं–नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय।
हृदय में जो वायु रहती है, उसे ‘प्राण’ वायु कहते हैं। गुदा स्थान में जो वायु रहती है, उसे ‘अपान’ वायु कहते हैं। ‘व्यान’ वायु सम्पूर्ण शरीर में फैला हुआ है। उपप्राण में ‘नाग’ वायु डकार के साथ निकलता है। ‘कृकल’ वायु के सहयोग से छींक आती है। जंभाई का कारण ‘देवदत्त’ नामक वायु है। प्राणों में सर्वश्रेष्ठ वायु ‘धनंजय’ जो आत्मा का वाहक है, सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है। यह शरीर के मृत रहने पर भी शरीर में काफी समय तक रहता है।
मृत्योपरांत दाह-क्रिया के समय जब मृतक की कपाल क्रिया की जाती है जिसमें दाह-संस्कार करने वाला व्यक्ति मृतक के कपाल में जब बांस मारकर उसे फोड़ता है तो धनंजय प्राण ब्रह्मरंध्र से बाहर निकल कर आत्मा से संयुक्त हो जाता है।
अगर दुर्भाग्यवश किसी मृतक की कपाल-क्रिया नहीं की गई है या ठीक से नहीं की गई है तो धनंजय प्राण आत्मा से संयुक्त नहीं हो पाता है। परिणामस्वरूप धनंजय प्राण के अभाव में मृतक की आत्मा को अनंत काल तक सर्प योनि में, नागलोक में रहना पड़ता है।
पंचतत्वों में आकाश तत्व। पांचवें चक्र ‘विशुद्ध चक्र’ में स्थित है। इसका स्थान कण्ठ है। यह चक्र जनः लोक(आत्म लोक) का प्रतिनिधि है। इसका बीज है- ‘हं’। अकाश तत्व का रंग हल्का नीला है और आकृति अंडे की तरह लम्बी-गोल है। ‘शब्द’ इसका गुण है, ज्ञानेन्द्रिय इसकी “कान” है और कर्मेन्द्रिय है “मुख”।
इडा नाड़ी में चंद्रमा का वास है और पिंगला में सूर्य का। सुषुम्ना में हँसरूप शिव वास करते हैं। बायीं ओर वाली इडा नाड़ी अमृतस्वरूप होने के कारण संसार और शरीर को पुष्ट करने वाली होती है। यह सभी शुभ कार्यों में सिद्धि देने वाली नाड़ी है।
दक्षिण भाग में रहने वाली पिंगला नाड़ी संसार और शरीर की उत्पत्ति करने वाली मानी गयी है। सुषुम्ना नाड़ी जो मध्य में है, संहार करने वाली कही गयी है। चन्द्रनाड़ी को स्त्री नाड़ी और सूर्य नाड़ी को पुरुष नाड़ी माना गया है। चन्द्र नाड़ी का रंग सफेद और सूर्य नाड़ी का रंग काला है।





