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समाजवादी योद्धा मधु लिमये के जन्मशताब्दी समारोह में भागीदारी जरूरी क्यों ?

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डॉ सुनीलम*
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गोवा मुक्ति आंदोलन के सिपाही, पुणे से बांका ( बिहार ) जाकर चुनाव जीतने की ताकत रखने वाले, 128 किताबों के रचनाकार प्रख्यात संसद विद् मधु लिमये जी का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। इसे मनाने की पहल समाजवादी समागम ने की है। जिसके तहत दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में 30 अप्रैल को तथा पटना के ए एन सिन्हा इंस्टीट्यूट में जन्मदिवस 1 मई 22 पर कार्यक्रम आयोजित करने का निर्णय लिया है। इस अवसर पर मधु लिमये जी के जीवन और विचार को लेकर एक स्मारिका प्रकाशित की जाएगी। स्मारिका का संपादन प्रो. आनंद कुमार करेंगे। वर्ष भर चलने वाले जन्मशताब्दी कार्यक्रमों हेतु एक फोटो प्रदर्शनी तैयार करने का भी विचार बना है। देशभर के कार्यक्रमों का संयोजन करने के लिए मधु लिमये जी के निकटस्थ रहे प्रो. राजकुमार जैन को जन्म शताब्दी समारोह का संयोजक बनाया गया है तथा मुझे सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
इस वर्ष मधु जी को लेकर विभिन्न प्रदेशों और जिलों में समाजवादियों द्वारा विचार गोष्ठीयां आयोजित की जाएं यह प्रयास किया जा रहा है।
मधु लिमये जी की स्मृति में गत 27 वर्षों से उनके निकटस्थ सहयोगी पूर्व सांसद राजनीति प्रसाद जी द्वारा हर वर्ष पटना में दो कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। इस वर्ष भी होगा।
मधु लिमये जी की अंग्रेजी की 4 किताबों का मराठी में अनुवाद मुंबई में मधु जी के बेटे अनिरूद्ध लिमये और समाजवादी साथियों द्वारा मिलकर किया जा रहा है। इस वर्ष 3 – 4 किताबों के प्रकाशित होने की संभावना है। आई टी एम विश्वविद्यालय के पूर्व चांसलर रमा शंकर सिंह जी मधु जी पर गोवा से जुड़ी कई किताबें प्रकाशित कर चुके है। इस वर्ष अन्य किताबें प्रकाशित करने वाले हैं।
पुणे (महाराष्ट्र), बाराबंकी ( उत्तर प्रदेश ) और बिहार के कई जिलों में भी समाजवादी साथियों के द्वारा कार्यक्रम मनाएं जाने की सूचना है। देश में जो भी साथी स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्यों एवं संवैधानिक मूल्यों में भरोसा रखते हैं उन्हें मधु लिमये जी की जन्म शताब्दी को मनाने के लिए उनके लेखों और किताबों को लेकर जगह-जगह पर विचार गोष्ठी आयोजित करनी चाहिए यह निवेदन समारोह समिति द्वारा किया जा रहा है।
समाजवादी आंदोलन में मधु लिमये जी ऐसे समाजवादी चिंतक रहे हैं जिन्होंने समसामयिक चुनौतियों पर अपने जीवन काल में लगातार लिखा है। मधु लिमये जी ने स्वतंत्रता आंदोलन, गोवा मुक्ति आंदोलन, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी और जनता दल को लेकर जितना कुछ अपनी भागीदारी पर लिखा है उतना पूरे समाजवादी आंदोलन के किसी भी दूसरे समाजवादी चिंतक ने नहीं लिखा। यह सब लिखने का कार्य वे इसलिए भी कर पाए कि उन्होंने जनता पार्टी के बिखराव के बाद खुद को सक्रिय राजनीति से अलग कर लिया था ।
मुझे याद है कि प्रो. विनोद प्रसाद सिंह जी के साथ जब भी दिल्ली के पंडारा रोड स्थित मधु लिमये जी के निवास पर जाता था तथा जब भी उनसे समाजवादी आंदोलन को मजबूती देने के लिए, राजनीति में सक्रिय होने के लिए कहता था, तब वे कहा करते थे कि विनोद प्रसाद सिंह, मोहन सिंह, बृजभूषण तिवारी, राजकुमार जैन, रघु ठाकुर जैसे 99 समाजवादीयों के नाम ले आओ, तब मेरा नाम भी जोड़ लेना, मैं भी सक्रिय हो जाऊंगा। यह उनके जीवन काल में सम्भव नहीं हो सका। जब हमारे जैसे युवा उन्हें ज्यादा परेशान करते थे तब वे कहते थे कि जिस तरह से मैंने जीवन जिया है, उसी तरह से मरना चाहता हूं।
मधु लिमये जी के यह कहने पर कि इतिहास में कभी पूर्ण विराम नहीं होता लेकिन यदि इतिहास में अपना नाम दर्ज कराना चाहते हो तो, समाजवादी आंदोलन का इतिहास लिखो।
मेरे राजनीतिक गुरु प्रो. विनोद प्रसाद सिंह के साथ मैंने
समाजवादी आंदोलन के अप्रकाशित दस्तावेजों के 2 संकलन स्वयं प्रकाशित किये। ‘एवोल्यूशन ऑफ सोशलिस्ट पालिसी इन इंडिया’ नामक एक किताब अंग्रेजी में सोशलिस्ट इंटरनेशनल की दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित कौंसिल की बैठक के अवसर पर सुरेंद्र मोहन जी और तीन मूर्ति म्युज़ियम और लाइब्रेरी के डिप्टी डायरेक्टर हरिदेव शर्मा के साथ मिलकर जनता दल की मदद से प्रकाशित की थी।
मुझे मुलताई पुलिस गोलीचालन के फर्जी मुकदमों में आजीवन कारावास की सजा हो जाने के बाद प्रो. विनोद प्रसाद जी के असामयिक निधन हो जाने के कारण उनके द्वारा दो और किताबों की पांडुलिपि तैयार कर दिए जाने के बावजूद प्रकाशित नहीं की जा सकी।
मधु लिमये जी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उनकी याददाश्त बेमिसाल थी।
उन्हें अपने जीवन के हर पल
में घटित सब कुछ जस का तस याद रहता था।
इसका प्रमाण मधु लिमये जी की भारतीय प्रकाशन संस्थान द्वारा
प्रकाशित 506 पेज की आत्मकथा है, जो उन्होंने 26 जून 1975 को तत्कालीन मध्य प्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के महासमुंद जिले में गिरफ्तार होने के बाद नरसिंहगढ़ जिले की जेल में लिखी थी। जेल में हर दिन वे 2 घंटे लिखा करते थे। उन्होंने इस आत्मकथा में केवल 15 अगस्त 1947 तक का जिक्र किया है। मधु जी के शब्दों में 15 अगस्त 1947 को युग परिवर्तन हुआ था, उनकी पीढ़ी के एक ध्येय की पूर्ति हुई थी। वे इसे आंदोलनों का स्वर्ण कहते थे। 1947 से 1964 तक समाजवादी दल के विस्तार, पार्टी की उथल-पुथल, गोवा मुक्ति संग्राम, संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन को वे दूसरा तथा 1964 के बाद का तीसरा खंड मानते थे, जब उन्होंने लोकसभा में पहुंचकर देश और दुनिया में ख्याति प्राप्त की थी ।
मधु लिमये जी ने आत्मकथा को तीन खंडों में लिखने की योजना बनाई थी। पहला खंड 24 दिसंबर 1994 के दिन पूरा हुआ था। मधु लिमये जी इसका अंग्रेजी अनुवाद स्वयं कर रहे थे तथा द्वितीय खंड के कागजात जुटा रहे थे लेकिन उसी बीच 8 जनवरी 1995 को अल्पकालीन बीमारी के बाद उनका अचानक निधन हो गया।
चंपा लिमये जी, जो मधु लिमए जी की जीवनसंगिनी (पत्नी) थी, ने ही प्रथम खंड का सारा मजनून लिपिकार के तौर पर लिखने का काम पूरा किया था। चंपा जी बार-बार यह कहती थी कि दूसरा खंड भी आप मुझे लिखाइए लेकिन मधु जी परफेक्शनिस्ट थे। वे कहते थे कि जब तक पहला खंड मन मुताबिक तैयार नहीं होगा, तब तक दूसरा और तीसरा खंड तैयार नहीं करूंगा।
चंपा जी के अनुसार मधु जी को लिखने के लिए प्रो. केलावाला ने युवा अवस्था में प्रेरित किया था। ‘ग्रीक संस्कृति का यूरोपीय संस्कृति पर प्रभाव’ विषय पर अंग्रेजी में विस्तृत निबंध लिखने का सफल प्रयोग होने के बाद प्रो. केलावाला ने ‘1935 के संविधान का कानून’ पर दूसरा पेपर लिखने का निर्देश दिया था, इसी क्रम में मधु जी की मुलाकात कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेता एसएम जोशी से हुई। जिनके त्यागमयी जीवन ने मधु जी के पूरे जीवन को परिवर्तित कर दिया। बाद में धूलिया की जेल में 1940 – 41 में उनकी साने गुरुजी से भेंट हुई। चंपा जी के शब्दों में महाराष्ट्र के इन दो वरिष्ठ नेताओं ने मधु जी पर माता के प्यार की जो वर्षा की, उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती।
मधु जी की आत्मकथा का अनुवाद श्रीमती सुलभा कोरे ने हिंदी में किया है। आत्मकथा में बचपन, प्राथमिक शिक्षा, समाजवादी परिधि में प्रवेश, महाराष्ट्र में कांग्रेस के नेतृत्व का दर्शन, वामपंथी आंदोलन,
सक्रिय राजनीति में प्रवेश, खानदेश और युद्ध विरोधी मुहिम, जेल की जिंदगी, साने गुरुजी के साथ परिचय, भारत छोड़ो आंदोलन, अगस्त क्रांति और भूमिगत आंदोलन, क्रांतिकारी मासिक का प्रकाशन, वर्ली -यरवड़ा-बिसापुर जेल यात्रा, महा युद्ध की समाप्ति और मेरी रिहाई, चुनाव में प्रचार कार्य, 1946 के राजनीतिक परिवर्तन, कोलकाता का एटक सम्मेलन और समाजवादी पार्टी का कानपुर सम्मेलन, विट्ठल मंदिर प्रवेश पर साने गुरुजी का अनशन, उंबरगांव शिविर,
आजादी तथा बंटवारे का दर्द को लेकर विस्तृत तौर पर लिखा है।
देश के विभाजन को लेकर मधु जी ने लिखा है कि 14 – 15 अगस्त की आधी रात को भारत की संविधान सभा की बैठक में स्वतंत्रता संग्राम दिवस मनाया गया तथा मुझे और मेरे युवा सहयोगियों को यह देश विभाजन का निर्णय दिल के दो टुकड़े करने जैसा लगा। उन्होंने लिखा है कि 15 अगस्त को पुणे में स्वतंत्रता उत्सव मनाया जा रहा था, उस भीड़ का अंग होने के बावजूद मैं उस भीड़ में पूरी तरह से एक नहीं हो पाया। आखिर आजादी मिली। कितने सालों का अथक परिश्रम का फल हाथ में तो आया लेकिन देश के विभाजन और दंगों से उस फल के मिलने के कारण हुई खुशी पर घड़ों पानी फिर गया था।
मधु जी की इस आत्मकथा को पढ़कर यह जाना जा सकता है
कि वे प्राथमिक शाला से लेकर देश के विभाजन तक किस-किस से कब कब मिले, मिलते समय वे क्या सोच रहे थे, क्या कह रहे थे तथा क्या कर रहे थे। हर बैठक में हुई चर्चा का सारांश भी तथा बहस का एक-एक वाक्य उन्हें जस का तस याद रहा। कौन से दोस्तों के साथ किस दिन आंदोलन किया, किस दिन फिल्म देखी, किस दोस्त का मूड किस दिन कैसा था आदि का ब्योरा तो आत्मकथा में मिलता ही है, साथ ही जिन स्थानों पर वे गए, उन स्थानों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का उल्लेख भी वे करते हैं।
इससे समाजवादी आंदोलन के महानायक मधु लिमये जी की सम्वेदनशीलता, राष्ट्रवादी चिंतन, आज़ादी के आंदोलन के लिए समर्पण, अंतरराष्ट्रीय मामलों पर उनकी समझ, त्यागमयी और संघर्षमयी जीवन का पता चलता है।
मधु लिमये जी के जीवन में गांधी जी की तरह सादगी, दृढ़ निश्चय, ईमानदारी, विश्वसनीयता के सारे गुण थे। गांधीवाद के माध्यम से समाजवाद लाया जाए ऐसी उनकी आंतरिक इच्छा थी। मधु जी पर गांधी जी का गहरा असर था। वे कहते थे गांधी जी के कारण मेरी जीवन दृष्टि उजली हो गई, उन्होंने मेरी जीवन दृष्टि तथा चिंतन को काफी प्रभावित किया। पुलिस लाठी चला रही है लोग शांति से लाठी सह रहे है। यह दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था। गांधीजी के कारण ही वे दहशतवादी लोगों की तरफ आकृष्ट नहीं हुए। शरीर से अत्यंत दुबले दिखने वाले इस बूढ़े ने 1946 – 47 में अकेले नोआखली (बिहार) में दंगों की आग बुझाने की कोशिश की। गांधीजी के समान मधु जी डॉ अंबेडकर के प्रति आदर का भाव रखते थे। वे कहते थे भारत का निर्माण गांधी और अंबेडकर दोनों के विचार समन्वय से होगा।
डॉ.अंबेडकर एक किताब में मधु जी ने अंबेडकर तथा गांधी जी की अस्पृश्यता का सुक्ष्म विश्लेषण किया है। मधु जी कहते थे कि दोनों में अस्पृश्यता निवारण की प्रबल इच्छा थी इसके बावजूद दोनों एक दूसरे का सहयोग नहीं कर सके। कारण खोजने पर पता चलता है कि जन्म से आई हुई भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि ही इसका कारण थी। एक जन्म मृत्यु के चक्र में विश्वास रखने वाला, दूसरा उस पर विश्वास ना करने वाला था। अस्पृश्यता पाप है लेकिन जाति व्यवस्था समाज के लिए अनुपयुक्त, ऐसी गांधी जी की विचारधारा थी परंतु वे अस्पृश्यता और जाति के बीच फर्क करने को तैयार नहीं थे। दोनों बातें परस्पर आश्रित हैं और एक को नष्ट किए दूसरे का नष्ट होना संभव नहीं है। यही उनकी विचारधारा थी। जाति व्यवस्था और उच्च वर्णियों का शासन उनकी नज़र में महाभयंकर शैतान थे।
जाति व्यवस्था के कारण ही समय-समय पर भारत को विदेशी आक्रामकों के सामने शिकस्त खानी पड़ी। वे दलितों को ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद से मुक्त कराना चाहते थे। अंबेडकर मानते थे कि धर्म गुरुओं ने कभी भी जाति और अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। सब मानव समान है यह ना कह कर भगवान के सामने सब समान है ऐसा उन्होंने कहा। वे कभी सामाजिक अश्पृश्यता के खिलाफ खड़े नहीं हुए। डॉ अंबेडकर के अनुसार जाति व्यवस्था खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका अंतरजातीय विवाह है।
मधु जी दलितों के बारे में कहते थे कि उन पर सदियों से अन्याय हुआ है। उसका निराकरण 60% आरक्षण से करना चाहिए। मधु जी, डॉ लोहिया की तरह ही अपने विचारों को लागू करवाने के लिए संघर्ष करते रहे। मधु जी ने जो कहा वही किया। चौथी लोकसभा में मधु जी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे।
डॉ लोहिया जी की मृत्यु के बाद उन्होंने अपने नेता पद से इस्तीफा देकर कहा कि 60 फीसदी पिछड़ों में से श्री रवि राय जी को संसदीय बोर्ड का नेतृत्व दिया जाए। वास्तव में 60 फीसदी प्रतिनिधित्व देने की शर्त पूरी करने के लिए ही उन्होंने पिछड़ी जाति के रवि राय जी को संसदीय ग्रुप का नेतृत्व सौंपा।
साम्यवादियों के बारे में भी मधु जी ने काफी लिखा। 1951 में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी फैक्ट एंड फिक्शन नाम की किताब लिखी थी। जिसकी सराहना करते हुए जे पी ने कहा था कि यह किताब सोशलिस्टों के लिए टेक्सबुक होनी चाहिए।
1942, भारत पर चीन के हमले, आपातकाल, सुभाष चंद्र बोस और ज्योति बसु के मूल्यांकन आदि प्रश्नों पर उन्होंने कड़ी टिप्पणियां की।
वे बार-बार कहते थे कि 1952 के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में चुनकर आई थी लेकिन आज सभी जगह उसकी स्थिति अंधकारमय हो गई है। वे कहते थे वामपंथी इकट्ठा नहीं हुए तो समाजवादी लोकतंत्र का भारत में कोई स्थान नहीं रहेगा।
मधु लिमये जी ने सोशलिस्ट कम्युनिस्ट इंटरेक्शन इन इंडिया नामक अपनी किताब में कम्युनिस्ट और समाजवादियों के पारस्परिक संबंधों की आजादी से लेकर अपनी किताब लिखे जाने तक की विस्तृत समीक्षा की है।
जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि कम्युनिस्टों और सोशलिस्ट ने एक जगह आकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाले दशकों में समाजवादी लोकतंत्र को कोई अवसर भारत में नहीं मिलेगा। वे समाजवाद की नई व्याख्या के पक्षधर थे। वे कहते थे कि नेताओं के व्यक्तिगत अहंकार और कम्युनिस्टों की पोथी निष्ठा को दूर करना अत्यावश्यक है। मधु जी कहते थे कि सोशलिस्ट और कम्युनिस्टों के एक जगह नहीं आने का लाभ संप्रदाय वादियों को लगातार प्राप्त होता रहा है।
उन्हें इस बात का भी दुख था कि सर्वधर्म समभाव की ऊंची आवाज में जय जयकार होती है लेकिन धर्मांध शक्ति दिन प्रतिदिन प्रबल होती जा रही हैं।
मधु जी को बिहार का ज्ञानकोश कहा जाता है और प्रखर संसदविद् भी। 1964 में मुंगेर (बिहार) से जीतकर उन्होंने तीसरी लोकसभा में प्रवेश किया था। 1967 में वे फिर जीते लेकिन 1971 के चुनाव में 100 बुथों पर हुई लूटपाट के चलते हार गए। 2 साल बाद 1973 में फिर से बांका उपचुनाव जीतकर लोकसभा में आए। आपातकाल में संसद की मियाद बढ़ाए जाने पर उन्होंने 18 मार्च 1976 को जेल में रहते हुए लोकसभा से त्यागपत्र दे दिया। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में वे फिर चुने गए। जनता पार्टी और जनता सरकार की टूट के बाद 1980 के चुनाव में वे हार गए।
तीसरी लोकसभा में मधु जी की इतनी जबरदस्त धाक थी कि उन्हें एक बड़े ब्रिटिश अखबार डेली मेल ने भारत के माइकल फुट (विपक्ष के नेता) का खिताब दिया। फाइनेंसियल टाइम्स ने उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा धर्मवीर कहा ।
उन्होंने विरोधी दलों को संसद के भीतर नया मार्ग दिखाया। मंत्रियों पर लगाम लगाने के नए तरीके सिखाए। उन्होंने विशेषाधिकार प्रस्ताव को प्रभावशाली हथियार की तरह इस्तेमाल किया। 1967 में उन्होंने चुनाव में अत्याधिक धन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने वाला विधेयक पेश किया जिसे सरकार ने स्वीकार किया। वह बाद में कानून भी बना।
संसदीय प्रक्रिया के सूक्ष्म नियमों के वे गहरे जानकार थे। उनको हेम बरूआ, हीरेन मुखर्जी और नाथ पाई की पंक्ति में सबसे आगे माना जाता है ।
जिस समय डॉ लोहिया और मधु जी लोकसभा में थे उस समय को संसद के इतिहास का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है। कम संख्या में हो कर भी विपक्ष कुछ कर सकता है इसकी मिसाल उन्होंने कायम की थी। संसद के कई सदस्य यह कहते थे कि उनके कानों में दो ही आवाजें गूंजती है, एक लता मंगेशकर की दूसरी मधु लिमये जी की। यही कारण था कि रूस के राष्ट्रपति ब्रेजनेव भारत आए तो उन्होंने अकेले में मधु जी से आधे घंटे बातचीत की। 1964 से 1967 तक के बीच उन्होंने सरकार की नाक में दम कर दिया था जिसके कारण सरकार इतना डर गई कि 1967 के चुनाव के दौरान उन पर हमला भी हुआ और हत्या का षड्यंत्र भी रचा गया।
वरिष्ठ पत्रकार और सांसद रहे कुलदीप नैय्यर जी के शब्दों में मधु जी एक आदर्शवादी सांसद थे। उन्होंने जितने सवाल संसद में उठाए उतने सवाल किसी सांसद ने नहीं उठाए। वे हर प्रश्न समाज व देश की दृष्टि में रखकर करते थे।
पूरी संसद और देश ने उनका लोहा तब मान लिया जब एक बार इंदिरा जी ने बजट रखा। इंदिरा जी के भाषण के बाद मधु जी कुछ बोलना चाहते थे परंतु लोकसभा अध्यक्ष ने सदन स्थगित कर दिया। तुरंत मधु जी ने लोकसभा अध्यक्ष को समझाया कि वित्त विधेयक लोकसभा के समक्ष नहीं रखा गया इसके कारण रात के 12 बजे के बाद सरकार का सारा काम ठप्प हो जाएगा क्योंकि सरकार के किसी भी विभाग को एक पाई भी खर्च करने का अधिकार नहीं होगा। स्थिति की गंभीरता को समझने के बाद रेडियो से ऐलान कर रात को लोकसभा का विशेष सत्र कुछ मिनटों के लिए बुलाया गया और वित्त विधेयक पास किया गया।
सांसदों के बीच कहा जाता है कि दिल्ली की लोकसभा में लोहिया जी ने कृष्ण की और मधु जी ने अर्जुन की भूमिका निभाई। यानि जनता की लड़ाई को संसद में यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः को चरितार्थ किया।
दिनमान के संपादक अज्ञेय जी ने लिखा था आज की लोकसभा का अर्थ है मधु लिमये, एक छरहरे बदन का अत्यंत निरीह व्यक्ति, जो रोज संसद के आरंभ में ही खड़ा होकर अपने सवालों की बौछार से शासक दल का मुंह बंद कर देता है। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय जनतंत्र के इतिहास में डॉ लोहिया तथा लिमये जी के जैसे सांसद मिलना मुश्किल है। अपने संसदीय जीवन के कार्यकाल में जितने घोटाले का पर्दाफाश लिमये जी ने किया उतना किसी ने भी नहीं किया। सत्य कितना भी अप्रिय क्यों न हो, कहना ही चाहिए। उसकी तरकीब तो खोजना ही चाहिए ऐसा उनका आग्रह था। वे हमेशा सत्य की खोज में रहे।
मधु जी जीवन में नैतिकता और पारदर्शिता सर्वोच्च स्थान पर रखते थे। संसद में चावल (अनाज) के घोटाले की उन्होंने पोल खोली थी जिससे तमाम व्यापारियों को लाभ हुआ। एक व्यापारी ने 1000 रूपये का मनीऑर्डर मधु लिमये जी को भेज दिया जिसे मधु जी के कार्यालय में स्वीकार कर लिया गया। मधु जी को जब मालूम हुआ तो उन्होंने मनीआर्डर स्वीकार करने वाले साथी को कहा कि हम किसी व्यापारी के दलाल हैं क्या ? दूसरे दिन मधु जी के द्वारा साभार पैसा वापस कर दिया गया।
मधु जी जनता पार्टी के शासन काल मे सत्ता के केंद्र में रहे, वे चाहते तो बहुत संपत्ति बना सकते थे परंतु वे अंतिम दिनों तक छोटे से फ्लैट में रहते थे वह भी बिना फ्रिज और टी वी के, खुद खिचड़ी बना कर खाते थे और चाय खुद बनाकर पीते और पिलाते थे। हालांकि सहायक शोभन उनकी सेवा के लिए उपलब्ध रहते थे।
ऐसे थे मधुजी जिसकी जन्म शताब्दी वर्ष हम इस वर्ष हम मनाएंगे।
मुझे इस बात की खुशी है कि मधुजी के साथ मुझे उनके सक्रिय राजनीति से अलग हो जाने के बाद प्रोफेसर विनोद प्रसाद सिंह जी के साथ, जब भी मैं दिल्ली में रहता था, सत्संग का अवसर मिला।
मुझे मधुजी के ईमानदारीपूर्ण , सादगी भरे, सरल, पारदर्शी संघर्ष पूर्ण जीवन, पुणे से आकर बिहार की राजनीति में उनके गहरे प्रभाव के साथ-साथ चुनावी जीत ने अत्यधिक प्रभावित किया।
इस तथ्य को कम लोग जानते हैं कि मधु जी को ब्रिटिश हुकूमत, पुर्तगाली शासकों और भारत सरकार ने आपातकाल सहित 23 बार बन्दी बनाया । चार बार उन्हें एक साल से अधिक की सजा हुई। पुर्तग़ाली सरकार ने उन्हें 12 साल की सजा सुनाई थी लेकिन पोप की मध्यस्थता के कारण 19 महीने बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। उनकी जेल डायरी आज गोवा मुक्ति आंदोलन का
महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है।
आने वाली पीढ़ियों के लिए मधु जी सदा प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

     डॉ सुनीलम 

सचिव, मधु लिमये जन्मशताब्दी समारोह समिति

Ramswaroop Mantri

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