
कनक तिवारी
क्या है कांग्रेस ? कांग्रेस देश की राजनीति में तफरीह करती हुई नहीं आई. कांग्रेस-संस्कृति इतिहास की नायाब घटना है. सामाजिक चिंतन की प्रक्रिया से करोड़ों निस्तेज भारतीयों को आज़ादी के अहसास से सम्पृक्त करने ज़रूरत के रूप में वक़्त के बियाबान में संयोगवश कांग्रेस पैदा हुई. वह उन्नीसवीं सदी में जन्मी. 20वीं सदी में पुख्ता पैरों पर चलना फिर दौड़ना सीखा. प्रतिनिधि रही राष्ट्रीय पार्टी के रूप में इक्कीसवीं सदी की ओर मुखातिब हुई. उसकी किशोरावस्था का परिष्कार राजनीति के धूमकेतु लोकमान्य तिलक ने शिराओं में गर्म खून भरकर किया. उसकी जवानी गांधी के जिम्मे हुई जिसने उसकी छाती को अंग्रेज की तोप के आगे अड़ाने का जलजला दिखाया. उसकी प्रौढ़ावस्था की जिम्मेदारियों के समीकरण जवाहरलाल नेहरू ने लिखे. शतायु की ओर बढ़ती उसकी बूढ़ी हड्डियों को इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने आराम नहीं लेने दिया. देश को आज़ादी दिलाने वाली कांग्रेस लेकिन इन दिनों संकटग्रस्त, संघर्ष कर रही दिलचस्प दौर में है. लोकसभा तथा विधानसभा चुनावों के परिणामों ने पार्टी के सामने सवाल ज्यादा खड़े किए हैं, उत्तर लेकिन कम दिए.
भीड़ नहीं, विचारों के व्यक्तित्वों के सहारे कांग्रेस राजनीति में धीरे धीरे महानदी के रूप में बहती रही. करोड़ों लोगों की प्रवक्ता बनी कांग्रेस बुनियादी तौर पर सोच की पार्टी रही है. शुरुआती सबसे बड़े नेता तिलक शीर्ष विचारक ने ’स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ का नारा अंग्रेज की छाती पर उगाया. गांधी अंग्रेजी और गुजराती भाषाओं के नायाब लेखक और कालजयी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज‘ के रचयिता थे. नेहरू ने विश्व लेखकों के बीच अपनी सम्मानजनक जगह हासिल कर ली. मौलाना आज़ाद उर्दू, फारसी और अरबी के नामचीन विद्वानों में रहे हैं. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का अंग्रेजी भाषा पर इतना अधिकार था कि कांग्रेस सम्मेलनों के वाद विवाद का निचोड़ प्रस्ताव की शक्ल में जब लिखते, एक शब्द का हेरफेर देखने और करने की जरूरत नहीं पड़ती थी.
कांग्रेस के बाहर भी गांधी से इत्तफाक नहीं रखने वाले मोहम्मद अली जिन्ना और डॉ. अम्बेडकर व्यक्ति नहीं बुद्धिजीवी संस्थाओं के रूप में यादों के इतिहास में दर्ज हैं. उस वक्त की युवा पीढ़ी के समाजवादी आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण आज़ाद आदि भारत के भी बड़े विचारकों में रहे हैं. डॉ. पट्टाभि सीतारामैया, श्रीनिवास शास्त्री, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, सुभाषचन्द्र बोस, आचार्य जे.बी. कृपलानी, पुरुषोत्तमदास टण्डन, मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपत राय जैसे कांग्रेस के कई नेता प्रखर बुद्धिजीवी थे. ये चिन्तक हाथी दांत की मीनारों में बैठने वाले नहीं बल्कि जनसमस्याओं से जुड़कर अपना खून पसीना एक करने को हौसलामंद रहे अव्वल दर्जे के चरित्रवान देशभक्त थे.
जनता की अन्दरूनी समझ की सही और मैदानी पड़ताल कांग्रेस और भारत के सबसे बड़े सूरमा गांधी ने की. बीसवीं सदी ने सिद्ध किया कि हिंदुस्तान की आत्मा, जेहन और भविष्य के सिलसिले में गांधी से बड़ा विचारक नहीं हुआ. गांधी बौद्धिक नहीं होते तो अंग्रेज की काट नहीं हो पाती. हालांकि धीरे धीरे कांग्रेस के केन्द्रीय दफ्तर से लेकर ब्लाक मुख्यालयों तक जिस भाषा में राजनीतिक चिंतन होने लगा, उस कागज के फूल में गांधी की गंध नहीं होती थी. गांधी ने तो भारत के संविधान के लिए अपना ड्राफ्ट और विचार भी दिए थे लेकिन उनकी अनसुनी की गई. संविधान सभा में लेकिन बमुश्किल दस प्रतिशत सदस्य ही गांधी नाम उच्चारते थे. वहां दीवानबहादुरों, रायबहादुरों, खानबहादुरों, राजेरजवाड़ों और बड़े वकीलों की जमात ने मोर्चा संभाल रखा था. यही वजह है कि संविधान और उसके छूट गए गलियारों में अंग्रेज़ी की इत्र फुलेल की गंध है लेकिन उसमें गांधी का निखालिस किस्म का हिन्दुस्तानी ग्रामीण पसीना नहीं महकता. गांधी ने राष्ट्रपति भवन को स्कूल या अस्पताल जैसे सार्वजनिक काम में लगाने का इरादा ज़ाहिर किया था. राष्ट्रपति उसमें क्यों रहते आए हैं ? सभी बड़ी कोठियां गांधी अवाम की सेवा के कामों के लिए सूचीबद्ध कर गए थे. मंत्री हैं कि अपने सरकारी बंगलों को ऐय्याशी के गुब्बारों की तरह फुलाए जा रहे हैं. कांग्रेस में घोटालेबाज, पूंजीपति, बर्खास्तशुदा नौकरशाह, राजे रजवाड़े और खुशामदखोर धीरे धीरे बेहतर हालत में आ ही गए.
नेहरू की कांग्रेस
नेहरू ने कहा था भले ही भ्रष्टाचार सरकारी केंचुल से मुकम्मिल तौर पर दफा नहीं हो पाए, हुकूमत के किले की दीवार में इतना सूराख तो कर ही देंगे कि लोगों को दिखाई पड़े कि अंदर क्या हो रहा है. जवाहरलाल का प्रधानमंत्री काल ज्यादा कामयाबी और कम नाकामयाबी का मिला जुला दौर रहा है. नेहरू-युग में ही मंत्री, राजनेता और अफसर भ्रष्ट होने लगे थे. उनके प्रसिद्ध दामाद फीरोज गांधी से संसद में भिड़ंत नेता मंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को मूंदड़ा कांड में ले डूबी. शीर्ष बौद्धिक कृष्णमेनन पर भी भ्रष्टाचार के आरोप मढ़े ही गए. बहुत संक्षिप्त अवधि के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री से भारत को बहुत उम्मीदें थीं. इतिहास की दुर्घटना ने लेकिन उनके लिए दुर्घटना का इतिहास भी रच दिया. शास्त्री शत प्रतिशत ईमानदार थे.
कांग्रेस की मुश्किल करिश्माई व्यक्तित्व के अभाव से ज्यादा उसके संगठन की बदहाली में होती गई. इंदिरा गांधी पर आरोप बार बार लगाया गया कि उन्होंने संगठन को तरजीह नहीं दी. इंदिरा गांधी ने लेकिन कांग्रेस की सभी वांछित जगहों पर चाहे अपने विरोधियों को भले नहीं बिठाया हो, पदों को कभी खाली नहीं रखा. भारत का संविधान 1946 से 1949 तक बना. संविधान निर्माताओं ने ‘सेक्युलरिज़्म‘ और ‘सोशलिज़्म‘ शब्दों पर भारी माथापच्ची की. लेकिन इन्हें मकसद वाले परिच्छेद में प्रकटतः शब्दों में नहीं लिखा. इन्दिरा गांधी ने 1977 में पंथनिरपेक्षता‘ और ‘समाजवाद‘ को संविधान का घोषित मकसद बनाया. इन उद्देश्यों की दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों ने भारी फजीहत कर रखी है. दोनों प्रमुख धर्मों के कठमुल्ला तत्व पंथनिरपेक्षता और समाजवाद के चूल्हों पर अपनी रोटी सेंक रहे हैं. धीरे धीरे कांग्रेस में बौद्धिक नेतृत्व का अभाव होता ही गया.
आज से ज़्यादा मुश्किल हालात में इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए घेरी गईं थीं. देश के सामने भारी आर्थिक संकट था. पर्याप्त खाद्यान्न नहीं था. दवाओं की कमी थी. खज़ाना खाली हो रहा था. पी.एल. 480 जैसा बदनाम सौदा अमेरिका से हो चुका था. कांग्रेस में ‘सिंडिकेट‘ के नाम से उभरे पूंजीवाद समर्थक गुट ने इन्दिरा को ‘मोम की गुड़िया‘ कहा. नेहरू की बेटी ने पलटवार कर वामपंथी पार्टियों से सहयोग लेकर सिंडिकेट के पूंजीपरस्तों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया. कोयला, सीमेन्ट, बैंकिंग, बीमा, अल्यूमीनियम वगैरह कई उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया. एटमी ताकत बढ़ाने के उद्यम किए गए. बांग्लादेश बनवाकर पाकिस्तान की हेकड़ी भुला दी. इन्दिरा गांधी ने शाही थैली और पदवी की छोड़छुट्टी की. ‘गरीबी हटाओ‘ का नारा बुलन्द किया. शहीद हुईं तो कांग्रेस को तीन चौथाई से ज़्यादा सीटें दिला दीं. जनता पार्टी की हुकूमत ने मुकदमों के अंबार लगाते इन्दिरा गांधी की हिम्मत पर सवालिया तोहमतें लगाईं. तमाम विवादग्रस्तता और ऊहापोह के बावजूद इन्दिरा फिर दो तिहाई बहुमत से सत्ता में वापस आईं. रिक्टर स्केल पर ऐसा नया साहस आज भी कांग्रेस को गुमनामी की खंदकों से बचा सकता है क्योंकि कांग्रेस के सामने उतनी बड़ी चुनौतियां नहीं हैं, फिर भी पार्टी वैसी हिम्मत नहीं जुटा पा रही है.
राजीव युग
राजीव गांधी को तो बोफोर्स तोप के मामले में अभियुक्तनुमा कटघरे तक में खड़ा किया गया. यह सब (तब हुआ) जब राजीव गांधी ने राजनीति को एक सभ्य चेहरा दिया. सफाई मिशन, स्वास्थ्य मिशन, टेक्नोलाजी मिशन जैसे नायाब प्रकल्प दिए. अयोध्या में राम मन्दिर का विवादित ताला खुलवाने तथा शाह बानो प्रकरण में मुस्लिम कठमुल्ला तत्वों से नादान समझौता करने से राजीव गांधी की सरकार ने गलतियां कीं. इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद निर्दोष सिक्खों की हत्या और अन्य घृणास्पद अपराधों पर मलहम लगाने का काम कांग्रेस के चिकने चुपड़े नेताओं ने ठीक से नहीं किया.
राष्ट्रीय शर्म की उस दुर्घटना पर बिना शर्त माफीनामा जारी कर सिक्खों को पूरी तौर पर संतुष्ट करना कांग्रेस की जिम्मेदारी थी. बाद में देश ने कांग्रेस के तज़ुर्बे और मनमोहन सिंह की लुभावनी आर्थिक नीतियों पर भरोसा करते हुए दो बार कांग्रेसनीत गठबंधन की सरकार को हुकूमत दी. नतीजा सिफर से कुछ बेहतर रहा लेकिन अन्दर ही अन्दर कांग्रेस की गाड़ी ढलान पर आती गई. दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक मुल्क की दो सदियों की गुलामी को आज़ादी में तब्दील करने की अगुआ यह बूढ़ी पार्टी लांछनों का आश्रयस्थल बनती गई है.
मुम्बई कांग्रेस में राजीव गांधी ने सत्ता के दलालों के खात्मे की बात कही थी. दलबदलू, अवसरवादी, सिद्धांतहीन, लकवाग्रस्त, साम्प्रदायिक, सामंतवादी, भ्रष्ट और निकम्मे तत्वों ने कांग्रेस में चोर दरवाजे से घुस कर अपनी दूकानें जमा रखी हैं. उनका पर्दाफाश किये बिना कांग्रेस की पुरानी पुण्य-कथा में कई पापलीलाएं शामिल होती रहेंगी. कांग्रेस इतिहास के विचित्र विरोधाभासों और विपर्ययों का फेनोमेना भी रही है. इसमें एक साथ राजा और रंक, जमींदार और किसान, उद्योगपति और मजदूर, बूढ़े और जवान शामिल रहे हैं. उनकी निजी जिन्दगी या व्यक्तित्व ने कांग्रेस को कभी प्रभावित नहीं किया. भारत एक गरीब देश है इसलिए कांग्रेस भी अधिकतर गरीबों और मध्यवर्गीय परिवारों के सदस्यों की पार्टी समझी जाती रही है. नेतृत्व अलबत्ता कुलीन घरानों से आता रहा है. आजादी के बाद धीरे धीरे कांग्रेस का चरित्र और उसकी नस्ल में बदलाव होने लगा. यदि कई कांग्रेसियों के रक्त की जांच हो तो उसमें सफेद रक्तकणों के लाल रक्तकणों पर होने वाले आक्रमण पर शोध प्रबन्ध ही लिखना पड़े. कांग्रेस ढांचागत पार्टी नहीं रही है.
कांग्रेस के याद-घर में वैसे तो सैकड़ों महान सूरमाओं के नाम और काम भी दर्ज हैं. आर. एस. एस. के संस्थापक डॉ. हेडगेवार, डॉ. बी. एस. मुंजे, कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता रहे कामरेड श्रीपाद अमृत डांगे और ई. एम. एस. नम्बूदिरीपाद तथा गायत्री परिवार के प्रमुख आचार्य श्रीराम शर्मा भी कांग्रेस से संबद्ध थे. मानवेन्द्र नाथ रॉय, मोहन कुमारमंगलम्, केशवदेव मालवीय, कृष्ण मेनन और चंद्रजीत यादव आदि कम्युनिस्ट भी कांग्रेसी होते गए. प्रखर समाजवादी विचारक अशोक मेहता नेहरू के वशीकरण में कांग्रेस में आए. वह शीराजा लेकिन बिखर गया.
कांग्रेस की एक और मुश्किल उसके खून की शुद्धता को लेकर हुई. कभी वक्त था लोग असहमत तो क्या अपमानित होने पर भी पार्टी का दामन इसलिए नहीं छोड़ते थे कि गैरकांग्रेसी होना अपने आप में जीवन भर कलंक ढोना था. फिर हालात ऐसे नहीं रहे. कांग्रेस से भारतीय जनता पार्टी, जनता पार्टी और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों में स्थापित नेताओं के आने जाने का क्रम दलबदल के इतिहास का नया ठनगन बन गया. इस खतरे को संयोगवश राजीव गांधी ने सबसे अधिक पहचाना, जब अपनी मां की मृत्यु के बाद वे तीन चौथाई बहुमत के आधार पर लोकसभा के नेता बने. राजीव गांधी को दलबदल विरोधी कानून की राजनीतिक ज़रूरत नहीं थी फिर भी उन्होंने राजनीति की शुद्धता के लिए सर्वसम्मत निर्णय लोकसभा में पारित करवाया. यह अलग बात है कि उस दलबदल कानून की यथासंभव धज्जियां भी लगातार उड़ाई जाती हैं.
चिन्ताओं की वजह ?
विधायिका की बहसों में कांग्रेसी सदस्यों के भाषण जनता में उस उत्साह और चुनौती का संचार नहीं कर पाते रहे जो उनके पुरखे किया करते थे. जनसभाओं में लोग भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी पार्टियों के नेताओं के भाषण सुनने जाते. कांग्रेस ने भाषण कला को ही खामोश कर दिया. जिस पार्टी में श्रीनिवास शास्त्री, मौलाना आज़ाद, सुभाष बोस, सरोजिनी नायडू और जगजीवनराम जैसे अद्भुत वक्ता रहे, उसे वाचाल बुद्धि कौशल से इतनी जल्दी परहेज नहीं करना चाहिए था. मीलों फैले वैचारिक मरुस्थल में जब कभी कोई इक्का दुक्का नेता अपनी बौद्धिकता का प्रदर्शन करता, तो कांग्रेस बेंचों में उत्साह का संचार होता. अब भी ऐसे लोग हैं जो यह तर्क कर सकते हैं कि बुद्धि कौशल के बदले कांग्रेस को कर्म के जमीनी नेताओं की आवश्यकता है. बुद्धि और कर्म का आपस में छत्तीस का आंकड़ा नहीं है. यही बात तो कांग्रेस को एक एक देश सेवक ने सिखाई थी.
कांग्रेस की अंदरूनी ताकत उसकी आपसी असहमति भी रही है. तिलक और गोखले में कितनी पटी ? गांधी और सुभाष कहां एक थे ? नेहरू से सरदार पटेल के कितने मतभेद नहीं थे ? नरम दल और गरम दल यहां तक कि बाप बेटे मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू या पति-पत्नी आचार्य कृपलानी और सुचेता कुपलानी में राजनीतिक दृष्टि से कहां पटी है ? गांधी ने तो पूरी कांग्रेस के खिलाफ अनशन करके कई बार जेहाद बोला. इन्दिरा जी ने तो पार्टी ही तोड़ दी लेकिन कांग्रेस के मूल आदर्श से उसका कोई महारथी नहीं हटा. अब कांग्रेस के नाम पर बेहतर मेवा खाने के लिए संघर्ष का नाटक किया जाता है. आज असहमति का शब्दकोषीय अर्थ दुश्मन के खात्मे से है. उस असहमति का मतलब पार्टी तक की पीठ पर छुरा मारना है.
सोनिया-युग
आज कांग्रेस यही बताने में मशगूल है कि यदि अंदरूनी संकट फोड़े की तरह फूट रहा हो तो उस पर सोनिया गांधी के हाथ ही मरहम लगा सकते हैं. लोग राजीव को उनके बुरे दिनों में इटली कांग्रेस का सरगना बताते थे फिर भी उस परिवार से अपने संबंधों की डींग मारते अघाते नहीं थे. इटली से भारत आई नेहरू परिवार की बहू में कांग्रेस-रक्त होने से उनकी विश्वसनीयता और अनुकूलता इस कदर बढ़ी कि अच्छे से अच्छे अखाड़ची कांग्रेसी को विनय की मुद्रा में उनसे मिलने 10, जनपथ अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने के लिए जाना पड़ता है. लोकसभा के चौदहवें चुनाव में सोनिया के समर्थन में दिया गया जन-ऐलान राजनीतिज्ञों और मीडिया सहित विदेशियों को भी चकित कर गया. ‘फील गुड‘ के निर्माता और ‘इंडिया शाइनिंग‘ के निर्देशक ‘फील बैड‘ करते अंधेरे में एक दूसरे की शूटिंग करते रहे. 10 जनपथ नई कांग्रेसी राजनीतिक संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण गवाह, खिलाड़ी और हस्ताक्षर है.
मूल प्रश्न ये हैं:
नेतृत्व को लेकर सोनिया गांधी निस्सन्देह वह ’फेवीकोल’ हैं जिससे पूरी पार्टी के टूटते हाथ पांव जुड़ जाते हैं लेकिन कांग्रेस की आत्मा कहां है ? स्वदेशी का विरोध, विचारों की सफाई, वंशवाद की बढ़ोत्तरी, समाजवाद का खात्मा, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का समर्थन और पश्चिमी अपसंस्कृति के सामने समर्पण करने के बाद कांग्रेस और अन्य दक्षिणपंथी पार्टियों में क्या फर्क रह जाता है ? सड़क पर यदि कांग्रेस और भाजपा के दो कार्यकर्ता चलें, तो उन्हें देखकर कोई नहीं अलग अलग पहचान पाता, जबकि चार दशक पहले तक बात ऐसी नहीं थी. कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य भी गाहे बगाहे जीन्स और टी शर्ट्स पहनकर दूरदर्शन के झरोखों से जनता को निकट दर्शन देते हैं. पैन्ट कोट और विलायती सूट डांटे रहने का फैशन भी कांग्रेस में है. देहाती गंध की गमक लिए लाखों कांग्रेसी कार्यकर्ता अब दरी बिछाने वालों की जमात तक में शामिल नहीं हैं. अब तो उनके बदले शामियाना भंडार वाले कांग्रेस नगर रचने के ठेकेदार हो गये हैं. हर चीज अब बाजार से किराये पर है. पूरा मंच, शामियाना, खान-पान, विज्ञापन एजेन्सियों से ठेके में छपा साहित्य, ढोकर लाये गये श्रोता, भाषण पढ़ते अशुद्ध हिन्दी के नवजात प्रवाचक. ऐसा लगता है स्टूडियो में कांग्रेस-लीला नामक किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है.
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संघ परिवार पर कांग्रेस का तीखा आक्रमण तर्कसंगत है कि परिवार ने भारत की आज़ादी के लिए घरों में दुबक कर बैठने के अलावा कुछ नहीं किया. लेकिन आज खुद कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों में से कितनों ने अथवा उनके पूर्वजों ने आजादी के आन्दोलन में हिस्सेदारी की है ? पराजय-विशेषज्ञ कांग्रेस की जीत की रणनीति बनाते हैं, जिन्होंने जीवन में कोई चुनाव नहीं लड़ा. जो अपने राज्य से एक वार्ड का चुनाव जीत नहीं पाते. जो लगातार हार रहे हैं. जो हारने के बावजूद राज्य सभा में आसानी से पहुंच जाते हैं, लेकिन दूसरों को नहीं जाने देते. जो आखिरी बार हार चुके हैं. ऐसे तत्व ने मिलकर कांग्रेस की अगली लोकसभा में जीत की गारन्टी करते रहते हैं.
कांग्रेस कार्यसमिति तथा प्रदेशों के कई शीर्ष नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी न कभी कांग्रेस छोड़ी भी है. इनमें से कई नेताओं ने तो इन्दिरा गांधी तक को धोखा दिया. फिर भी सोनिया गांधी उन पर विश्वास किए बैठी हैं. कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसके संविधान में प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष पद एक ही व्यक्ति को दिए जाने के प्रावधान रचे गए हैं. जिस पार्टी में गांधी जैसा राज्य शक्ति की खिलाफत करने वाला नेता पैदा हुआ, उस पार्टी में खुले आम दिल्ली से लेकर पंचायतों तक वंशवाद की राजनीति चलाई जाती रही है. नेहरू गांधी परिवार ने यदि देश की सेवा की होगी तो कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों के परिवार वालों को आम कांग्रेस कार्यकर्ता के ऊपर क्यों तरजीह दी जा रही है ? पूरी पार्टी को कुछ परिवार क्यों जकड़े हुए हैं ?
चाहे जो हो, मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाना सोनिया गांधी के यश के खाते की घटना नहीं हो सकती. कथित आर्थिक सुधारों का नायक जननायक नहीं होता. एक सेवानिवृत्त नौकरशाह के लिए इतनी पेंशन ठीक नहीं थी कि वह मूल वेतन से ही ज्यादा हो जाए. देश या कांग्रेस कोई घाटा उठाती ‘पब्लिक कम्पनी‘ नहीं रही है जिसका प्रबंधन विशेषज्ञ को इस भय के साथ सौंप दिया जाए, ताकि वह कम्पनी बीमार नहीं हो जाए. वह अर्थशास्त्र के अध्यापक की नौकरी नहीं बल्कि सेवा के अर्थ का अध्यापन है. मनमोहन सिंह ने ही वित्तमंत्री के रूप में वर्ल्ड बैंक, गैट, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, निजीकरण जैसे शब्दों के अर्थ पढ़ाए हैं. सोनिया की विजय आक्रमण पर प्रतिरक्षा की विजय थी. विरोधाभास यह भी कि बहुलवादी संस्कृति में विश्वास करने वाली कांग्रेस एकल प्रचारक सोनिया तक कैद होकर रह गई. सोनिया गांधी इतिहास का भूकम्प नहीं हो सकतीं. वे अतिशयोक्ति अलंकार के काबिल भी नहीं हैं. हो सकता है मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाने के पीछे कई राजनीतिक कारण भी रहे होंगे.
मनमोहन सिंह के बदले राजनीतिक व्यक्ति यदि प्रधानमंत्री होता तो पार्टी पतन के रास्ते पर शायद इस तेज़ी से नहीं जा पाती. एक गैरराजनीतिज्ञ, मनोनीत प्रधानमंत्री ने किसी अन्य लोकतंत्र में इस कदर अपना शिकंजा संगठन और सरकार पर नहीं कसा जैसा करतब भारत में हुआ.
चुनावों में पराजय
जनता ने 1989 के बाद कांग्रेस को केन्द्र की एकल सत्ता से बेदखल कर दिया. यह अलग बात है कि सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के कारण उसे पांच वर्ष सत्ता में रहने का राजनीतिक परिस्थितियों के कारण 1991 में अवसर मिल गया था और 2003 तथा 2008 में भी. लोकतंत्र में सत्तासीन होना ही कामयाब होना है. चुनावों में कांग्रेस का पतन फीनिक्स पक्षी की दंत-कथाओं की तरह उन तंतुओं से नहीं बना है, जिनमें पांच सौ बरस बाद भी शरीर के भस्म हो जाने पर राख से जी उठने की कालजयी कुदरती क्षमता होती है.
सवाल उठता रहा कि आत्महंता और अहंकारी तथा अधकचरे कांग्रेसियों के हुजूम को किसी अनुशासित सेना में बदलने की शक्ति क्या कांग्रेस के नेतृत्व में बची रही है ? सवाल उठता रहा कि भविष्य यानी वक्त एक निर्मम हथियार है. उसे कांग्रेसियों की गरदन से भी कोई परहेज़ नहीं है. क्या कांग्रेस आत्म प्रशंसा में गाफिल रही अथवा निराशा के महासमुद्र में विलीन होने को बेताब हो गई थी ? क्या कांग्रेस के कर्णधार केवल उनके पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को ढोने लेकिन नहीं बांचने का दंभ लिए हुए मतदाताओं को घर की मुर्गी समझते रहेंगे ?
जब तक कांग्रेस की नई फौज को देश और पार्टी का इतिहास, संविधान, कार्य समिति के प्रस्ताव, अध्यक्षीय भाषण और समाज विज्ञान के सभी महत्वपूर्ण विषयों के सान्दर्भिक उपयोग से ओत-प्रोत नहीं किया जाएगा, कांग्रेसी बौद्धिक दुनिया के लक्षणों को आत्मसात कैसे कर पाएंगे ? केन्द्र से लेकर जिला स्तर पर कांग्रेस के विचार विभाग खामोश होते गए. कांग्रेस परिवार की पत्रिकाएं ठीक से प्रकाशित प्रचारित नहीं होती रहीं. रिटायर्ड लोग भी अपने अनुभवों का जखीरा लादे कांग्रेस की पूंजी रहे हैं. योजनाबद्ध तरीके से अदालतों की नियुक्तियों में अन्य पार्टियां विचारधारा की प्रतिद्वंदिता के आधार पर दिलचस्पी लेती रही हैं. कांग्रेस है कि बेखबर रही है. स्कूल के जलसों में कांग्रेस नेता घण्टों बैठे छात्रों को प्रोत्साहित करते थे.
कांग्रेस के विभिन्न सांगठनिक कार्यालयों में जन-समस्याओं को लेकर तर्कपूर्ण, प्रामाणिक और आंकड़ों सहित बहस होती थी कि प्रशासन खौफ खाता था. गुप्तचर संगठनों की रिपोर्टों में ऐसी प्रामाणिकता का उल्लेख होता था. कांग्रेस के सूचना केन्द्र तथ्यवार गणित के विश्वविद्यालय रहे हैं. कांग्रेस के बड़े नेताओं की चिट्ठियों में समकालीन इतिहास बोलता रहा है, बल्कि सर्वकालिक संदेश गूंजता रहा. आज के कांग्रेसियों के पत्र व्यवहार को कौन पढ़ना चाहेगा ?आज बदजुबानी का तेजाब कानों में उड़ेला जाता है जबकि जनता नेता के चरित्र को प्रासंगिक मानता है.
कांग्रेसी नेता पहले बिरवे की तरह फूटता, फिर विशाल वृक्ष बनता था. अब गमलों में बोनसाइ की खेती होती है. राजे रजवाड़े, उद्योगपति, नौकरशाह, अर्द्धशिक्षित, अर्द्धविक्षिप्त, विदेशी नजरिए से लैस आदि वर्गों के चुनिंदा रहनुमा कार्यकर्ताओं पर नेता बनाकर थोप दिए जाते हैं. कांग्रेस गरीबों और आदिवासियों की भूमियां छीनकर अरबपति उद्योगपतियों को खरबपति बनाती रही है. वह ‘गरीबी हटाओ‘ के नारे के बदले ‘गरीब हटाओ‘ की दोषी भी रही है. कांग्रेसी नेता आपस में भारत और पाकिस्तान से भी ज़्यादा लड़ते रहे हैं. उसमें हत्या, बलात्कार, डकैती, धोखाधड़ी और आगजनी वगैरह के दोषसिद्ध मुल्जिम संसद और विधानसभाओं में मूंछें ऐंठते रहे हैं. शीर्ष विचारकों की इस पार्टी में मिडिल फेल जी-हुजूरियों की भी बहार रही है. वे उच्च कमान के सलाहकार हो जाते रहे हैं.
कमज़ोरी के कुछ और कारण
कांग्रेस की कमजोरी का एक कारण जवाहरलाल का समाजवाद, इंदिरा गांधी के राष्ट्रीयकरण के स्वप्न और राजीव गांधी के मानवीय दृष्टिकोण को बाद में राजतंत्र द्वारा भोथरा करने से भी है. कांग्रेस को बीन बीन कर सत्ता के उन दलालों को संगठन से कान पकड़ कर निकाल बाहर करना चाहिए था, जिनके सफाए का संकल्प उसने 1985 के चुनाव घोषणा-पत्र में किया है. तथाकथित कुलीन वर्ग के अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े साहबजादों ने राजनीति को सेवा के बदले रोमांटिक फ्लर्टिंग की वस्तु समझा और पुरानी पार्टी से छेड़खानी करने लगे. कुर्बानी की पार्टी जनता की नुमाइंदगी करने के बदले सफेदपोश अय्याश नेताओं का चारागाह बन गई.
बौद्धिकता के लिहाज से ठूंठ और सियासी जमीन के बदले गमलों में उगे हुए बौने नेता वातावरण में इतनी ज़ोर शोर से मचाने लगे कि कांग्रेस के अंदर जय जयकार, जिन्दाबाद और कोलाहल की नई परम्परा शुरू हुई. नेतागिरी जनता के बीच जाने के बदले मीडिया के विज्ञापनों में सिमट गई. वह किसान के खेतों और कारखानों से निकलकर मंत्रियों के बंगलों के सामने सहमी खड़ी रही. जनता से जुड़े और बौद्धिक रूप से सजग लोग कांग्रेस के सियासी नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गये.
ये लोग जमीन से जुड़े निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करते रहे. विधायिकाओं में गूंगों या अशिष्ट वाचालों को ठूंस दिया गया. संगठन के चुनाव से वर्षों तक कांग्रेस का सरोकार ही नहीं रहा. कांग्रेस का संविधान कार्यकर्ताओं, नेताओं के घरों तथा संस्था के दफ्तरों में होने के बदले पुरानी संदूकों में दीमक खाता रहा. कांग्रेस नेतृत्व ने जहां जहां जनता को अनदेखा किया, वहां वहां कांग्रेस को मतदाताओं ने दिन में तारे दिखाए. कांग्रेस ने चुनावी संघर्षों में शर्मनाक पराजयें केवल इस कारण नहीं झेली कि उसे मतदाताओं ने तिरस्कृत किया बल्कि इसलिये ज़्यादा झेलीं कि देश के मतदाताओं से कार्यकर्ताओं के जरिए उसका सम्पर्क संवादहीनता की हद तक मूक हो गया था.
लोकतंत्रीय इतिहास की विश्व की बड़ी पार्टी आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है. यह विधि की विडम्बना नहीं है. वह कुछ कुटिल दिमागों, विध्वंसक हाथों और दृष्टिहीन होती नज़रों के जमा खर्च का परिणाम है. लोकतंत्र में कांग्रेस के लिए यही रणनीति मुफीद थी कि अपना विकल्प पैदा नहीं होने दे. कांग्रेस पार्टी और उसके मैदानी कार्यकर्ता चुनाव नहीं हारे हैं. हार की चोट उनके माथे है, जिन्होंने अपनी तिकड़मों से ऐसे उम्मीदवारों को टिकिट दिलाई जिनमें चुनाव जीतने की कूबत ही नहीं थी अथवा जो राजनीतिक सूबेदारों के मुंहलगे सिपहसलार मात्र थे. कांग्रेस नहीं हारी है. उसके उम्मीदवार हारे हैं. इन उम्मीदवारों के राजनीतिक आका हारे हैं. उनका चयन-विवेक हारा है.
सोच का विषय क्या है ?
सोच का विषय यही है कि इस बड़ी पार्टी के प्रवक्ता वे लोग बनते गए जिनका शब्द विन्यास अपभ्रंशकालीन, राजनीतिक व्याकरण अशुद्ध और तर्कशास्त्र लालबुझक्कड़ीय साफ साफ दिखाई पड़ता है. स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों, बुद्धिजीवियों, संस्कारशील महिलाओं, शिक्षित युवकों और सेवादल की परम्पराओं में पके हुए प्रबुद्ध कार्यकर्ता हाशिये पर ला खड़े किए गए. विरोधियों की वैचारिक हत्या करना कांग्रेस का मकसद नहीं रहा है लेकिन आत्महत्या करना भी तो उसकी मंज़िल नहीं है.
मतदाताओं ने कांग्रेस को नहीं नकारा है. कुछ नाकारा लोगों ने कांग्रेस में घुसकर मतदाताओं को ही नकार दिया. लोकतंत्रीय जीवन में चुनाव एक यज्ञ है. यज्ञ को समिधा की आवश्यकता होती है कूड़ेकरकट की नहीं. कांग्रेस इस देश में सर्वोच्च ज्ञान का बहता, चलता फिरता पुस्तकालय रही तो है. वह वर्षों से ताला बन्द पड़ी किताबों की दूकान नहीं है. कांग्रेस भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक क्यों बनाई जा रही है ? यह इस सदी का सवाल है.
क्या कोई राहुल युग आया है ?
राहुल गांधी एक योजना के तहत सत्ता के शिखर पर पहुंचने की जुगत में दिखाई पड़ते तो हैं. राहुल गांधी में भी सोनिया गांधी का यही गुण है कि उनकी भाषा असभ्य, अभद्र, असंयत और अनावश्यक नहीं होती. वे एक शरीफ आदमी की तरह चेहरे पर मुस्कराहट तिरती मुद्रा लिए फिरते हैं. कांग्रेस का संविधान और घोषणा पत्र भारतीय संविधान के मूलभूत अधिकार और नीति निदेशक तत्वों की अनुकृति में उसी तरह बनाया गया है जैसे राष्ट्रीय ध्वज की अनुकृति में कांग्रेस का तिरंगा झंडा. खुशामदखोर उस पर समय समय पर इंदिरा गांधी, राजीव, सोनिया और राहुल के चित्र चस्पा करने में नहीं सकुचाते. युवा नेता राहुल गांधी अपने अनोखे वक्तव्यों से देश का ध्यान खींचते रहते हैं. इनमें से ज्यादातर बयान जमीनी हकीकत से जुड़े होते हैं और पुरातनपंथी धाकड़ किस्म के कांग्रेसियों के छद्म चरित्र से बेहद अलग होते हैं. राहुल पूरी ताकत के साथ युवा शक्ति को तरजीह देने के बयान देते रहते हैं. गरीबों और दलितों की झोपड़ी में खाना और सोना उनका राजनीतिक एजेंडा है. सुरक्षा घेरे को तोड़कर लोगों में घुस जाना नेहरू-गांधी परिवार की परंपरा राहुल गांधी तक विस्तृत हो गई है.
कांग्रेस विरोधी राज्यों में अब तो यह भी नया आलम है कि कांग्रेस के नेता भाजपाई मंत्रियों के पे रोल पर बताए जाते हैं. एक पुराने प्रतिपक्ष नेता तो भाजपा मंत्रिमंडल के अतिरिक्त खिलाड़ी की तरह मशहूर हो ही चुके हैं. वे सत्ताधारी पार्टी के साथ कई बार मिली जुली कुश्ती लड़ते भी देखे जाते रहे हैं. कांग्रेस देश का नेतृत्व तो कर रही है, लेकिन जिस तरह उसे राजनीतिक तिकड़म के चलते महाराष्ट्र और हरियाणा में सरकार बनाने में नाकामी मिली है – उससे भी राहुल के व्यंग्य को यथार्थ की शक्ति ही मिलती है. छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में राहुल गांधी के कथन का बहुत सारगर्भित अर्थ नहीं निकल सका.
आज कांग्रेस की हालत उसकी अपनी संस्कृति से टूटती नज़र आ रही है. कांग्रेस ने अपने अस्तित्व, संघर्ष और विजय के लिए नई नीतियां गढ़ ली हैं. ये नीतियां उसे आवश्यक, प्रयोगमूलक बल्कि निर्विकल्प नज़र आती हैं. दुनियावी जीवन में इतने बदलाव हो गए हैं कि कांग्रेस पुराने मूल्यों की गाड़ी पर बैठकर गंतव्य तक नहीं पहुंचने का खतरा नहीं उठा सकती. उसे लगता है कि देश चलाने के लिए उसे धन चाहिए. यदि वह नशाबंदी नहीं करे तो उसे हर वर्ष हजारों करोड़ रुपयों की आमदनी हो सकती है. यदि वह घाटे के खादी और कुटीर उद्योग नहीं चलाए तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार से उसे सस्ती कीमतों पर नित नए फैशन के परिधान विशेषकर नई पीढ़ी के लिए उपलब्ध हो सकते हैं. यदि वह हिन्दी को राजभाषा बनाने की पूर्वज-जिद मुल्तवी करती रहे तो उसे सभी प्रदेशों के मंत्रालयों तक पैर पसारने का अवसर मिलने की उम्मीद होती है. यदि वह शहरों का विकास उद्योगों के चुंबकत्व की थ्योरी के आधार पर करे तो गांव तो लोहे के कणों की तरह आकर्षित होते रहेंगे. यदि वह पारंपरिक भोजन, पोषाक, तीज त्यौहार वगैरह को भुला दे तो उसे सामाजिक संस्कृति के इलाके में नए मूल्य गढ़ते रहने के अवसर मिलते रहेंगे. कांग्रेस का खादीधारी और मद्य निषेध समर्थक सदस्यता का फैसला पांच सितारा संस्कृति की समझ की मौजूदा कांग्रेस को कहां सुहा सकता है. कांग्रेस का ताजा आकलन जातियों की जनसंख्या के अनुपात में जातीय समरसता को समझने का है.
राहुल गांधी उस जिजीविषा से मुक्त हैं जिसके बिना कोई बड़ा राष्ट्रीय नेता नहीं बनता. इक्कीसवीं सदी की राजनीति में कड़ियल और खब्बू राजनेता ही सफल हो सकते हैं. पता नहीं राहुल को आर्थिक, सामाजिक और वैज्ञानिक मामलों की कितनी समझ आ गई होगी. कांग्रेस में ऐसा वर्ग भी है जो अंदर ही अंदर चाहता है कि नेहरू गांधी परिवार का वर्चस्व खत्म हो. राहुल के चरित्र में उनके शुभचिंतक खैरख्वाह और मार्गदर्शी ये सब तत्व ठूंस ठूंसकर भर रहे हैं – ऐसा देश को लगता है.
असल सवाल यह है कि राहुल गांधी का सोच क्या है ? उनके पास कुछ सूत्रबद्ध शिक्षाएं हैं. उन्हें वे बतकहियों में अपने समर्थकों और सहयोगियों को परोसते चलते हैं. वे चाहते है कि कांग्रेस पार्टी के सभी सदस्य कठोर परिश्रम करें. सब मिल जुलकर एक परिवार की तरह रहें. जनता के सामने उनका बिगड़ैल चेहरा नहीं जाए. कांग्रेस जन लगातार जनता से संवाद करते रहें. मसलन वे बीच-बीच में आदिवासियों को ओडिशा में भरोसा दिला देते हैं कि उनकी जमीनें छीनकर उन पर बड़े उद्योग नहीं लगेंगे. इन सब खुशफहमियों के बरक्स कड़ियल जिंदगी का यथार्थ भी प्रतिधारा की तरह उसके साथ साथ बहता चलता है.
ऐसा नहीं है कि पूरा चित्र हताशा का है. अब भी इस पार्टी में ज्ञान, तर्जुबा और चिन्तन समेटे कुछ हस्ताक्षर कहीं न कहीं पड़े होंगे. कांग्रेस चाहे तो कथित नाकामी के बावजूद भी ऐसे तत्वों को उनकी मुनासिब भूमिका से लैस कर सकती है. कांग्रेस खत्म नहीं होगी. चोट लग जाने के कारण खेल से फिलहाल सत्ता से रिटायर हो गई है. कांग्रेस को विरोधियों की गलती पर उंगली उठाने के बदले अपनी रसोई तैयार करनी होगी, जिससे कार्यकर्ताओं की पूरी टीम का पेट भरे. कांग्रेस से ज्यादा संख्या में उदार, परम्परावादी, कर्मठ, असरदार और निजी हितों का त्याग करने वाले कार्यकर्ता कम्युनिस्टों को छोड़कर अन्य पार्टी में नहीं रहे हैं. कांग्रेस ने पहले भी निराशा को कफन की तरह नहीं ओढ़ा है. इक्कीसवीं सदी का भारत उन मूल्यों की धरती पर उगाया जा सकता है जो आज़ादी के संघर्ष की कांग्रेस के शाश्वत मूल्य हैं. यह काम कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता कर सकते हैं.
विघ्न संतोषी आलोचक और खुद को अंतर्यामी समझने वाले लोग ज़्यादा परेशान मत हों. मैं बहुत मासूमियत से कह रहा हूं. इस आदमी में एक सात्विक जिद है. वह और किसी नेता में दिखाई नहीं देती. और वह उसके अंतर्भूत साहस के कारण है. उसने अपने परिवार की पिछली पीढ़ियों में जो त्रासदियां देखी हैं. उसके कारण उसके अंदर निराशा का अंधेरा मिटाने एक ज्योति जलती है. ऐसा बहुतों के साथ नहीं है. शायद भारत में और कोई परिवार नहीं होगा जिसके साथ ऐसा हुआ होगा. इसलिए इसने ठान लिया है कि चाहे आगे कुछ भी हो. ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा, पराजय होगी. इतिहास में गुमनाम हो जाएंगे. कोई साथ नहीं चलेगा. तब भी क्या फर्क पड़ता है ! एकला चलो का पाठ इसको मालूम है. इसकी निगाहें साफ हैं. इसका दिमाग बिल्कुल विकार रहित है. यह सीखने को लालायित है. साथीपन का भाव इसमें विकसित हो रहा है. यह कुछ नया करना चाहता है. इसे षड्यंत्र से डर नहीं लगता. यह अपनी आत्मा के साथ रहता है. बहुत ज़्यादा दूसरों से पूछते पूछते अभी थक गया है. अपने आप से बात करता है. इसे सहारे की जरूरत तो है कि जम्हूरियत में एक दूसरे का साथ ही तो जम्हूरियत कहलाता है. लोग कर रहे हैं. हम जैसे लोग दूर बैठकर भी उसको किसी उदार भाव से देख रहे हैं. हम तटस्थ नहीं हैं इसके मामले में. इसकी तरफ हैं. अब आपको जैसा लगे, यह अकेला चना मौजूदा निजाम का भाड़ तो फोड़ सकने की क्षमता रखता होगा. वह दिन बहुत दूर भी नहीं है. दूर भी हो तब भी उसे परवाह नहीं है. उम्र उसके साथ है.
क्यों कर है यह बदहाली ?
कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता के तेवर धीरे धीरे हिन्दू विरोधी प्रचारित किए जा रहे हैं. सबसे बड़े मसीहा गांधी से ज़्यादा हिन्दू तो हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी कोई नहीं था. हिन्दुत्व के केन्द्रीय सामासिक तत्व का इस्लाम, ईसाइयत और बाकी धर्मों से गहरा आत्मीय रिश्ता है. इसे कांग्रेस के कितने कर्णधार पढ़ते और समझते हैं ? पंथनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण समानार्थी अवधारणाएं नहीं हैं. हिन्दू बहुल जनसंख्या कांग्रेस का आधार रही है. उसे यदि हिन्दू संप्रदायवादी दो फाड़ करते हैं तो कांग्रेस गलत बचाव या सॉफ़्ट हिन्दुत्व जैसी गलत आक्रमण की मुद्रा अपनाने के बदले वही थ्योरी क्यों नहीं प्रचारित करती जिसके चलते नेहरू और इन्दिरा युग में कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष विश्वसनीयता पर जनता के मत ने बार बार समर्थन की मुहर लगाई थी.
देश के सरकारी कारखाने दरक गए हैं. संविधान गरीब बच्चों को शिक्षा देने के व्यक्त अव्यक्त ऐलान हैं. जच्चा बच्चा समेत देश के बीमारों, बूढ़ों और मुफलिसों को निःशुल्क चिकित्सा पाने का संवैधानिक अधिकार है. किसान अन्नदाताओं को कहते हैं, आत्महत्या करने वालों को नहीं. श्रमिक यूनियनें संविधान के अनुसार औद्योगिक सत्ता की सहभागी हैं. उन्हें बंधुआ मज़दूरों से भी खराब हालत में सरकारें, उद्योगपति और न्यायालय मिलकर रखते हैं.
विधायिकाओं में एक तिहाई महिला आरक्षण के लिए भी राजनीतिक पार्टियां मध्ययुगीन सामंती आचरण कर रही हैं. शिक्षित नवयुवक रोजगार और नौकरी के अभाव में सरकारी नीतियों के कारण विदेशों में भगाए जा रहे हैं. वहां उनकी हत्याएं की जा रही हैं. पहचान के लिए पैरों में बेड़ियां डाली जा रही हैं. कालाबाज़ारियों को विदेशी बैंकों में अकूत धन जमा करने की कानूनी अनुकूलताएं हैं. कांग्रेस यदि पुरानी नीतियों, कार्यक्रमों, घोषणाओं, योजनाओं और सोच पर नहीं लौटेगी तो केवल गोधरा, सांप्रदायिक, हिन्दुत्व जैसे शब्दों पर कटाक्ष करने से उसे कोई नहीं बचा पाएगा.
कांग्रेस इन दिनों एक आंतरिक मूल्य युद्ध में संलग्न है. ऐसे विचारक हैं जो कह रहे हैं कि चुनाव विकास कार्यक्रमों और जनसंपर्क से नहीं बल्कि मैनेजमेन्ट से जीते जाते हैं. इनका विश्वास है कि जनता ने यह मान लिया है कि भ्रष्टाचार राष्ट्रीय जीवन का लक्षण है. यदि मतदाता को मतदान के पहले आर्थिक प्रलोभन दे दिए जाएं तो उसका चरित्र खरीदा जा सकता है. ऐसा केवल कांग्रेस का विश्वास नहीं है. सभी पार्टियों का है. बाकी पार्टियों ने तो राष्ट्रीय आंदोलन में कोई योगदान नहीं किया. उनसे कांग्रेस की तुलना कैसे हो सकती है ?
कांग्रेस के नेता जमीन पर चलना भूलते जा रहे हैं. उन्हें हवाई जहाजों और हेलीकॉप्टरों में मरना रास आ रहा है. डीज़ल, पेट्रोल की किल्लत के देश में वे बीसियों गाड़ियों का जुलूस बनाकर ही निकलते हैं. उनमें से गांव में कोई नहीं रहता. अपने संसदीय क्षेत्र के भी नहीं. दुर्घटनाएं होने पर वे तस्वीर खिंचवाने अलबत्ता जल्दी पहुंच जाते हैं. अंगरेजों के जमाने के बने जनविरोधी कानूनों की कांग्रेस ने पिछले साठ वर्षों में संगठन के स्तर पर कोई व्यापक समीक्षा नहीं की है. रौलेट ऐक्ट, माउंटबेटन योजना, नमक कानून वगैरह को लेकर गांधी ने कितना संघर्ष किया था. भारतीय दंड संहिता, वन अधिनियम, भू अर्जन अधिनियम, सुखभोग अधिनियम, दंड प्रक्रिया संहिता सहित आजादी के बाद भी जितने जनविरोधी कानून बनाए गए हैं, उनकी शव परीक्षा करने का समय कांग्रेस को अब तक क्यों महसूस नहीं होता. उससे कोई आग जले ही-कहा नहीं जा सकता.
चुनावों के बाद
पार्टी संगठन वर्षों से लुंजपुंज है. चिकने चुपड़े चेहरों को टीवी चैनलों पर प्रवक्ता बना दिया जाता रहा. पार्टी खादी के वस्त्रों में नहीं है. उसे केवल कांग्रेस सेवादल के कार्यकर्ता और भृत्य आदि पहनते हैं. कई प्रसिद्ध नेता सार्वजनिक जगहों पर प्रतिष्ठित पियक्कड़ों की पहचान रखने लगे. भ्रष्टाचार पार्टी के कई नेताओं का आधार-कार्ड बनता रहा. बीसियों घोटालों में कांग्रेस नेतृत्व की फजीहत होती रही. धीरे धीरे कांग्रेस की सत्ता-राजनीति में किताबों और अक्षरों का अवमूल्यन शुरू हुआ. कांग्रेस अधिवेशनों के अध्यक्षीय भाषणों और कार्य समिति के प्रस्तावों की सर्वकालिकता, ऐतिहासिकता और भविष्य-दृष्टि धुंधलाने लगी.
बाद में कांग्रेस का माहौल बरसाती नमी की तरह ऑक्सीजन की कमी महसूस करने लगा. लोकतंत्र का भविष्य दांव पर चितपट होता रहा. सुप्रीम कोर्ट की सांसों में लोकतंत्र अब तो ज्यादा नहीं धड़क रहा. संविधान की पोथी को विचित्र चुनौतियां दी जा रहीं. कांग्रेस को उस पर लगी कीचड़ सुखाने का वक्त ही नहीं मिल रहा. कांग्रेस उसके आलोचकों के लिए बूढ़ी, थकी और हांफती हुई पार्टी की शक्ल में तब्दील नज़र आती रही है.
विडम्बना है कि जिस कांग्रेस की अगुआई में भारत ने 62 वर्षों तक अपनी आज़ादी का जनयुद्ध लड़ा, वह स्वतंत्रता के स्वर्ण जयंती वर्ष में राष्ट्रीय राजनीति के हाशिये पर खड़ी कर दी गई. ज़्यादा अपमानजनक तो यह हुआ कि दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद की जिस विचारधारा ने आज़ादी की लड़ाई में अवाम के खिलाफ खड़े होकर अंगरेज़ की गुलामी की, उसी पार्टी की ताजपोशी हो गई. कांग्रेस को धीरे धीरे उन विचारधाराओं को अपने साथ बिठाने की जुगत भी बिठानी पड़ती रही जिनका इतिहास बहुत अधिक उज्जवल नहीं रहा है. पार्टी के पास करिश्माई नेतृत्व का संकट भी पैदा हो गया. देश इतिहास और भविष्य फिर भी एक साथ जानना चाहते रहे कि क्या कांग्रेस में वह दमखम बाकी है कि वह सियासत के राजपथ पर अधिकारिक तौर पर चल पायेगी ?
ग्रामीण और पिछले तबके की महिलाएं शराबबंदी के समर्थन में लामबंद हो रही हैं. ज़मीनें बचाने के लिए आदिवासी नक्सली हो रहे हैं. देश की आर्थिक नीतियां बल्कि विदेश नीति भी परावलंबी हो रही है. कांग्रेस का वर्तमान नीति-कथाओं का पुस्तकालय भी नहीं बचा. ऐसे में एकाध प्रदेश में आंदोलन, धरना, भूख हड़ताल, जुलूस या आंदोलन के जरिए इतिहास की कोई नई डगर पगडंडी की तरह भी कैसे बनाई जा सकती है. कांग्रेस दाखिलदफ्तर नहीं हुई है. सूबों में उसकी सरकारें हैं. उसके पास सबसे पुरानी, प्रामाणिक और जनतांत्रिक इतिहास-धरोहर है. देश का स्वास्थ्य चुस्त दुरुस्त रखने के लिए पूर्वजों के समयसिद्ध सियासी नुस्खे हैं. कांग्रेस बड़े जतन से रखा हुआ नीबू का पुराना अचार है. खराब सेहत के लिए वह दवा की तरह गुणकारी होता है. अचार पर लापरवाही की फफूंद पड़ जाए, तो उसे फेंका नहीं जाता. फफूंद नीबू का गुण, लक्षण या अंश नहीं है. उसे साफ करने से अचार की गुणवत्ता उजागर हो उठती है. यदि फफूंद परत दर परत जमती चली जाए, उसे साफ करने में लगातार लापरवाही हो तो मर्तबान में रखा अचार उपयोग करने के लिए संदिग्ध हो जाता है.
दो दिलचस्प परिभाषाएं
छत्तीसगढ़ के पत्रकार रम्मू श्रीवास्तव ने अपने स्कूली जीवन में तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में ‘कांग्रेस‘ शब्द का संधि विच्छेद करते हुए उसे काऩग्रेस कहा था. उनके अनुसार कांग्रेस वह सौन्दर्य है जिसे कानों से सुना जा सकता है लेकिन आंखों से नहीं देखा जा सकता. सकारात्मक अर्थ था कि कांग्रेस में देश के हर परिवार का एक न एक सदस्य ज़रूर है. ऐसी कांग्रेस पार्टी अब कार्यकर्ता आधारित नहीं है. उसे नेताओं ने जनआंदोलन की तरह जीवन्त रखा था. कांग्रेस को कारपोरेट मैनेजमेन्ट की तरह चलाया जा रहा है.
प्रसिद्ध पत्रकार राजेन्द्र माथुर ने कहा था कि कांग्रेस कभी नहीं मरेगी क्योंकि जो भी पार्टी सत्ता में आएगी वही कांग्रेस हो जाएगी. रज्जू बाबू का आशय था कि सरकार चलाने का ढर्रा मंत्रियों और नौकरशाहों की चौकड़ी ने बना ही दिया है. उससे छूटना किसी पार्टी के लिए संभव नहीं है. हालांकि नरेन्द्र मोदी का कांग्रेसमुक्त भारत बनाने का आह्वान बेमानी भी है.
हे वटवृक्ष, बोधिवृक्ष बनो !
कांग्रेस विचार की पार्टी रही है. कांग्रेस सहित राजनीतिक दलों को देश के विचारकों से विमर्श करने में क्यों परहेज होना चाहिए ? लेकिन राजनीतिक दलों के नेता कुंठित हो जाने के कारण ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर फब्तियां कस लेते है, उन्हें पुरस्कृत कर देते हैं, उनके मनोनयन भी हो जाते हैं लेकिन उन्हें जन विमर्श की आधारभूत संरचना-प्रक्रिया से अलग रखा जाता है.





