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दिल्ली के इस स्थान का नाम क्यों पड़ा मजनू का टीला

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मजनू का टीला यह नाम सुन कर लगता है जैसे लैला मजनू वाले मजनू से इसका संबंध होगा । बचपन से इस नाम को सुनता आ रहा हूं । इस जगह को बहुत नजदीक से देखा है। वास्तव में इस नाम का संबंध लैला मजनू कहानी से कतई नहीं है। खैबर पास और माल रोड  ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी के पीछे से एक सड़क अंदर की तरफ जाती है। आगे जाकर आउटर रिंग रोड के पास एक गुरुद्वारा है, जहां किसी ज़माने में गुरुनानक देव जी वहां ठहरे थे, ऐसा कहा जाता है।    सिकन्दर लोधी के शासन के समय 1500 के आसपास अब्दुल्ला नाम का  एक फकीर, ऊंचे टीले पर , यहां यमुना के किनारे रहता था।  वह लोगों को नाव से यमुना पार कराया करता था। उसे लोग मजनू कहते थे। इसी से मजनू का टीला यह जगह कहलाई जाने लगी। वास्तव में  यह सब किंवदंतियां हैं और  उन्हीं के आधार पर यह इतिहास चल रहा है। आज मजनू का टीला तिब्बती शरणार्थियों की बहुत बड़ी कॉलोनी है और उस नाम से प्रसिद्ध है।आज आप को मैं एक ऐसा इतिहास बता रहा हूं जिसे मैंने अपनी आंखो से अपने बचपन में 50 के दशक में देखा है।  मैं छोटा सा था मेरे दादा अपने कंधों पर बिठा कर मुझे मजनू का टीला लेकर आते थे।  गुरुद्वारे से थोड़ी दूर जहां अभी तिब्बत के शरणार्थी लोगों की कॉलोनी है ,वहां उस ज़माने में दूर दूर तक कोई नहीं रहता था। दो चार झोपड़ियां थीं।उस के अलावा खाली ज़मीन थी । अरुणा कॉलोनी भी मेरे सामने बसी थी। उत्तरी दिल्ली में शायद वह सबसे पहली पुनर्वास बस्ती थी जिसमे दिल्ली के झुग्गियों में रहने वाले आसपास के लोगों को वहां बसाया गया था।  मेरी यादाश्त में शायद उस कॉलोनी का उदघाटन करने प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू वहां आए थे। मजनू का टीला  पर उस समय सिर्फ  सिखों का गुरुद्वारा था और थोड़ी दूर पर सिंधी बाबा का स्थान था।इसके अलावा वहां पर  कुछ नहीं दिखलाई देता था सिर्फ मिट्टी और रेत के बवंडर और धूल भरी आंधियां चलती थीं। 1960 के आसपास तिब्बती शरणार्थी  वहां आकर बसने लगे।   यमुना किनारे  ऊंचाई पर सिर्फ एक मीनार दिखलाई देती थी । मुस्लिम संस्कृति की और  लाल पत्थर से बनी हुई  यह पुरानी मीनार एक ऊंचे से टीले पर थी। मैं इस बात को इसलिए जानता हूं  कि वहां  एक लंबा सफेद चोगा पहने एक सिन्धी दरवेश  आकर बस गए थे।  आसपास की पंजाबी बस्तियों के लोग  भी जिनमें मेरे दादा और पिता भी थे, उनके यहां सेवा करने जाते थे। वहां कई बार रात रात भर कीर्तन भजन होता था। जोगी , मुंशी , मांगड़ कई चरित्र मुझे याद हैं जो वहीं रहते थे और भजन कीर्तन करते थे।  ढोलकी, मंजीरे, हारमोनियम  और चिमटे के स्वर की गूंज उस निर्जन में गूंजती रहती थी।  मेरे दादा मुझे भी अपने साथ कंधे पर बिठा कर ले जाते थे और  जब मुझे नींद आने लगती थी ,रात को वहीं मीनार के पास यमुना के किनारे चबूतरे पर चादर बिछा कर मुझे सुला भी देते थे। इन  सिन्धी बाबा का नाम था शहंशाह बाबा गोपालदास तालिब।  धीरे धीरे इनकी मान्यता  बहुत बढ़ गई। हर साल बहुत बड़ा मेला यहां लगता था और पूरे देश से सिन्धी समाज और अन्य लोग यहां इकट्ठे होते थे ।  1974 में मेरे दादा जी का देहांत हुआ । हम लोग पेशावर के पख्तून पंजाबी थे। गैर सिन्धी होते हुए भी  उन गुरु जी के प्रति  हमारे दादा की बहुत आस्था और आदर भाव  था।  मुझे याद है कि मेरे दादा जी की मृत्यु पर सिन्धी बाबा हमारे घर हडसन लेन आए थे और उन के पार्थिव शरीर पर शाल ओढ़ाकर चले गए।  सिन्धी बाबा स्वयं भी इस दुनिया से कब गए मुझे नहीं मालूम।वह मीनार और चबूतरा जिसे मैं बचपन में देखा करता था, वही मजनू का टीला था। शायद कोई इतिहासकार इस पर रोशनी डाल सके कि यह मीनार किस ने बनवाई थी ।
अभी थोड़े दिन पहले मैं आउटर रिंग रोड से गुज़र रहा था। मजनू टीला से जब गुजरा तो मेरी आंखे उस बचपन के दौर से गुजरी और उस जगह को पहचानने और ढूंढने लगी ।  अचानक मेरी दृष्टि तिब्बत के लोगों के बीच उस जगह पर गई जहां लिखा था  ‘ दरवेश अस्थान ‘ । मैंने अपनी गाड़ी वहां मोड़ी। देखा तो गेट को फूलों से सजाया जा रहा था। पता चला सिन्धी बाबा यानि शहंशाह बाबा गोपालदास तालिब  का उस दिन 102 वां जन्मदिवस था, उसकी तैयारी चल रही थी । वहां मैंने पूछा कि यहां एक ऊंची मीनार हुआ करती थी और  सिन्धी बाबा की  एक गुफा भी हुआ करती थी।  पता चला कि वह आज भी है।   मैं वह गुफा देखने गया जिसे मेरे दादा ने फावड़े से खोद खोद कर  उसकी मिट्टी निकाली थी और अन्य सहायको के साथ सिन्धी बाबा के लिए तैय्यार किया था।वहां  सिन्धी बाबा के गुरु स्वर्गीय नेभराज की मूर्ति लगाई गई थी। वहां वह मीनार और गुफा दोनो थे पर दोनो का रूप बदल चुका था। गुफा को सजा दिया गया था । उसके अन्दर सिन्धी बाबा की मूर्ति को भी उनके गुरु की मूर्ति के बगल में स्थापित कर दिया गया था।मैं उस मीनार के पास गया। वह ऊंची मीनार, उसका लाल पत्थरों वाला रूप नही रहा। मैं सोचता था शायद अब वह मीनार नहीं होगी क्योंकि वह कई सौ साल पुरानी थी। उस मीनार को भी प्लास्टर करके पेंट कर दिया गया था।  नीचे यमुना किनारे बाबा की समाधि  बना दी गई थी। वहां जाकर मैंने समाधि पर माथा टेका।  पीछे एक पुरानी किलेनुमा दीवार नजर आई । जब यमुना उफान पर होती थी तो उसका पानी  उन दीवारों से टकराया करता था । मेरे बाऊ जी और दादा जी बहुत अच्छे तैराक थे। उस दीवार से अक्सर यमुना में छलांग लगाते हुए मैंने उनको कई बार देखा था , जब बारिश के बाद यमुना लहरें मारती उस दीवार से टकराती थी। वह नज़ारा मेरी आंखों के सामने आ गया। मैं दूर से चिल्ला चिल्ला कर बोल रहा था  —बाऊ जी, बाऊजी आगे मत जाओ, आगे मत जाओ।  वापिस आकर वह हंसते हुए मेरे पास आते बोलते -घबराओ नहीं। मैं तुम्हारे पास ही हूं। आज यमुना का पानी उस दीवार से बहुत दूर जा चुका है।  वे लोग दूर जा चुके हैं जो मन के बहुत नज़दीक थे। उनकी सिर्फ यादें आती हैं । जीवन की आपाधापी में जैसे सब कुछ खो गया है। आज उस स्थान पर घनी आबादी ,सड़क पर धुंआ और तेज रफ्तार चलती गाडियों का शोर सुनाई देता है। उस शोर में कीर्तन की वह  आवाज दब गई  है जो दादा की पीठ पर या कंधे पर बैठ कर सुनने जाता था

।हरीश खन्ना

Ramswaroop Mantri

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