चंद्रभूषण
एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़कर संसद में पहुंचीं पार्टियां साथ मिलकर कितने दिन सरकार चला पाएंगी? यह सवाल नेपाल में बीते दिसंबर पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की नई सरकार बनने के साथ ही सबके मन में था। एक तरह से ठीक ही है कि आशंका सच होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। राष्ट्रपति चुनाव ने सरकार बदलने का मौका सीधे-सरल ढंग से मुहैया करा दिया, वरना यही काम कुछ दिन बाद शायद ज्यादा कटुता के साथ होता। मौजूदा राष्ट्रपति विद्या भंडारी का कार्यकाल पूरा हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली ने जिस तरह आम चुनाव से डेढ़ साल पहले नेपाली लोकतंत्र का तमाशा बना छोड़ा था, उसमें एक बड़ी भूमिका विद्या भंडारी की भी थी। ऐसे में राष्ट्रपति पद एक बार और ओली की ही मर्जी पर छोड़ना किसे मंजूर होता?

आम सहमति का दांव
इसमें कोई शक नहीं कि अपनी पुरानी रैडिकल छवि के विपरीत प्रचंड नेपाल की संसदीय राजनीति में परले दर्जे के अवसरवादी साबित हुए हैं। लेकिन अपनी हर कलाबाजी को सिद्धांत के आवरण में लपेटकर प्रस्तुत करने की तकनीकी महारत उनमें सत्ताशीर्ष के बाकी दावेदारों की तुलना में कहीं ज्यादा है। बिना कोई बवाल किए ओली को किनारे लगा देने का तरीका उन्होंने यह निकाला कि राष्ट्रपति पद के चुनाव को लेकर राजनीतिक आम सहमति बनाने का प्रस्ताव रख दिया। ओली का कहना है कि प्रचंड को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उनकी पार्टी राजी ही इस शर्त पर हुई थी कि राष्ट्रपति पद पर उनका उम्मीदवार चुना जाएगा।
- इस पद के लिए ओली की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) की ओर से इसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुभाषचंद्र नेम्बांग की उम्मीदवारी घोषित की गई है, लेकिन अपनी इस मुहिम में यह पार्टी बिल्कुल अकेली है।
- बाकी लगभग सारी पार्टियों ने मिलकर नेपाली कांग्रेस के पुराने नेता रामचंद्र पौडेल का नामांकन किया है और उनका राष्ट्रपति बनना तय है।
- जाहिर है, इस चुनाव के दौरान ही या उसके तुरंत बाद सरकार बदल जाएगी। कुल तीन, या अधिक से अधिक चार महीने का जीवन ही मौजूदा सरकार के हिस्से आएगा।
- जैसी सूचना है, नए सत्ता समीकरण का खाका भी बना लिया गया है। प्रधानमंत्री प्रचंड ही रहेंगे, लेकिन आधे कार्यकाल यानी ढाई साल के लिए।
- फिर एक साल यह पद ओली की पार्टी से अलग होकर बनी माधव नेपाल की नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत समाजवादी) के पास रहेगा।
- अंत के डेढ़ साल प्रधानमंत्री नेपाली कांग्रेस से होगा और पिछली बार की तरह अगला आम चुनाव भी इसी पार्टी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा।
- थोड़ी कोशिश क्षेत्रीय मधेसी भावना को बहलाने की भी की गई है। इस रूप में कि हाल तक सबसे बड़े मधेसी नेता, लेकिन पिछले डेढ़ वर्षों की टूट-फूट के बाद छोटे नजर आ रहे उपेंद्र यादव की जनता समाजवादी पार्टी को अपना उपराष्ट्रपति बनाने का मौका दिया जााएगा।
- बाकी पार्टियों को मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी और सरकारी पद देकर संतुष्ट कर दिया जाएगा।

तर्कसंगत हड़बड़ी
पीछे लौटें और बीते नवंबर में हुए आम चुनाव के बाद नेपाली संसद के स्वरूप पर नजर डालें तो बदलाव की यह हड़बड़ी तर्कसंगत लगने लगती है।
- नेपाल में सरकार का बनना-बिगड़ना 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में तय होता है।
- एक-दूसरे के खिलाफ ध्रुव की तरह खड़ी दोनों बड़ी पार्टियां नेपाली कांग्रेस (89 सीट) और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-एमाले (78 सीट) इसमें आधी तो क्या एक तिहाई सीटें भी नहीं ला सकीं।
- तीसरी पार्टी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओइस्ट सेंटर) के पास 32 सीटें हैं। वह नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव में उतरी थी, लेकिन इस गठबंधन के पास भी अपने दम पर सरकार बनाने लायक सीटें नहीं थीं।
जाहिर है, सरकार बनाने का काम चुनाव बाद ज्यादा बड़ा गठबंधन बनाने के कौशल पर निर्भर करता था। नेपाली कांग्रेस की मुश्किलें ठीक यहीं से शुरू हुईं। नेपाल का यह सबसे पुराना दल गुटबाजी से बुरी तरह ग्रस्त है और बड़ा गठबंधन बनाने की कोशिश में जितनी थोड़ी सी सत्ता उसके हाथ आ पाती, उसमें अपने सारे गुटों को संतुष्ट कर पाना इसके नेतृत्व के लिए असंभव था। ऐसे में पदों के बंटवारे की बातचीत इतनी लंबी खिंचती गई कि ओली ने मौका ताड़ा और समर्थन देकर प्रचंड की सरकार बनवा दी।
केपी शर्मा ओली बहुत मामूली सा गठबंधन बनाकर, यूं कहें कि अकेले ही चुनाव में उतरे थे। लेकिन चुनाव नतीजे आए तो उनकी पार्टी नेपाली कांग्रेस से थोड़ा ही पीछे निकली। जाहिर है, ओली और उनकी पार्टी का अपना जनाधार है। भारत के खिलाफ दम से खड़ी होने वाली एक चीन समर्थक शक्ति के रूप में उन्होंने नेपाली राजनीति में खुद को स्थापित किया है। गठबंधन बनाने में वह प्रचंड और नेपाली कांग्रेस से जरा उन्नीस पड़ते हैं। लेकिन बतौर विपक्ष वह बमगोला साबित हो सकते हैं। नेपाल की आर्थिक स्थिति अभी बहुत अच्छी नहीं है। यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की ज्यादातर छोटी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तरह उसे भी गले से थाम रखा है। इस जकड़न से बाहर निकलने की पहली राजनीतिक शर्त यही है कि नेपाल सरकार अपने तंत्र को मजबूत बनाए और विकास योजनाओं को सख्ती से जमीन पर उतारे।
संतुलित नजरिया
दूसरा मामला दोनों बड़े पड़ोसी मुल्कों के साथ ठीक से निभा ले जाने का है। भारत की कीमत पर चीन से रिश्ता बनाने की कड़वाहट ओली के प्रधानमंत्री रहते नेपाल के हिस्से आ चुकी है। लेकिन चीन की कीमत पर भारत की ठकुरसुहाती गाने में भी समझदारी नहीं है। इस चुनौती के बरक्स प्रचंड और नेपाली कांग्रेस का समीकरण ज्यादा कारगर लगता है, हालांकि नेपाल की राजनीतिक तरलता हमें ज्यादा दूर तक देखने की इजाजत नहीं देती।





