पुष्पा गुप्ता
_फ्रांस की क्रांति के तीन ध्येय वाक्य, भारत के सम्विधान की प्रस्तावना, में अंकित है। हम न्याय की बात भी जोड़ते हैं। हमारा सम्विधान इसे इस तरह परिभाषित करता है : आजादी- विचार, व्यक्त करने, विश्वास आस्था और पूजन कीबराबरी- हैसियत की, अवसरों की, उसे सबके तक पहुचाने की भाईचारा- हर व्यक्ति और राष्ट्र के सम्मान की रक्षा._
लेकिन इसके सबके के पहले एक चीज और जोड़ी है- न्याय। सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से.
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बाकी का सम्विधान महज सरकार के विभिन्न पद, उसके स्वरूप और कार्यविधि तय करता है। सन्सद सुप्रीम है। इसके बाद सम्विधान राष्ट्रपति/ राज्यपाल, उनकी मंत्रिपरिषद, सन्सद/विधानमंडल के गठन, चुनाव आयोग, सीएजी आदि के सिस्टम्स तय करता है।
_सरकारों के दिशा दर्शन को नीति निर्देशक तत्व (DOs) और मौलिक अधिकार (Donts) हैं। सुप्रीम कोर्ट इस पूरी व्यवस्था का वाचडॉग है।_
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यह उद्देशिका हमारे राष्ट्र का पोलिटीकल स्टेटमेंट है। यह व्यवस्था ही हमारा राष्ट्र है। यही वो भारत है, जिसमे हम रहते हैं। यह देश वह अभी 1947 में पैदा हुआ। 1950 से वर्तमान स्वरूप में आया।
_जी हां। यह ठीक है कि इस भूभाग पर हमारे धर्म, जाति, भाषा, कल्चर वाले अनेक राज्य, आते जाते रहे। इस जगह पर मानव इतिहास चार हजार साल पुराना है। असल मे भीमबैठका के गुफा मानव को भी जोड़ लें तो 30 हजार साल पुराना है। पर हम जो हैं, जिस पोलिटीकल यूनिट में रहते हैं, वह महज 70 साल पुराना है।_
लिबर्टी, इक्विटी, फ्रेटर्निटी इस देश मे 70 साल पुरानी ही है।
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राष्ट्र कल्चर नही, वरना सारे अब्राहमिक कल्चर ( यहूदी, क्रिश्चियन, मुसलमान) एक राष्ट्र होते। राष्ट्र एक धर्म वालों का जमावड़ा नही, वरना जितने धर्म, बस उतने ही राष्ट्र होते। राष्ट्र एक मत वालो का जमावड़ा भी नही, वरना सारे कम्युनिस्ट या सारे कैपिटलिस्ट एक एक देश होते।
_थ्रू आउट हिस्ट्री, राष्ट्र दो तरीके से उपजे है। एक राजा की तलवार से, या फिर लोगो ने मिलकर बना लिया, किसी एक आदर्श पर। आधुनिक राष्ट्र, आदर्शों पर बने हैं। लोगो ने मिलकर बनाया है- पूरी दुनिया में लिबर्टी इक्वलिटी फ्रेटर्निटी का बोलबाला है। सिवाय वहां, जहां फ़्यूडल (सामंती) सिस्टम्स बचे है।_
वहां डंडे और बन्दूक का राज है। तलवार का राज है, वहां स्वतंत्रता नही है, बराबरी नही है, भाईचारा नही है।
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तो जब कोई आपको पुराना गौरव (?) याद दिलाये, पुराने राजतंत्रों की शान में कसीदे पढ़े, और बताये की आपका राष्ट्र 4000 साल पुराना है, तुरन्त चेत जाइये।
_वह चुपके से सामंती राज आपके गले उतारना चाहता है। वह बता रहा है कि आजादी, भाईचारा, बराबरी का ये देश बेकार है। वह नही कहेगा, कि 70 साल पहले तक इस धरती में कुछ लोग बड़े थे, और नागरिक महज प्रजा था। कोई बड़ा था, कोई छोटा था, कोई तिरस्कृत था।_
वहां नही थी .. आजादी- विचार, व्यक्त करने, विश्वास आस्था और पूजन की। नही थी बराबरी- हैसियत की, अवसरों की, उसे सबके तक पहुचाने की। नही था भाईचारा- और हर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा की कसम।
नही था न्याय .. सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक.
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_आंखे खोलकर देखिये। जो आपको 4000 साल के गर्व याद दिलाते हैं, खुद गैरबराबरी के पहरुए हैं। वे बोलने की आजादी रोकने के समर्थक हैं, खुल्लमखुल्ला भाईचारे के दुश्मन हैं।_
इससे बचिए। इनकी दी हुई धर्म की परिभाषा से बचिए। क्योकि आपके धर्म मे ईश्वर के नाम के साथ, एक गैरबराबरी की व्यवस्था भी इनबिल्ड थी। आपको ठगकर उस गैरबराबरी की तरफ ले जा रहे हैं, जिसमे लोग कपड़ो से, सरनेम से, वर्ण से पहचाने जाकर तिरस्कृत किये जाने है।
और ये सिर्फ मुस्लिम, सिख, या क्रिश्चियन नही होंगे।
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लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटर्निटी…यह तीन शब्द आधुनिक समाज के निर्माण की नींव है। लेकिन जिनकी दौड़ रिवर्स गियर में है, उनके तिलक, और कुर्ते न देखिये, उनका धर्म न देखिये।
_सम्विधान को देखिये। इसकी रक्षा के लिए खड़े होईये। क्योकि यह मानवीय है, इसमे सारी दुनिया और सारे इतिहास के आदर्श समाये हैं। इस खूबसूरत सम्विधान की उम्र महज 75-80 साल नही होनी चाहिए।_
स्वतंत्रता, बराबरी , भाईचारे का ये सच हमारी पीढ़ी के हाथों खत्म नही होना चाहिए।
(चेतना विकास मिशन)





