वीरेंदर भाटिया
देश राम मय है। है नही बल्कि कर दिया गया है। देश का धन संसाधन वर्कफ़ोर्स सब इस तरफ मोड़ दी गयी है। गाया जा रहा है कि मेरी झोंपडी के भाग खुल जाएंगे , राम आएंगे।
हम उस आधुनिक युग मे हैं जहां स्टेट का कोई अर्थ है। स्टेट की कोई जिम्मेदारी है। स्टेट का यानी सरकार का काम है और था कि वह झोंपडी के भाग खोले। गरीब को गरीब न रहने से। अंतिम आदमी तक सुविधा भेजे, रोजगार भेजे, सम्मान जनक जीवन जीने लायक व्यवस्था बनाये। श्री राम का काम नही है झोंपडी के भाग खोलने का। लेकिन सत्ता पिछले दस साल की नाकामी को राम की आड़ में छिपाकर बेहद चालाकी के साथ हमे उस युग मे ले गई है जहां राजा अपनी मौज मस्ती में रहता था और निरीह जनता मंदिरों में याचना करती पिसती रहती थी। आज भी चुने हुए प्रधानमंत्री कभी मेले में घूम रहे हैं कभी समंदर में गोते खेल रहे हैं और महंगाई बेरोजगारी सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है। सरकार खुद सार्वजनिक मंचो से असंख्य बार कह चुकी है कि वे 80 करोड़ गरीबो को अन्न उपलब्ध करवाती है। उन 80 करोड़ लोगों तक यदि आपके 10 साल के शासन में या पूरे 70 बरस की आज़ादी में विकास नही पहुंचा तो देश की चुनी गई सरकारों को आईना लेकर उसमे खुद का चेहरा देखना चाहिए कि आधुनिक युग के लायक आपका विजन नही है जो देश के अंतिम व्यक्ति तक आपका विकास पहुंच पाता। बाकी सरकारें यदि काम नही करती थीं तो जनता के सामने आती थीं। जनता उन्हें दंडित करती थी। मौजूदा सरकार श्री राम की आड़ में छिप जाती है जैसे कि श्री राम को लाना इनकी जिम्मेदारी थी और बाकी की जिम्मेदारी श्री राम की है ।
आधुनिक भारत मे 60 प्रतिशत आबादी युवा आबादी है। विजन वाली सरकार युवा आबादी के हाथ काम देती है। काम से देश मे मांग की आपूर्ति को पूरा किया जाता है। विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश अपने उत्पादन को निर्यात कर सकता था लेकिन पिछले दस सालों में हमारा आयात बिल निर्यात बिल से बड़ा हुआ है। जनता तेल सिलेंडर महंगा खरीद रही है फिर भी देश पर कर्ज बढ़ रहा है ।हर चीज में gst काटी जा रही है फिर भी देश पर कर्ज चढ़ रहा है। जनता घर से निकलती है तो टैक्स देना शुरू करती है। घर लौटती है तो टैक्स देती है लेकिन आपका बजटीय घाटा है कि बढ़ता ही जा रहा है । 2016 नोटवंदी तक देश मे 17 लाख करोड़ की मुद्रा थी। 2023 के अक्टूबर में 33 लाख करोड़ की कैश मुद्रा हो गई। डिजिटल इंडिया बनाने वाली सरकार भयंकर तरीके से नोट छापने में लग गयी। लोग सड़कों को विकास कहने लगे। शेयर बाजार के बढ़ने को विकास कहने लगे। लेकिन न किसी को बेरोजगारी की दर देखने दी गई न ही महंगाई पर सोचने दिया गया। बाकी जो बचा था वह श्री राम की आड़ में छिपा लिया गया। और अब तो सरेआम उच्चारित किया जा रहा है कि राम आएंगे तो झोंपडी के भाग जागेंगे। खुद निजाम राम के भरोसे है तो बाकी का क्या ही कहिएगा।





