देश के कामगारों और मेहनतकश जनता द्वारा विरोध के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा चार श्रम संहिताओं को 21 नवंबर को अधिसूचित करने के खिलाफ और श्रम शक्ति नीति 2025 को वापस लिए जाने की मांग को लेकर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साझा मंच और स्वतंत्र औद्योगिक फेडरेशनों ने संयुक्त किसान मोर्चा के साथ मिल कर 26 नवंबर 2025 को देश भर में प्रतिवाद और अवज्ञा दिवस के रूप में मनाया।
इसके तहत झारखंड के सभी जिलों के चौक चौराहों व सामाजिक स्थलों पर केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों एवं स्वतंत्र कर्मचारी संगठनों ने प्रदर्शन किए और लेबर कोड की प्रति जलायी।
लोहरदगा जिला मुख्यालय के समाहरणालय के पास स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की मूर्ति के समक्ष उक्त चार श्रम संहिताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम में एसआईआर एवं साम्प्रदायिकता का भी विरोध किया गया और रिक्त पदों पर परमानेन्ट सरकारी नौकरी की भी मांग की गई।
दस केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों एवं स्वतंत्र कर्मचारी संगठनों के निर्णयानुसार राष्ट्रव्यापी विरोध दिवस के अवसर पर झारखण्ड के सभी जिलों में 04 लेबर कोड का प्रति जलायी गई, वहीं संविधान को भारत की आत्मा बताते हुए सभी ट्रेड यूनियनों के कार्यकर्ताओं के द्वारा प्रस्तावना का पाठ करते हुए उसे बचाने का संकल्प लिया गया।
इस अवसर पर बताया गया कि अमेरिका के शिकागो शहर में 1886 में मजदूरों की कुर्बानी के बदौलत 8 घंटा काम, 8 घंटा आराम और 8 घंटा मनोरंजन के मिले अधिकार को भारत सरकार पूंजीपतियों के हित में छीन कर 12 घंटा का काम लेने का फरमान जारी कर दिया है, उससे पूंजीपतियों की आमदनी में इजाफा तथा मजदूरों की सेहत में गिरावट आयेगी, जिसका असर कालान्तर में सरकारी तथा प्राइवेट कर्मचारियों पर भी पड़ेगा।
कर्मचारीगण फिर से प्रेमचन्द के समझू साहू के बैल के समान जीवन जीने के लिए बाध्य हो जायेंगे, क्योंकि 1886 के मजदूरों का संघर्ष से समूची दुनिया के मेहनतकशों को लाभ मिल सकता है तो भविष्य में उक्त गलत नीतियों का प्रभाव पड़ना अवश्यंभावी है।
इस अवसर पर ऐक्टू राज्य सचिव सह राष्ट्रीय पार्षद, (दिल्ली) के महेश कुमार सिंह ने कहा कि सरकार का फैसला है कि महिलाओं को रात में भी ड्यूटी करना पड़ेगा। तब यह भी सोचना आवश्यक है कि जब दिन में ही महिलाकर्मी सुरक्षित नहीं हैं तो रात ड्यूटी में वह कैसे सुरक्षित रहेगी?
उन्होंने कहा कि वैसे सरकार का महिला सशक्तिकरण का नारा तो टांप-टांय फिस हो चुका है, क्योंकि अनेक बलात्कारी एमपी, एमएलए सत्तारूढ़/ गैर सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों में ऊंचे ओहदों पर तैनात हो, स्वच्छंद हो, दिन-रात खुलेआम घूम रहे हैं।
उन्होंने आगे कहा कि सरकार कहती है कि महिला कर्मियों को पुरूष कर्मियों के बराबर वेतन दिया जायगा। तो बता दें कि वर्ष 2014 से आज तक पूंजीपतियों की चाकरी में विपक्ष की महिलाओं के साथ-साथ सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली महिलाओं का भी शोषण-दोहन सरकार करवा रही थी।
इतना ही नहीं किसी भी संस्थान में 100 से कम मजदूर/कर्मी को सुरक्षा, स्वास्थ्य, बाल बच्चों को शिक्षा से वंचित रखने का कोड क्यों जारी करना चाहती है? क्या 100 से कम वाले संस्थान के मजदूर आदमी की श्रेणी से बाहर अर्थात जानवर की श्रेणी की गिनती में आयेंगे? इससे तो स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार देश में फिर से सामंती व्यवस्था लागू करना चाहती है।
इसलिए ऐक्टू ने चारो लेबर कोड को गुलामी का दस्तावेज कहा है, तो सीटू ने इसे अंग्रेजों के कदम पर चलने का मुखापेक्षी कहते हुए इसके खिलाफ अंतिम क्षण तक लड़ाई लड़ने का आह्वान किया है।
झारखण्ड राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के नेता संयुक्त सचिव सुधीर उराँव ने चार लेबर कोड की प्रति को जलाया तथा चारो लेबर कोड को वापस लेने की मांग की।
एक-एक कर सभी सहभागियों ने बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की मूर्ति पर माल्यार्पण किया तथा संयुक्त रूप से भारत के संविधान का सामूहिक रूप से पाठ कर संकल्प लिया।
भाकपा माले ने भी ट्रेड यूनियनों के संघर्ष का समर्थन किया तथा मजदूरों को इसके खिलाफ सतत संघर्षशील रहने की अपील करते हुए संविधान की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध रहने को कहा।





