लिखना एक अद्भुत कला है !
तुम जो देखो – चाहो लिख डालो !
तुम चाहो तो भोर,उषा या प्रभात के सौंदर्य का चित्रण कर डालो !
तुम चाहो तो कूकडे़ की कूकडुकूं,
चिड़िया की चहचहाहट और मोरनृत्य का ही वर्णन कर डालो !
तुम चाहो तो रवि की प्रेममयी रश्मियों की नवचेतना रूपी प्रेरणा को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो प्रभात – भ्रमण और व्यायाम – प्राणायाम को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो नाश्ते की रेसिपी ही लिख डालो !
तुम चाहो तो काम हेतु आते – जाते लोगों की आवाजाही का विवरण ही लिख डालो !
तुम चाहो तो बच्चे – मां – बाप,गुरू – शिष्य, सेठ – नौकर के संवाद को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो भरी दोपहर की चिलचिलाती धूप की बेचेनी ही लिख डालो !
तुम चाहो तो खाने के स्वाद के बारे में ही लिख डालो !
तुम चाहो तो इधर – उधर डोलते मन के भटकाव को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो घर लौटते मवेशियों पर भी लिख डालो !
तुम चाहो तो गोधूलि बेला के सौंदर्य का चित्रण कर डालो !
तुम चाहो तो चंदा – सूरज – सितारों की चमचमाहट और टिमटिमाहट का ही वर्णन कर डालो !
तुम चाहो तो अपनी दिनचर्या का भी बखान कर डालो !
तुम चाहो तो बगिया के सौंदर्य,फूलों की मुस्कुराहट और बच्चों के खेल को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो माता-पिता,गुरू – संतों के सानिध्य और महिमा को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो धर्म – कर्म सुधार और महापुरुषों के जीवन के बारे में ही लिख डालो !
तुम चाहो तो प्रोत्साहन या मार्गदर्शन की कोई बात ही बता डालो !
तुम चाहो तो नैतिकता और इंसानियत का कोई पाठ ही पढ़ा डालो !
तुम चाहो तो सामाजिक, आर्थिक या राजनैतिक किसी भी मुद्दे पर लिख डालो !
तुम चाहो तो अपने रात के सपने को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो अपने खुशी या गम या लोगों की चालाकियों को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो गर्मी की तपन या कड़कडा़ते ठंडी का ही वर्णन कर डालो !
तुम चाहो तो मेघगर्जना और बिजली की चमक का ही उल्लेख कर डालो !
तुम चाहो तो तूफानी हवाओं और बारिश की बूंदों को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो अकाल – बाढ़ – बीमारी की आपदा और त्रासदी की विडंबना को ही समझा डालो !
तुम चाहो तो किसी आंखों देखी अनहोनी को ही लिख डालो !
तुम चाहो तो भारतीय समाज और इस देश की विगत गुलामी और सामाजिक बुराइयों यथा जातिवादी और धार्मिक वैमनस्यता,ऊँच-नीच,भेद-भाव,छूआ-छूत,वर्ण,दहेजप्रथा, अशिक्षा,भूखमरी,बेरोजगारी,गरीबी,नेताओं की निकृष्ट मानसिकता,उनकी विलासिता,उनकी चरित्रहीनता,उनकी लंपटता,उनका दोगलापन उनकी दंगाजीवी कुटिलताभरी मानसिकता,दहेज प्रथा,कथित उच्च जाति के गुँडों द्वारा दलित बेटियों के साथ करने वाले बलात्कार व हत्याओं जैसे दरिंदगी के खिलाफ ही लिख डालो !
लिखने में मन बिल्कुल व्यस्त व मस्त रहता,कोई बुरा ख्याल भी तो नहीं आता !
मुझे मेरे दादाजी और नानाजी बोलते थे कि
‘या तो ऐसा काम करना जो लिखने में आ जाए ,
या ऐसा लिखना जो दुनिया पढ़ती ही रह जाए ! ‘
इसलिए कर जोड़ भावना विनती करती, अरे भाइयों – बहनों कुछ न कुछ तो अवश्य लिख डालो !
लिखना एक अद्भुत कला है,
जो देखो – चाहो वह लिख डालो !
लेकिन लिखते वक्त बस इतना ध्यान रखना.. लिखना वही,जिसमें इस धरती के सभी गरीबों-मजलूमों-दलितों,गरीब आदिवासियों,आत्महत्या करते किसानों-बेरोजगारी से त्रस्त युवाओं-मजदूरों-रेहड़ी-पटरीवालों-सभी आमजन आदि सभी मानवों सहित,इसके समस्त पर्यावरण और इसके समस्त जैवमण्डल आदि सहित सभी के लिए मंगलकारी,सुखकारी बातें ही हों ! इस भारतीय समाज और देश को जातीय व धार्मिक खाँचों में में बाँटनेवाली व नफरत के बिषबीज बोनेवाली बातें कतई ना हों !
साभार - सुप्रसिद्ध लेखिका भावना मंगलमुखी पाली राजस्थान / बोईसर पालघर महाराष्ट्र,संपर्क - 72493 77116
संकलन व संपादन - निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड, अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक, पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ', गाजियाबाद, उप्र,




