डॉ. प्रिया
_योग का एक सूत्र है..” ऊर्जा संयुक्त है, ऊर्जा एक परिवार है।” जगत में कुछ भी असंबंधित नहीं है” यहां सब जुड़ा है, यहां टूटा कुछ भी नहीं है। यहां पत्थर से आदमी जुड़ा है, जमीन से चांद-तारे जुड़े हैं। चांद-तारों से हमारे हृदय की धड़कनें जुड़ी हैं।_
हमारे विचार सागरों की लहरों से जुड़े हैं, पहाड़ों के ऊपर चमकने वाली बर्फ हमारे मन के भीतर चलने वाले सपनों से जुड़ी है। यहां सब संयुक्त है, यहां अलग-अलग होने का उपाय नहीं है, क्योंकि यहां बीच में गैप नहीं है, जहां से चीजें टूट जाएं। टूटा होना सिर्फ हमारा भ्रम है,यहां सब जुड़ा है।
इसलिए न चेतन अचेतन से टूटा है। न अस्तित्व अनस्तित्व से टूटा है, न पदार्थ मन से टूटा है, न शरीर आत्मा से टूटा है, न परमात्मा प्रकृति से टूटा है।
टूटा होना शब्द ही झूठा है। सब जुड़ा है, संयुक्त है। संयुक्त और इकट्ठा शब्दों से गलती मालूम पड़ती है। क्योंकि ये शब्द हम उनके लिए लाते हैं जो टूटे हुए हैं।
_जैसे एक ही सागर में अनंत लहरें हैं। हर लहर दूसरी लहर से जुड़ी है। आप जिस किनारे पर बैठे हैं, वहां जो लहर आकर टकराती है। वह लहर अंतहीन किनारों से जुड़ी है जो आपको दिखाई भी नहीं पड़ते।_
यहां से, पृथ्वी से दस करोड़ मील दूर पर सूरज है। सूरज ठंडा हो जाए, हम सब ठंडे हो जाएं। हम यह न कह सकेंगे कि ”दस करोड़ मील दूर जो सूरज है। उससे हमारा क्या लेना-देना… हो जाओ ठंडे। हम अपने घर का दीया जला रखेंगे, कोई चिंता नही।
_क्योंकि सारी जीवन-ऊर्जा उस सूरज से आपको मिल रही है। लेकिन वह सूरज भी दूसरे सूरजों से जुड़ा है। महासूर्यों से जुड़ा है। वैज्ञानिक कहते हैं कि अब तक उन्होंने जो गणना की है, वह कई करोड़ सूर्यों की है..और वे सब संयुक्त हैं।_
यह गणना पूरी नहीं है,और न कभी पूरी होगी, क्योंकि इससे आगे, और आगे, और आगे विस्तार है वह अंतहीन है।
इस अनंत विस्तार में सब संयुक्त है। यहां एक फूल भी खिला है, तो वह भी हमसे जुड़ा है; और सड़क के किनारे एक कंकड़ पड़ा है, तो वह भी हमसे जुड़ा है।
_जब इस संयुक्तता को समझेंगे, तो हमारी नाड़ी तो प्रभावित होगी ही, जो चीजें आपके बिल्कुल ख्याल में नहीं आतीं। वे भी प्रभावित हो सकती हैं। उदाहरण के लिए,एक छोटी सी सुई पर एक प्रयोग करें। एक गिलास में पानी भर लें और उस पानी पर कोई भी चिकनी चीज फैला दें।_
थोड़ा तेल फैला दें और एक आलपिन को उस तेल पर तैरा दें। फिर उस गिलास के ऊपर दोनों आंखें गड़ा कर बैठ जाएं, दो मिनट तक आंखें न झपकें। और फिर उस पिन को कहें कि बाएं घूम जाओ! और आप हैरान होंगे कि सुई बाएं घूमती है। कहें, दाएं घूम जाओ.. तो दाएं घूमती है।
आप कहें कि रुक जाओ तो वह रुकती है और आपके इशारे पर चलती है। सुई इसलिए कि आपके पास संकल्प बहुत छोटा है, अन्यथा पहाड़ भी घुमाए जा सकते हैं। सुई और पहाड़ में क्या फर्क है? क्षमता का फर्क होगा, लेकिन सिद्धांत का कोई फर्क नहीं पड़ता है।
_योग कहता है, हम सब जुड़े हैं इसलिए जब एक आदमी बुरा विचार करता है तो आस-पास के लोग तत्काल बुरे होने शुरू हो जाते हैं। उस विचार को प्रकट करने की जरूरत नहीं है। जब एक आदमी अच्छा विचार करता है तो आस-पास एक अच्छे विचार की तरंगें फैलनी शुरू हो जाती हैं।_
अच्छे विचार को प्रकट करने की जरूरत नहीं है। अचानक किसी आदमी के सामने जाकर आपको लगता है कि शांति आ गई। अचानक किसी आदमी के सामने जाकर लगता है कि अशांति फैल गई। किसी रास्ते से गुजरते हैं, लगता है कि जैसे मन हलका हो गया।
किसी रास्ते से गुजरते हैं, लगता है कि जैसे मन भारी हो गया। किसी घर में बैठते हैं और लगता है कि भय पकड़ लेता है। किसी घर में बैठते हैं और लगता है कि हृदय प्रफुल्लित हो जाता है। ये सब चारों तरफ से आ रही तरंगों के परिणाम हैं। ये चारों तरफ से घेर रही तरंगें आपको छू रही हैं।
_ऐसा नहीं है कि यही आपको छू रही हैं, आप भी इन तरंगों को छू रहे हैं। यह पूरे वक्त चल रहा है। इस समस्त के विस्तार के बीच, हम भी ऊर्जा के एक पुंज हैं। और चारों तरफ ऊर्जा के डायनामिक सेंटर्स हैं , वे सब काम में लगे हैं। ये सारे जगत की नियति हम सबकी इकट्ठी नियति है।_
योग के इस सूत्र का अर्थ है कि अपने को अलग देखना पागलपन है, अपने को अलग मानना नासमझी है, अपने को अलग समझ कर जीना अपने हाथ से अपने सिर पर बोझ ढोना है।
_उदाहरण के लिए :_
एक योगी फकीर एक ट्रेन में सवार हुआ और थर्ड क्लास के डिब्बे में जाकर बैठा।
अपनी पेटी सिर पर रख ली, पेटी के ऊपर अपना बिस्तर रख लिया, बिस्तर के ऊपर अपना छाता रख रहा था। इस पर पास-पड़ोस के लोगों ने कहा, ”यह क्या कर रहे हो? नीचे रख दो सामान, आराम से बैठो”। उस योगी ने कहा कि मैं सोचता हूं, टिकिट तो सिर्फ मैंने अपने लिए ली है।
इसलिए ट्रेन पर ज्यादा वजन डालना अनैतिक होगा। इसलिए वजन अपने सिर पर रख रहा हूं। उन लोगों ने कहा, ”पागल हो गए हैं अपने सिर पर रखिए तो भी ट्रेन पर तो वजन पड़ेगा ही। इसलिए नाहक अपने सिर को और वजन क्यों दे रहे हैं?
नीचे रखिए और आप आराम से बैठिए। ट्रेन तो वजन ढोएगी ही चाहे सिर पर रखिए और चाहे नीचे रखिए”। उस फकीर ने कहा कि मैं समझता था ज्ञानी होंगे यहाँ किन्तु अज्ञानी ही है सब। इसपर कोई बोला,’हम समझे नहीं’।
तो फकीर बोला :
_जिंदगी में मैंने सभी लोगों को अपने सिर पर वजन रखे देखा, जो वजन परमात्मा पर छोड़ा जा सकता था। मैंने हर आदमी को सारी चिंताओं का बोझ अपने सिर पर लिए हुए चलते देखा। पहाड़ के पहाड़, जो कि चांद-तारों पर छोड़े जा सकते हैं, जिन्हें कि हवाएं उठा लेतीं।_
लेकिन हर आदमी को मैंने इतनी उदासी और परेशानी से भरा देखा, हर आदमी अपना बोझ लिए चल रहा है। तो मैंने सोचा कहीं आप लोग नाराज न हों, तो मैंने सामान सिर के ऊपर रखा था केवल इस डिब्बे में हीआप ज्ञानी हैं, जहां जिंदगी की गाड़ी का सवाल है। वहां तो आपअपना बोझ अपने सिर पर ही रखते हैं क्योंकि हमारे अतिरिक्त और हम किसके सिर पर रखेंगे”?
योग कहता है, सिर पर बोझ नहीं रखना है। सिर्फ उन्हीं के सिर बोझिल हो जाते हैं जो इस सत्य को नहीं जान पाते । कि जीवन संयुक्त है, जीवन इकट्ठा है। श्वास हवाओं पर निर्भर है। प्राण की गरमी तारों पर, सूर्यों पर निर्भर है। जीवन का होना सृष्टि के क्रम पर निर्भर है।
_मृत्यु का होना जन्म का दूसरा पहलू है। यह सब हो रहा है। हम इस सबको सिर पर उठा कर रख लेते हैं। योग कहता है, अगर हम इसे देख पाएं कि हम एक बड़े जाल के बीच एक छोटे से तंतु से ज्यादा नहीं हैंऔर तब निर्भार हो जाओगे। तब कोई भार नहीं रह जाएगा।_
अब वर्तमान में एक नया शब्द ‘एलिअनेशन’ जोर पकड़ रहा है–अकेलापन, अजनबीपन। हर आदमी को लग रहा है मैं अकेला हूं, कोई साथी नहीं। कभी पतियों को लगता कि पत्नी साथी नही है। कभी पत्नियां समझती कि पति साथी नही। पिता को पक्का नहीं है बेटे का,कि बेटे बहुत दिन साथ देंगे।
बेटे को पक्का नहीं है पिता का.. कुछ पक्का नहीं है ;सब अनिश्चित है। और एक-एक आदमी अकेला हो गया है। इसलिए वर्तमान में इतनी चिंता और इतना बोझ है और एक-एक आदमी दबा जा रहा है। योग कहता है, तुम अकेले हो, यह तुम्हारी नासमझी है। यह जगत इकट्ठा है।
_जिस दिन कोई आदमी ऐसा समझ लेता है कि मैं सबके साथ इकट्ठा हूं, उसी दिन उसके ऊपर चिंता के सारे बोझ तिरोहित हो जाते हैं। उसी दिन वह मुक्त हो जाता है भीतर सब बंधन गिर जाते हैं। बाहर के जगत में जो अचेतन पदार्थ हमें दिखाई पड़ता है, वह भी हमारे चित्त से इतना ही जुड़ा हुआ है।_
जो माली अपने बगीचे के फूलों को प्रेम करता है, क्या आप सोच सकते हैं कि उसके फूल बड़े हो जाते होंगे? उदाहरण के लिए,आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक छोटी सी डेलाबार लेबोरेट्री में फूलों पर बहुत से प्रयोग हुए हैं और हैरान करने वाले हैं प्रयोग।
एक फकीर ने यह कहा कि मैं जिस बीज को आशीर्वाद दे दूं, उसमें बड़े फूल आएंगे। उस प्रयोगशाला में इस पर बहुत से प्रयोग हुए। एक ही पैकेट के बीज एक गमले में डाले गए और दूसरे गमले में डाले गए। एक गमले को फकीर से आशीर्वाद दिलाया गया। और उसने कहा कि इसके फूल बड़े हों।
_इसके अंकुर जल्दी आएंऔर दूसरे गमले को आशीर्वाद नहीं दिया गया। और वैज्ञानिकों ने पूरी कोशिश की कि दोनों गमलों को एक सी सुविधा, एक सा पानी, एक सी धूप, एक सा खाद, सब एक सा मिले। लेकिन आशीर्वाद दिए गए गमले पर बड़े फूल आये।_
यदि एकाध गमले पर ऐसा होता तो समझते कि कोई चालबाजी होगी। यह अनेक गमलों पर प्रयोग किया गया और हर बार यही हुआ। क्या कारण हो सकता ..क्या मनुष्य का चित्त उन बीजों को भी प्रभावित करता है?वास्तव में , चेतना और अचेतना के बीच कहीं भी दीवार नहीं है।
_और जो इस हृदय में प्रतिध्वनित होता है, वह जगत के सब कोनों तक पहुंच जाता है। जो जगत में प्रतिध्वनित होता है, इस हृदय के कोने तक आ जाता है। हम सब इकट्ठे हैं, संयुक्त हैं। सारा जगत एक प्रवाह है ऊर्जा का। उसमें हम एक लहर से ज्यादा नहीं हैं।_
सब जुड़ा है इसलिए जो यहां होता है वह सब जगह फैल जाता है जो सब जगह होता है वह यहां सिकुड़ आता है।
_इस जगत में जो-जो हो रहा है,हम साझीदार हैं, संयुक्त हैं, साझीदार है उसमें कोई अलग-अलग नहीं है। कहीं भी जो हो रहा है, उसमें हम भागीदार है और हम अकेले नहीं हैं।_ ![]()





