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*आदिवासियों की ठहरी हुई पहचान:उदारीकरण की दौड़ में छूट गए आदिवासी* 

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दलितों और पिछड़ों ने बाबासाहेब अंबेडकर, कांशीराम, पेरियार, राममनोहर लोहिया जैसे विचारकों से प्रेरणा लेकर अपने आत्मबोध को विकसित किया। बहुजन चेतना और सामाजिक न्याय के आंदोलनों ने उनमें सामाजिक अस्मिता और स्वाभिमान का भाव पैदा किया। समाज में उनके लिए अपमानजनक शब्दों की जगह अब नए सम्मानजनक नाम हैं; ‘दलित साहित्य’, ‘बहुजन कला’, ‘ओबीसी विमर्श’ जैसे शब्दावलियां उनके बदलते सामाजिक स्वरूप की गवाही देती हैं।इसके उलट, आदिवासी समाज को ‘वनवासी’, ‘गिरिजन’, ‘प्राकृतिक जीवन जीने वाले लोग’ जैसी रूढ़ धारणाओं में कैद कर दिया गया। उन्हें आधुनिकता से जोड़ने की जगह ‘पुरातन’ कहकर महिमामंडित किया गया। उनकी संस्कृति को बचाने के नाम पर उन्हें समाज से काटने का काम हुआ, और उनके आत्मबोध का विकास नहीं होने दिया गया। आदिवासी साहित्य, आदिवासी नायकों और इतिहास की चर्चा अब भी ‘मुख्यधारा’ में नहीं है।

उपेंद्र चौधरी

भारतीय समाज की जातीय संरचना एक जीवंत सामाजिक प्रयोगशाला रही है, जहां राजनीतिक चेतना, सामाजिक आंदोलन और आर्थिक बदलावों ने जातियों की पहचान को निरंतर चुनौती दी है। 1990 के दशक में मंडल राजनीति के उदय और उदारीकरण की आंधी ने समाज के अनेक वर्गों को नया आत्मबोध और अवसर दिए।

आज जब हम कहते हैं कि “90 के दशक के दलित अब दलित नहीं रहे, पिछड़े अब पिछड़े नहीं रहे, सवर्ण अब सवर्ण नहीं रहे”, तब यह सामाजिक गतिशीलता का संकेत है। लेकिन इसी वाक्य का अंतिम हिस्सा—”आदिवासी आज भी आदिवासी हैं”—इस समूचे विकास गाथा की एक करुण विसंगति है। यह विसंगति केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी हमारी नीतियों और चेतना की असफलता का दस्तावेज है।

राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: अदृश्यता की राजनीति

1990 के दशक की मंडल राजनीति ने पिछड़े वर्गों और दलितों को संगठित राजनीतिक आवाज दी। बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पिछड़ों और दलितों की पार्टियां सत्ता में आईं। इन जातियों के नेताओं ने सामाजिक न्याय के नारे को राजनीतिक सत्ता में रूपांतरित किया। वहीं, सवर्णों ने भी धीरे-धीरे भाजपा जैसी पार्टियों के माध्यम से अपनी राजनीतिक पुनर्स्थापना की।

लेकिन, आदिवासी राजनीति इन दोनों धाराओं से कटी-कटी सी रही। झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे क्षेत्रीय दलों ने आदिवासी मुद्दों को उठाया, पर वे भी बाद में भ्रष्टाचार और अवसरवाद में डूब गए। राष्ट्रीय दलों—कांग्रेस और भाजपा—के लिए आदिवासी समुदाय मात्र “वोट बैंक” बनकर रह गया। वन अधिकार क़ानून, PESA, FRA जैसे अधिनियमों की घोषणा तो हुई, लेकिन क्रियान्वयन में गंभीर खामियां रहीं।

आदिवासी अब भी ‘पॉलिटिकल मार्जिन’ पर हैं, जबकि दलित, पिछड़े और सवर्ण अपनी-अपनी राजनीतिक धाराओं के केंद्र में हैं। उनकी पहचान अब वर्ग से अधिक विचारधारा में ढल चुकी है, लेकिन आदिवासियों की पहचान अब भी ‘परिधि’ की है—केवल चुनाव के समय याद किए जाने वाली एक भौगोलिक या सांख्यिकीय इकाई।

सामाजिक परिप्रेक्ष्य: आत्मबोध बनाम ठहराव

दलितों और पिछड़ों ने बाबासाहेब अंबेडकर, कांशीराम, पेरियार, राममनोहर लोहिया जैसे विचारकों से प्रेरणा लेकर अपने आत्मबोध को विकसित किया। बहुजन चेतना और सामाजिक न्याय के आंदोलनों ने उनमें सामाजिक अस्मिता और स्वाभिमान का भाव पैदा किया। समाज में उनके लिए अपमानजनक शब्दों की जगह अब नए सम्मानजनक नाम हैं; ‘दलित साहित्य’, ‘बहुजन कला’, ‘ओबीसी विमर्श’ जैसे शब्दावलियां उनके बदलते सामाजिक स्वरूप की गवाही देती हैं।

इसके उलट, आदिवासी समाज को ‘वनवासी’, ‘गिरिजन’, ‘प्राकृतिक जीवन जीने वाले लोग’ जैसी रूढ़ धारणाओं में कैद कर दिया गया। उन्हें आधुनिकता से जोड़ने की जगह ‘पुरातन’ कहकर महिमामंडित किया गया। उनकी संस्कृति को बचाने के नाम पर उन्हें समाज से काटने का काम हुआ, और उनके आत्मबोध का विकास नहीं होने दिया गया। आदिवासी साहित्य, आदिवासी नायकों और इतिहास की चर्चा अब भी ‘मुख्यधारा’ में नहीं है।

आर्थिक परिप्रेक्ष्य: उदारीकरण की दौड़ में छूट गए आदिवासी

1991 के बाद भारत में आर्थिक उदारीकरण ने नए वर्ग उभरने की शुरुआत की। दलित उद्यमी वर्ग, ओबीसी कारोबारी वर्ग, और नव-सवर्ण पेशेवर वर्ग ने आधुनिक अर्थव्यवस्था में अपना स्थान बनाना शुरू किया। आरक्षण ने नौकरियों और शिक्षा में सामाजिक विविधता लाई।

लेकिन, आदिवासी अर्थव्यवस्था अब भी ‘वस्तु-विनिमय’ और ‘बिचौलियों’ के बीच फंसी हुई है। सरकार द्वारा घोषित विशेष पैकेज, एकलव्य स्कूल, वन उत्पादों की MSP, या आदिवासी सहकारिता संस्थान- ये सब बातें योजनाओं तक सीमित रह गईं। खनन, औद्योगीकरण और बांध परियोजनाओं ने आदिवासियों से उनका जल-जंगल-जमीन छीन लिया, और बदले में उन्हें बेघरी, पलायन, और ‘स्थायी रिफ्यूजी’ जैसी स्थितियां मिलीं।

दलितों ने उद्योगों में प्रवेश पाया, पिछड़े व्यवसाय में आगे बढ़े, सवर्ण नौकरियों और निजी क्षेत्र में वापस लौटे, लेकिन आदिवासी अब भी मजदूर हैं या विस्थापित शरणार्थी।

क्यों नहीं बदली आदिवासियों की स्थिति ?

आदिवासी समाज के नेता मुख्यधारा की राजनीति में या तो अपवाद हैं, या फिर ‘प्रतीकात्मक रूप में प्रयुक्त होते हैं। वे नीति-निर्माण में शामिल नहीं हैं।

संस्कृति को संरक्षण नहीं, सशक्तिकरण चाहिए था: उनकी संस्कृति को ‘संग्रहालय’ में रखने की बजाय उन्हें ‘सांस्कृतिक नीति निर्धारक’ बनाना चाहिए था।

समान विकास की गलत परिभाषा बनाई गई। आदिवासी विकास का अर्थ उनकी जमीन लेकर उन्हें शहरों में बसाना नहीं है, बल्कि उनकी जमीन पर उनके हिसाब से सुविधाओं का निर्माण करना है।

क्या अब भी वक़्त नहीं आया आदिवासियों के पुनराविष्कार का?

जिस तरह दलित अब केवल ‘पीड़ित’ नहीं हैं, बल्कि विचारधारा बन गए हैं; पिछड़े अब ‘बेबस’ नहीं हैं, बल्कि सत्ता-निर्माता बन गए हैं; सवर्ण अब ‘पुरानी व्यवस्था’ नहीं, बल्कि नये पेशेवर हैं—वैसे ही अब आदिवासियों को भी केवल ‘वनवासी’ या ‘आदिकालीन प्रतीक’ मानना बंद करना होगा। उन्हें अपने तरीके से आधुनिक होने का अधिकार देना होगा।

भारत का लोकतंत्र तभी परिपक्व होगा, जब आदिवासी केवल “अनुसूचित जनजाति” नहीं, बल्कि ” ख़ुद से परिभाषित पहचान” बन पाएंगे। तभी  “90 के दशक के दलित अब दलित नहीं रहे, पिछड़े अब पिछड़े नहीं रहे, सवर्ण अब सवर्ण नहीं रहे” का वाक्य पूरा होगा- “अब आदिवासी भी केवल आदिवासी नहीं रहे।”(

Ramswaroop Mantri

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