अग्नि आलोक
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 *कविताएं:पंछी बन जाऊं मैं*

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लता
कपकोट, उत्तराखंड

मैं भी एक पंछी होती,
अपनी मर्जी से खेल पाती,
मुझे भी होती पूरी आज़ादी,
मैं भी कहीं भी घूम पाती,
अपनी मर्जी से सब खा पाती,
इतना ऊँचा मैं उड़ना चाहती,
किसी की सोच तक पहुँच न पाती,
किताबों के पंछी आसमान में उड़ते,
इतनी ऊंची वो उड़ान भरते कि,
फिर नीचे न किसी को देखते,
करते अपने मन की सौ बार,

फड़ फड़ उड़ जाते हर बार।।

सब कुछ कर सकती है बेटियां

सुनीति
कक्षा – 9, उम्र-15
लामाबगड़, उत्तराखंड

बेटियों को देखो वो क्या-क्या नहीं कर रही है,
अपने माता-पिता के लिए सब कुछ कर रही है,
बेटियां भविष्य बन रही है इस जगत में,
डॉक्टर पुलिस इंजीनियर बन रही है बेटियां,
अब तो बहुत कुछ कर रही हैं बेटियां,
देश सेवा के लिए फौजी बन रही है बेटियां,
जब ऑटो रिक्शा चला सकती है बेटियाँ,
हवाई जहाज तक उड़ाती हैं बेटियाँ,
हर काम को साध रही हैं बेटियाँ,
समझो उन्हें किसी से भी कम नही,

अपने हक के लिए लड़ रही है बेटियां।।

बनना मुझे है पुलिस

पावनी
कपकोट, उत्तराखंड

क्यूँ न मैं भी पुलिस बन जाऊँ,
ख़ुद के सपनों को सजा पाऊँ,
खेल के मैदान से पुलिस की रेस तक,
मैं हर रेस में भाग दौड़ कर पाऊँ,
लोगों की बातें छोड़, ख़ुद में खो जाऊं,
क्यूँ न मैं भी पुलिस बन जाऊँ,
उमंगों के साथ आसमान में उड़ जाऊं,
तोड़ कर सब पाबंदियों को,
ख़ुद की एक नई दुनिया बसाऊं,

क्यूँ न मैं भी पुलिस बन जाऊँ।।

वो हंसाती मेरी यादें मुझे

चांदनी
सुराग़, उत्तराखंड

हर पल वो हंसाती मेरी यादें मुझे,
अब कहीं दूर से सुनाई पड़ती हैं,
जो यादें मुझे कभी दिखाई देती थीं,
अब वो किसी धुएं में छिप जाती हैं,
उन यादों के कई पल गुजर जाते हैं,
कुछ पल मुझे आईना दिखा जाती हैं,
मगर उनमें कोई चेहरा न दिखाती हैं,
फिर वो यादें किसी बंद तिज़ोरी में मिल जाती हैं,
वो हँसती मेरी यादें मुझे कही दूर सुनाई देती हैं।।

Ramswaroop Mantri

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