(24 जुलाई 1946 – 5 अगस्त 2025)
5 अगस्त 2025 को दोपहर 1:12 बजे, दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में सत्यपाल मलिक ने अंतिम सांस ली। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन की पुष्टि उनके निजी सचिव के.एस. राणा ने की। सत्यपाल मलिक का जीवन भारतीय राजनीति में एक ऐसे साहसी और बेलौस नेता का उदाहरण था, जिसने सत्ता में रहते हुए भी सच बोलने की हिम्मत दिखाई।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
सत्यपाल मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले के हिसावदा गांव में 24 जुलाई 1946 को हुआ था। जब वे महज़ दो वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण कठिन परिस्थितियों में हुआ, लेकिन उनमें नेतृत्व और संघर्ष की भावना शुरू से ही रही।
राजनीतिक जीवन की शुरुआत
सत्यपाल मलिक ने छात्र राजनीति से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की। मेरठ कॉलेज छात्रसंघ से उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ, और उन्हें लोहिया के समाजवादी विचारों ने गहराई से प्रभावित किया। 1974 में चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल के टिकट पर बागपत विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और मात्र 28 साल की उम्र में विधायक बने।
1980 में वे लोकदल पार्टी से राज्यसभा पहुंचे, लेकिन चार साल बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया—यानी उसी पार्टी में चले गए जिसकी इमरजेंसी नीति के विरोध में वे जेल भी गए थे।
विपक्षी राजनीति से लेकर बीजेपी तक का सफर
1987 में जब बोफोर्स घोटाला सामने आया, तो मलिक ने विश्वनाथ प्रताप सिंह का साथ देते हुए कांग्रेस छोड़ दी और ‘जन मोर्चा’ पार्टी में शामिल हो गए, जो आगे चलकर जनता दल में विलीन हो गई। 1989 में उन्होंने अलीगढ़ से लोकसभा का चुनाव लड़ा और सांसद बने।
1996 में वे समाजवादी पार्टी से दोबारा अलीगढ़ से चुनाव लड़े लेकिन बुरी तरह हार गए—वे चौथे नंबर पर रहे। इस हार ने उनकी जाट नेता की छवि को भी धक्का पहुंचाया।
2004 में वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और अजित सिंह के खिलाफ बागपत से चुनाव लड़ा लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। इसके बावजूद बीजेपी ने उन्हें पार्टी में बनाए रखा। 2005-06 में वे उत्तर प्रदेश बीजेपी के उपाध्यक्ष बने और 2009 में किसान मोर्चा के राष्ट्रीय प्रभारी नियुक्त हुए।
2012 में उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। इस समय बीजेपी उत्तर प्रदेश में जाट चेहरे की तलाश में थी और नरेंद्र मोदी के साथ उनका व्यक्तिगत संवाद और रिश्ता मजबूत हुआ।
राज्यपाल का कार्यकाल
बिहार (2017–2018):
30 सितंबर 2017 को सत्यपाल मलिक को बिहार का राज्यपाल बनाया गया।
जम्मू-कश्मीर (2018–2019):
11 महीने बाद ही अगस्त 2018 में उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल नियुक्त किया गया। उनके कार्यकाल में ही विधानसभा भंग की गई, जिससे राज्य का पूरा प्रशासन उनके हाथ में आ गया।
5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का ऐतिहासिक निर्णय उन्हीं के राज्यपाल रहते हुए लिया गया। सत्यपाल मलिक ने बाद में दावा किया कि उन्हें इस फैसले की जानकारी महज एक दिन पहले ही दी गई थी।
गोवा (2019–2020):
नवंबर 2019 से अगस्त 2020 तक वे गोवा के राज्यपाल रहे।
मेघालय (2020–2022):
इसके बाद अगस्त 2020 से अक्टूबर 2022 तक वे मेघालय के राज्यपाल रहे।
मोदी सरकार की आलोचना और विवाद
किसान आंदोलन:
सत्यपाल मलिक ने कृषि कानूनों और किसान आंदोलन पर केंद्र सरकार की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा, “दिल्ली की सीमाओं पर 700 किसान मर गए और सरकार ने एक चिट्ठी तक नहीं भेजी। तब भी मैंने राज्यपाल होते हुए बोलने का फैसला किया, क्योंकि मेरी आत्मा चुप नहीं रह सकती थी।”
पुलवामा हमला:
14 फरवरी 2019 को हुए पुलवामा हमले के लिए उन्होंने केंद्र सरकार को दोषी ठहराया। उन्होंने बताया कि CRPF ने गृह मंत्रालय से 5 एयरक्राफ्ट की मांग की थी, जो नहीं दी गई, और अगर दी जाती तो यह हमला टल सकता था। उन्होंने यह भी दावा किया कि जब उन्होंने यह बात प्रधानमंत्री मोदी को बताई, तो उन्हें चुप रहने को कहा गया।
भ्रष्टाचार के आरोप:
उन्होंने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर में प्रधानमंत्री के करीबी लोग उनके पास भ्रष्टाचार के प्रस्ताव लेकर आए थे, जिसमें उन्हें ₹300 करोड़ की पेशकश की गई थी। उन्होंने इसे ठुकरा दिया और कहा कि प्रधानमंत्री को इस पर जानकारी देने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
अग्निपथ योजना:
उन्होंने अग्निपथ योजना को सेना के गौरव के खिलाफ बताया और कहा कि यह योजना सेना को अपमानित करने का कार्य करेगी।
विवादित बयान और विवाद
“गवर्नर दारू पीता है और गोल्फ खेलता है” जैसे बयान ने उन्हें मीडिया की सुर्खियों में ला दिया।
2022 में उन्होंने प्रधानमंत्री पर घमंड का आरोप लगाया और कहा, “जब मैंने किसानों की मौत की बात कही, तो प्रधानमंत्री से मेरी लड़ाई हो गई।”
2022 में बागपत में एक किसान सभा में कहा, “मुझे कुत्ते ने नहीं काटा कि मैं राज्यपाल होकर भी पंगा लूं, लेकिन जब 700 किसान मर जाएं तो बोलना जरूरी हो जाता है।”
आखिरी समय और निधन
राजनीतिक और सामाजिक जीवन के अंतिम वर्षों में सत्यपाल मलिक लगातार मोदी सरकार के खिलाफ मुखर रहे। वे सामाजिक न्याय, किसानों के अधिकार और लोकतंत्र की रक्षा की बात खुलकर करते रहे। 5 अगस्त 2025 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। उनके निधन पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त किया।
सत्यपाल मलिक का जीवन भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण था—जहाँ एक व्यक्ति सत्ता में रहकर भी सच बोलने की हिम्मत रखता था। वे किसी भी दल के कठपुतली नहीं बने और हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे। उनका लोहियावादी समाजवाद, किसानों के प्रति समर्पण और सत्ता के खिलाफ सच बोलने की हिम्मत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है।
“जिसने झुका नहीं, वही इतिहास बना गया।”





