एल.एस. हरदेनिया
देश के सर्वाधिक आयु प्राप्त करने वाले कम्युनिस्ट नेता वी.एस. अच्युतानंदन हमारे बीच में अब नहीं रहे। हमारे देश में शायद ही किसी राजनीतिक नेता ने इतनी आयु पाई हो जितनी अच्युतानंदन ने पाई। 101 वर्ष के ऊपर अच्युतानंदन ने केरल के एक अस्पताल में अंतिम सांसें लीं।
इस महान नेता से मुलाकात करने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। कुछ वर्षों पूर्व केरल के प्रवास के दौरान मुझे उनके दर्शन करने का सौभाग्य मिला था। शायद ही कोई नेता इतनी लोकप्रियता प्राप्त कर सकता हो जितनी अच्युतानंदन ने अपने गृह राज्य केरल में पाई। उनका पूरा जीवन संघर्ष में बीता। बात कितनी भी कड़वी हो उसे कहने में वो नहीं हिचकिचाते थे। 18 साल की छोटी उम्र से उन्होंने एक के बाद एक संघर्ष किए।
केरल में यात्रा के दौरान मैंने उनसे मुलाकात करना चाही। टेलीफोन पर संपर्क करने पर मुझे बताया गया कि अभी हाल में उनकी आँख का ऑपरेशन हुआ है इसलिए वे मिलने में असमर्थ हैं। परंतु जब मैंने उनके स्टॉफ को यह बताया कि मैं भोपाल से आया हूँ और एक पत्रकार हूँ तब उन्होंने मुझे मिलने का समय दिया।
मैं जिस समय उनसे मिला उस समय वे केरल असेम्बली में प्रतिपक्ष के नेता थे। जब मैंने उनके बंगले में प्रवेश किया तो पूरा बंगला खाली-खाली नजर आ रहा था। बड़े-बड़े कमरों में नाममात्र का फर्नीचर था। मुझे बताया गया कि वे फर्श पर ही सोते हैं। प्रतिपक्ष के नेता के साथ वे केरल के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। मैंने उनसे पूछा कि आप इतने बड़े पद पर हैं परंतु उसके अनुरूप आपके पास फर्नीचर क्यों नहीं है? उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति को जितना फर्नीचर चाहिए उतना मेरे पास है। लंबी बातचीत में उन्होंने अपने संघर्ष की गाथा भी मुझे सुनाई। पोन घंटे तक चली बातचीत के दौरान मैंने उनसे कहा कि कामरेड आप मुझे कॉफी नहीं पिलाएंगे? उनका उत्तर था कि यदि एक नेता उनसे मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को कॉफी पिलाएगा तो उसके लिए उसके पास लाखों रूपए होने चाहिए। मैं अपने मिलने वालों को सिर्फ बातचीत की ही कॉफी पिलाता हूँ।
अच्युतानंदन एक ऐसे नेता थे जो अपनी पार्टी के भीतर भी विरोध की आवाज़ उठाने में नहीं हिचकिचाते थे। अनेक अवसरों पर उनकी पार्टी ने कोई गलत रास्ता लिया तो वे उसके विरूद्ध भी खड़े हो जाते थे। वे सीपीएम की स्थापना करने वाले नेताओं में से थे। परंतु उसी सीपीएम ने दो बार उन्हें अपने पोलिटब्यूरो से बहिष्कृत किया था।
इंडियन एक्सप्रेस से उन्होंने अपने संघर्ष के संबंध में कहा ‘‘अपने लंबे पॉलिटिकल केरियर के दौरान उन्हें अनेक बार अपनी पार्टी के गुस्से का सामना करना पड़ा, परंतु पार्टी ने शीर्घ ही यह महसूस किया कि उनके बिना पार्टी की लोकप्रियता कायम नहीं रखी जा सकती है। यद्यपि उनका परिवार था, उन्होंने कभी अपने परिवार के सदस्यों को उन्हें मिली सुविधाओं का लाभ नहीं उठाने दिया। अपने जीवनकाल में उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा।’’
(एल.एस. हरदेनिया सेकुलर फ्रंट के संयोजक हैं)





