सोनी कुमारी, वाराणसी
बचपन की यादें दुनिया को समझने में अज़ीज़ की मददगार थीं। बेशक़, ऐसा सबके साथ होता होगा। दादा आदम को छोड़कर। धरती पर पहले इन्सान होने के नाते, उनका तो कोई बचपन भी नहीं था। (नाभि भी नहीं थी। हा, हा, हा, अज़ीज़ मन ही मन हँसा।) अज़ीज़ को बचपन की याद दिलाने वाली कोई भी चीज़ आसानी से पसन्द आ जाती थी। इसीलिए उसे मुम्बई पसन्द थी। अगर आप मट्टनचेरी को समतल कर दें, तो आपको मुम्बई मिल जाएगी। वार्डन रोड पर जिस फ्लैट में वह रहता था, उसके मालिक बुज़ुर्ग दम्पति भी उसे पसन्द थे। अगर शकूर साहब अपनी शानदार, सफ़ेद होती मूँछों और शरारती आँखों से एयर इंडिया महाराजा की याद दिलाते थे, तो अम्मीजान के गालों में पड़ने वाले बड़े-बड़े गड्ढों से उसे अपनी पसंदीदा अभिनेत्री, केपीएसी ललिता की याद आती थी।
हमेशा की तरह उस दिन भी, सुबह-सुबह धुली हुई टैक्सियों को देखकर अज़ीज़ खुशी से भर गया। दूसरे शहरों की तरह मुम्बई की टैक्सियाँ भारी-भरकम एम्बेसडर नहीं थीं। वे फ़िएट थीं, बिल्कुल टैबी बिल्लियों की तरह जो सहलाए और दुलराए जाने का इन्तज़ार कर रही हों।
टैक्सी में बैठते ही अज़ीज़ ने अख़बार खोला। पहले पन्ने की सुर्ख़ियों पर उड़ती-सी नज़र डालकर वह शेयर बाज़ार वाले सेक्शन पर चला गया। वह आँकड़ों से भरे कॉलमों में डूबा हुआ था पर अचानक उसका ध्यान गया कि पन्ने हवा में फड़फड़ा रहे हैं और उसे एहसास हुआ कि वे समुद्र के किनारे से गुज़र रहे हैं। अज़ीज़ ने सामने विंडस्क्रीन पर लगी हरी सन-स्क्रीन के पार चौपाटी का समन्दर देखा। हरा समन्दर आदिम, ताज़ा बना हुआ लग रहा था, जैसे उत्पत्ति के समय का हो। अज़ीज़ को सन-स्क्रीन पर लगे हिन्दी स्टिकर को समझने में थोड़ा वक़्त लगा। छलाँग मारते हुए बाघ पर पीले अक्षरों में लिखा था, गर्व से कहो हम हिन्दू हैं।
एक के बाद एक लाल बत्ती पर रुकती हुई टैक्सी आगे बढ़ती रही और अज़ीज़ चुनावों के बाद सुस्ताने के अन्दाज़ में शिथिल पड़ी मुम्बई के बारे में सोचने लगा। हाथ, कमल, धनुष-बाण, नाव, रेल इंजन – दीवारों पर बने निशानों ने शहर को एक पहली कक्षा की पाठ्यपुस्तक में बदल दिया था। सरकार में कोई भी बदलाव का असर सबसे पहले सेंसेक्स पर पड़ता था। ये न होता, तो अज़ीज़ और उसके सहकर्मियों, कम्पनी के दूसरे सेल्स इंजीनियरों को शायद नयी सरकार के बारे में पता भी नहीं चलता। यह विचार अज़ीज़ के मन में पिछले दिन आया था, जब प्रदीप पिल्लई ने लंच के दौरान घोषणा की थी, “सरकार बदल गयी है।”
“तो?” यह था ज्योति प्रसाद श्रीवास्तव, एक और सेल्स इंजीनियर।
“और भी बहुत कुछ बदलेगा…” प्रदीप पिल्लई ने कहा।
“क्या मतलब है तुम्हारा? क्या नयी सरकार उन टेंडरों को खारिज कर देगी जो हमें इतनी मुश्किल से मिले हैं?” समूह में सबसे बुज़ुर्ग जयन्त करमरकर ने पूछा।
“और भी बहुत कुछ…” प्रदीप पिल्लई ने कहा। अज़ीज़ को लगा था कि पिल्लई जानबूझकर रहस्य बनाने की कोशिश कर रहा है।
जब तक टैक्सी नरीमन पॉइंट पर उस बहुमंजिला इमारत के सामने रुकी, जहाँ वह काम करता था, अज़ीज़ ने गम्भीर सोच-विचार के बाद तय कर लिया था कि कुछ भी नहीं बदलने वाला। उपनगरीय ट्रेनें मुम्बई को चीरती हुई अभी भी चल रही थीं । सेंसेक्स में जान आ गयी थी। चर्च गेट पर उतरने वाले यात्रियों की भीड़ हमेशा की तरह बिना दाएँ-बाएँ देखे आगे बढ़ी जा रही थी, उनमें से आधे अपने गुप्तांग खुजला रहे थे। (हमेशा की तरह, हा, हा।) तमाम टिफ़िन कैरियर डिब्बेवालों की साइकिलों पर सवार होकर विभिन्न लंच टेबलों की अपनी मंज़िल की ओर जा रहे थे। और यही वह समय था जब रात की शिफ़्ट के बाद देर तक सोने वाले लोग जागते थे और अगर उनकी पत्नियाँ घर पर नहीं होतीं, तो घर के काम निपटाने आई कांताबाई को गले लगाने की कोशिश करते थे।
दफ़्तर में अपने कमरे में पहुँचते ही अज़ीज़ ने मेज़ पर पड़ी अपनी पासपोर्ट साइज़ की तस्वीरें देखीं। तमाम पासपोर्ट तस्वीरों की तरह, वे भी पराई लग रही थीं, बिल्कुल उस अज़ीज़ की तरह जिसे वह हर सुबह आईने में देखता था। उसने अपने पासपोर्ट आवेदन का फ़ॉर्म भरना शुरू किया। वह उसके नीले पन्नों को बहुत धीरे-धीरे भर रहा था। उसे कम्पनी के प्रतिनिधि के तौर पर फ़्रैंकफ़र्ट की औद्योगिक प्रदर्शनी में भेजा जा रहा था।
जब तक उसने भरा हुआ फ़ॉर्म ट्रैवल एजेंट को भेजा, लंच के लिए बाहर गए उसके सहकर्मी वापस आने लगे थे। उन्हें असामान्य रूप से ऊँची आवाज़ में बात करते सुनकर अज़ीज़ ने अन्दाज़ा लगाया कि रिलायंस या एसीसी के शेयरों की क़ीमतें या तो तेज़ी से बढ़ी होंगी या गिरी होंगी।
“अब बताओ अज़ीज़,” ज्योति प्रसाद श्रीवास्तव ने कमरे में दाख़िल होते ही पूछा, “ये करमरकर कहता है कि नयी सरकार का यह बयान क्रूर है कि वे विदेशियों को बाहर निकाल देंगे। क्या ग़लत है उनके स्टैंड में?”
“कुछ नहीं!” अज़ीज़ ने जवाब दिया। “सारे देश उन विदेशियों को वापस भेज देते हैं जिनके पास वीज़ा नहीं होता। हम क्यों न भेजें?”
“ये राजनीति है। तुम लोग इसे नहीं समझोगे,” करमारकर ने ग़ुस्से से जवाब दिया।
“हमें तो बस स्टॉक मार्केट ही समझ आता है। इन राजनीतिक बहसों में समय बर्बाद करने के बजाय, चलो उसी से कुछ पैसे कमाने की कोशिश करें…” प्रदीप पिल्लई ने कमरे से बाहर जाते हुए कहा।
बाकी लोग भी उसके पीछे-पीछे निकल गये।
अज़ीज़ ने आँखों को आराम देने के लिए थोड़ी देर को बन्द कर लिया। तभी ट्रैवल एजेंट का फ़ोन आया। “अज़ीज़ भाई, आपको अपने राशन कार्ड की एक फोटोकॉपी तुरन्त भेजनी होगी।”
“लेकिन, मेरे पास तो है ही नहीं।”
“तो बनवा लीजिए। तुरन्त।”
“पासपोर्ट के लिए कितनी मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं! अब क्या मुझे राशन में मिलने वाला चावल भी खाना पड़ेगा?”
“नहीं, इसकी ज़रूरत नहीं है। लेकिन पासपोर्ट अप्लिकेशन के साथ रेज़िडेंस प्रूफ़ के तौर पर कार्ड की एक कॉपी लगानी होगी।”
“तो मुझे क्या करना होगा?”
“सप्लाई ऑफ़िस जाकर एक अप्लिकेशन फॉर्म भर दीजिए। कुछ दिनों बाद एक इंस्पेक्टर आपके घर आयेगा। आजकल उनका रेट एक गाँधी है। आपको दो दिन में कार्ड मिल जायेगा। आसान है।”
हर इतवार की तरह, उस दिन भी अज़ीज़ वीसीआर के सामने बैठा राज कपूर की पुरानी फ़िल्में देख रहा था। ऐसी ही हिन्दी फ़िल्मों के ज़रिए उसने मुम्बई पर अपना पुरातात्विक शोध किया था। इन फ़िल्मों से खुली खिड़कियों से होकर वह तीन-चार दशक पुराने मुम्बई में दाख़िल हो जाता था। काले-सफ़ेद पर्दे पर फ़ोर्ट, फ़ाउंटेन, क्रिकेट पैवेलियन जैसे बान्द्रा स्टेशन, मेट्रो सिनेमा, ताज होटल वगैरह को देखते हुए अज़ीज़ को आज की मुंबई के मुक़ाबले राहत का एहसास होता था। आज तो हज़ारों चेहरे ऐसे गुमनाम दिखते थे, जैसे टेलीफ़ोन के दूसरे सिरे पर हों।
छुट्टी के दिन, ठीक खाने के समय पर अम्मीजान की दरवाज़े पर दस्तक ही उसकी घड़ी का काम करती थी। लेकिन, उस दिन अम्मीजान ने सामान्य से पहले, ग्यारह बजे धीरे से दरवाज़ा खटखटाया।
“कोई तुमसे मिलने आया है। कह रहा है कि वह सप्लाई डिपार्टमेंट से है,” उन्होंने कहा।
“इतवार को?”
“हाँ। और उसके साथ रूलिंग पार्टी के लिए वोट जुटाने वाले दादाओं में से एक है।”
जैसे ही अज़ीज़ ने दरवाज़ा खोला, सप्लाई इंस्पेक्टर ने पूछा, “आपने राशन कार्ड के लिए अप्लाई किया है, है ना?” वह अज़ीज़ की उम्मीद से काफ़ी कमउम्र था।
“ये तुम्हारे साथ कौन है?” अज़ीज़ ने पलटकर पूछा।
“रामू दादा। मैं इसे घर दिखाने के लिए साथ लाया हूँ।”
“हम्म…”
“आपको कल सप्लाई ऑफ़िस में मैडम गोखले से मिलना होगा। प्रमिला गोखले। मैं आपको समय पर बता देना चाहता था। इसीलिए रविवार को इस तरह परेशान किया।”
जब उसने प्रमिला गोखले के ऑफ़िस का आधा दरवाज़ा खोला, तो उसे उम्मीद नहीं थी कि वह इतनी छोटी-सी होगी। हालाँकि एक नज़र में वह जवान लग रही थी, उसकी आँखों से उसकी उम्र तीस या उससे ज़्यादा होने का पता चल रहा था। उसनेh स्कूली छात्रा की तरह दो चोटियाँ बनायी थीं और उन्हें सफ़ेद रिबन से बाँधा हुआ था। उसकी नीली कमीज़, सफ़ेद सलवार और सफ़ेद दुपट्टे में स्कूल यूनिफ़ॉर्म जैसी मासूमियत थी। पतले, नुकीले लाल होंठों और मोटे लेंसों के पीछे और छोटी लग रही भूरी आँखों की वजह से उसकी शक़्ल सफ़ेद चूहे जैसी नाज़ुक लग रही थी। अज़ीज़ मना रहा था कि इस मुलाक़ात के दौरान कहीं उसे हाथ बढ़ाकर थपथपाने का मन न कर जाये। ‘ज्ञानेश्वरी’ की एक आधी पढ़ी हुई प्रति उसकी मेज़ की आधी खुली दराज़ में औंधे मुँह पड़ी थी।
“मिस्टर अज़ीज़?” प्रमिला ने धीरे से, बहुत धीरे से पूछा। जैसे कोई प्रेमिका अपने नवजात प्रेम का इज़हार कर रही हो।
“हाँ।”
“पिता का नाम?”
“बीरन कुंजू।”
“माँ?”
“फ़ातिमा।”
“क्या वे अभी भी जीवित हैं?”
“नहीं। पिछले साल… एक महीने के अन्तराल में उन दोनों की मृत्यु हो गयी।”
“क्या आपके पास कोई ज़मीन-जायदाद है?”
“नहीं। मुझे आईआईटी भेजने और मेरे भाई को अबू धाबी का वीज़ा दिलाने के लिए उन्हें अपनी सारी ज़मीन बेचनी पड़ी।”
“तो आपके पास ज़मीन की पुराने टैक्स रसीदें तो होंगी ही?”
“नहीं।”
“तो, आपके पास भारत में किसी भी संपत्ति के मालिक होने का कोई सबूत नहीं है?”
“नहीं। मेरा राशन कार्ड…”
“ये जाँचें इसीलिए हैं। पहले आपको यह साबित करना होगा कि आप भारतीय हैं। उसके बाद ही हम राशन कार्ड जारी करने पर विचार कर सकते हैं।”
“यह एक अच्छा खेल है। मान लीजिए, एक रात आपको नींद से जगाकर यह साबित करने को कहा जाये कि आप भारतीय हैं, तो आप क्या करेंगी, बहन?” अज़ीज़ की आवाज़ ऊँची हो गयी।
अचानक उसे आधे दरवाज़े के दूसरी तरफ़ बहुत-से पैरों की आहट सुनाई दी। प्रमिला गोखले के दफ़्तर की खिड़की पर चेहरों की भीड़ थी। अज़ीज़ ने देखा कि गुस्से की लहर पलभर के लिए इन चेहरों को काला कर गयी थी।
“मैं बस उन्हें अपना नाम बता दूँगी। बस। मेरा नाम ही मेरा इतिहास और भूगोल दोनों है। प्रमिला गोखले। महाराष्ट्रीयन। हिन्दू। चितपावन ब्राह्मण। समझ रहे हैं?” ये सब कहते हुए भी उसकी आवाज़ किसी प्रेयसी की फुसफुसाहट जैसी थी। उसकी आवाज़ की कोमलता ने अज़ीज़ को डर से भर दिया।
“मुझे क्या करना चाहिए?”
“अब आप जा सकते हैं। आपको फिर बुलाया जायेगा। फिर, आपको आना ही होगा, भाई।” वह खड़ी हो गयी।
जब अज़ीज़ दो दिन बाद प्रमिला गोखले से मिला, तो उसके पहनावे में कोई बदलाव नहीं था। उसका कमरा भी वैसा ही दिख रहा था। बस ऐसा लग रहा था कि उसने अपनी दराज़ में ‘ज्ञानेश्वरी’ के कुछ और पन्ने पढ़ लिये हैं।
“मिस्टर अज़ीज़, हमने आपको कुछ और बातें जानने के लिए बुलाया है।”
“राशन कार्ड के लिए इतनी बड़ी पूछताछ? ये क्या है? शादी के प्रस्ताव पर विचार-विमर्श?”
“आपका जन्म कहाँ हुआ था?” उसने और भी धैर्य के साथ पूछा।
“केरल में।”
“केरल में कहाँ?”
“मलप्पुरम ज़िले में।”
“उस ज़िले का कौन सा गाँव?”
“पांग।”
“पांग? पांग क्या?” उसकी आवाज़ पहली बार ऊँची हुई।
आधे दरवाज़े के दूसरी तरफ़ दिखाई दे रहे कई पैरों के बीच एक अशुभ-सी गड़गड़ाहट फैल गयी।
“पांग। यह मेरे पैतृक स्थान का नाम है।”
“ऐसा नाम? नहीं, यह नहीं हो सकता है। भारत में ऐसे नाम वाला कोई गाँव हो ही नहीं सकता।”
“मैडम, मैं झूठ क्यों बोलूँगा?”
“मुझे नहीं पता। ख़ैर, रहने दो। मलयालम में पांग का क्या मतलब होता है?”
“मुझे नहीं पता कि इसका कोई मतलब है भी या नहीं।”
“बिना मतलब का शब्द? शब्दों का अपमान मत करो। अब तो ये साफ़ हो गया कि पांग-वांग कुछ है ही नहीं।”
“पांग है। बिल्कुल है। आप चाहें तो मलप्पुरम के कलेक्टर को टेलीग्राम भेजकर पता कर सकती हैं।”
“क्या आप मुझे भारत के नक्शे पर पांग दिखा सकते हैं?”
“नहीं।”
“केरल के?”
“यक़ीन से नहीं कह सकता।”
“तो भारत में ऐसी कोई जगह नहीं है। आप जा सकते हैं। मेरी पूछताछ में अब ज़्यादा समय नहीं लगेगा।”
जब अज़ीज़ बाहर आया, तो बरामदे में जमा भीड़ उसे रास्ता देने के लिए अलग हो गयी। उसे याद आया कि कैसे सेसिल डे मिल की फ़िल्म “द टेन कमांडमेंट्स” में मूसा को रास्ता देने के लिए समुद्र दो हिस्सों में बँट गया था। अभी मूसा लौट रहे हैं। बाद में, वह आदम बनकर वापस आयेंगे। मासूम, पहली पैदाइश का आदम, जिसका कोई बचपन नहीं था। (और नाभि भी नहीं।)
उसके बाद अज़ीज़ कुछ दिनों तक दफ़्तर नहीं गया। वह ज़्यादातर समय अपने कमरे में रेडियो चलाकर बैठा रहता था – बहुत तेज़, ताकि अपने ख़यालों को सुनने से बच सके। कफ़ परेड में उसके एक नौसैनिक दोस्त ने उसे ख़्वाज़ा अहमद अब्बास की फ़िल्म “शहर और सपना” का एक टेप दिया था। हालाँकि उसने बैठकर वह पुरानी फ़िल्म कई बार देखी, फिर भी वह उसमें से मुम्बई की कोई पुरानी यादें नहीं निकाल पाया।
एक शाम, सप्लाई इंस्पेक्टर और रामू दादा आये और अज़ीज़ से कहा कि वह उनकी जीप में प्रमिला गोखले से मिलने को चले। जब वह अपने पीछे फ़्लैट का दरवाज़ा बन्द कर रहा था, उसकी नज़र अम्मीजान और शकूर साहब पर पड़ी, जो काँच के फ्रेम में सजावटी ढंग से लिखे “बिस्मिल्लाह” के सामने चुपचाप खड़े थे।
बिस्मिल्लाह, जो पाँच जलती हुई मोमबत्तियों जैसा दिख रहा था, अज़ीज़ का अरबी का पसन्दीदा शब्द भी था।
इस बार, प्रमिला गोखले के कार्यालय में और भी ज़्यादा भीड़ थी। खिड़कियाँ चेहरों से पूरी भरी हुई थीं। लगता था, प्रमिला गोखले ने ‘ज्ञानेश्वरी’ का पाठ लगभग पूरा कर लिया था।
“क्या आप 1970 में भारत में थे?” उसने धीमी आवाज़ में सवाल पूछना शुरू किया।
“मैडम, मैं तब पैदा नहीं हुआ था।”
“1971 में?”
“मैं उसी साल पैदा हुआ था।”
“तो आप मानते हैं कि आप 1970 में भारत में नहीं थे?”
“ये तो वाक़ई बेतुकी बात है। मैडम, मैं तब पैदा नहीं हुआ था।”
“क्या मैं यह दर्ज करूँ कि जब बांग्लादेश से घुसपैठ शुरू हुई, उससे पहले आप भारत में नहीं थे?”
“कितनी बार कहूँ कि मैं उस समय पैदा ही नहीं हुआ था?”
“सवालों का जवाब हाँ या ना में दीजिए।”
प्रमिला गोखले ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊँची की, और अज़ीज़ को यह बिजली की कड़क जैसी लगी। खिड़कियों पर मौजूद चेहरे ख़तरनाक लगने लगे और आधे दरवाज़े के बाहर खड़े लोगों के बीच हलचल बढ़ गयी।
“बताइए। बांग्लादेश से घुसपैठ से पहले, यानी 1970 और उससे पहले, क्या आप भारत में थे?”
“नहीं।”
“घुसपैठ के दौरान? ’71 के बाद?”
“हाँ।”
कुछ पलों तक ख़ामोशी रही।
निराशा में डूबने से बचते हुए, अज़ीज़ ने पूछा, “मेरा राशन कार्ड?”
प्रमिला गोखले मुस्कुराईं।
जवाब में, बाहर खड़े लोग ज़ोर से हँस पड़े।
“मैंने अपनी रिपोर्ट पूरी कर ली है। मैं इसे कल ही भेज दूँगी,” उसने कहा।
“क्या आप कह रही हैं कि मैं घुसपैठिया हूँ?”
“क्या आपने ख़ुद यह स्वीकार नहीं किया?”
प्रमिला गोखले खड़ी हो गईं। कई मुलाकातों के दौरान बने अपने परिचय को जताते हुए, उसने हल्के से उससे हाथ मिलाया।
घर पहुँचने पर, अज़ीज़ ने इमारत के बाहर दो पुलिसवालों को पहरा देते देखा। वह अपने कमरे में गया और दरवाज़ा बन्द कर लिया।
वह पर्दे हटाकर खिड़की खोलने ही वाला था कि उसे लगा कि दूसरी तरफ़ अनगिनत इन्सानी चेहरे होंगे, प्रेमविहीन आँखों वाले, मोर की पूँछ पर बनी आकृतियों की तरह। एक बेकाबू डर उस पर तारी हो गया और अज़ीज़ ने बिस्तर के नीचे घुस गया। अपना चेहरा फ़र्श पर चिपकाये हुए, मृत जन्मे बच्चे की तरह वह निश्चल पड़ा रहा।





