शशिकांत गुप्ते, इंदौर
टाइम पास करना और करवाना एक कला है। यूं तो अमूमन सभी व्यस्त ही रहते हैं फिर भी टाइम निकालकर टाइम पास कर ही लेते हैं। कुछ लोगों का हाल इस तरह का होता है कि,काम कौड़ी का नहीं फुर्सत घड़ी की नहीं। टाइम नहीं है,किंतु टाइम पास हो रहा है।
टाइम पास करने के लिए लोग न जाने क्या-क्या कर गुजरते हैं।
कुछ स्त्रियां स्वेटर बुनकर कुछ स्त्रियां समूह के साथ किसी अनुपस्थित स्त्री के भूगोल और इतिहास का वर्णन करके,कुछ अपनी बहू के गुणों का बखान करने सत्संग में जा बैठती है। बकौल उनके बहू के गुण बखान करने लिए सत्संग से ज्यादा सुरक्षित स्थान कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। कुछ लोग राजनीति के भूत -भविष्य और वर्तमान स्थिति पर चर्चा कर के समूह के साथ टाइम पास कर लेते हैं। हमें तो पान की दुकान रास आती है,किसी भी विषय पर इतना मनोरंजन युक्त विश्लेषण अन्यत्र कहां सुनने को मिलेगा।
एक दिन हम अपने मित्र के घर गए,मिलना तो सिर्फ बहाना था,असल में हमें टाइम पास करना था। हमारे पहुंचते ही मित्र ने पूछा आज इधर किधर? हमने भी धूर्त राजनेता की तरह जुमला बोला,यार टाइम कहां है,वह तो इधर से गुजर रहे थे तो चले आए आपसे मिलने। हमें बैठने का कह कर मित्र ने भाभी जी को आवाज लगाई,सुनती हो,दो कप चाय ले आना हमारे अजीज आएं हैं।
हमने मित्र से पूछा क्या कर रहे हो? मित्र ने कहा कुछ नहीं टाइम पास करने के लिए किताब पढ़ रहे थे। क्या करें टाइम पास करने के लिए कभी प्रवचन सुनने चले जाते हैं,कभी कोई भाषण,कभी कवि सम्मेलन,कभी कोई मुशायरा,कभी किसी मित्र के यहां बैठक जमा लेते हैं। पिछले महीने तो कही जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, कारण वो जो विश्व कप चल रहा था। मित्र बोल रहे थे और हमारा टाइम पास हो रहा था। उसी समय मित्र के पड़ोसी आ टपके,वह तो सूरत शक्ल से हमें अच्छे खासे “टाइम पासू” लग रहे थे। मित्र ने पड़ोसी से हमारा परिचय करवाया,पड़ोसी जल्दी में थे,उन्हे कहीं टाइम पास करने जाना था। उन्होंने हमारे मित्र से पूछा? चलना हो तो चलो हमारे साथ गणेश नगर, वहां हमारे विभाग के चतुर्थ श्रेणी कर्मी को माता की सवारी आती है,काफी लोग आते हैं, एक दो घंटे का खेल है,अच्छा टाइम पास हो जाता है।
हमारे मित्र दुविधा में थे,फिर मित्र के चेहरे के भाव से स्पष्ट लग रहा था कि,मित्र के पास पड़ोसी के प्रस्ताव से भी कोई अच्छा प्रस्ताव है टाइम पास करने के लिए। मित्र ने पड़ोसी से कहा आप जाओ सवारी के खेल में,मै तो इनको ( हमारी ओर इशारा करते हुए कहा) रवाना करने के बाद हमारे दफ्तर के सहकर्मी गणेशीलाल के घर जाऊंगा,
उसके बापू सख्त बीमार हैं, दफ्तर के सभी सहकर्मी वहां आने वाले हैं। मरीज की मिजाजपुर्सी भी हो जाएगी और दो घंटे अच्छा टाइम भी पास हो जाएगा।
हम मित्र से कुछ निवेदन करने वाले थे,उसी समय भाभीजी चाय लेकर आई। भाभीजी हमसे परिचित तो थी ही,वह हमसे कहने लगी,भाई साहब कभी भाभीजी को भी साथ में लाइए,आप लोग तो आपस में गपशप कर लेते हैं,भाभीजी आएंगी तो हमारा भी अच्छा टाइम पास हो जाएगा। हमने सोचा यहां तो टाइम पास करने की बीमारी घर के अंदर तक घर कर गई है।
हम अपने घर की ओर आ ही रहे थे कि, रास्ते में एक परिचित मिल गए,उनसे सलाम दुआ के बाद देखा वह जल्दी में थे,फिर भी वर्तमान राजनीति पर अपना मंतव्य सुनाकर,अपने आप को हल्का महसूस कर रहे थे,कारण उनका तो आधे घंटे का अच्छा टाइम पास हो गया और हमारा समय जाया।
घर पहुंचते ही पिताजी ने डांटते हुए कहा,कहां चला जाता है,इधर उधर टाइम पास करने,तेरा मित्र है न रमेश अभी गया है, यहां से एक घंटा टाइम पास करके।





