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 *दशकों से सत्ताओं और मीडिया द्वारा गढ़ी गई है मदरसे की  छवि*

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जब हम ‘मदरसा’ शब्द सुनते हैं, तो क्या छवि उभरती है? एक दाढ़ी वाला उस्ताद, कुरान पढ़ते बच्चे, बुर्का पहने लड़कियाँ और एक दीवार से घिरी हुई तंग इमारत? यह छवि किसी एक व्यक्ति के दिमाग की उपज नहीं है, बल्कि यह दशकों से सत्ताओं और मीडिया द्वारा गढ़ी गई है।मदरसे महज़ शिक्षा के केंद्र नहीं, एक विचारधारा के विरुद्ध खड़ा होने का साहस भी हैं। उन्हें बदनाम करना लंबी रणनीति का हिस्सा है जिसमें सत्ता अपने विरोधियों को कमजोर करती है, परसेप्शन के हथियार से। ऐसे में हमारी भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए: सवाल पूछना, सच्चाई को उजागर करना और ज्ञान की हर शाखा का सम्मान करना। क्योंकि परसेप्शन हमेशा सच नहीं होता, और सत्ता हमेशा सत्य की मित्र नहीं होती

मनोज अभिज्ञान 

दरअसल, यह छवि अपने आप में राजनीतिक हथियार है, जिसका इस्तेमाल सत्ता अपने एजेंडे को साधने के लिए करती रही है। लेकिन सच क्या है? क्या मदरसे महज धार्मिक कट्टरता फैलाने के केंद्र हैं? या फिर यह शिक्षण संस्थान हैं जो सदियों से ज्ञान का प्रसार करते आए हैं?

मदरसा अरबी शब्द ‘दरस’ (पढ़ाई) से बना है, और इसका अर्थ होता है – ‘सीखने का स्थान’। इस्लामी दुनिया में 10वीं शताब्दी के बाद मदरसों का संस्थागत विकास हुआ। सबसे पुराना ज्ञात मदरसा 859 ई. में मोरक्को के फ़ेस शहर में स्थापित अल-करवीन है, जिसे कई इतिहासकार दुनिया के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में गिनते हैं। इसके बाद बगदाद, दमिश्क, काहिरा, समरकंद, इस्फहान और कई अन्य शहरों में मदरसे स्थापित हुए।

मदरसे केवल धर्मशास्त्र की पढ़ाई के लिए नहीं होते थे। उनमें गणित, दर्शन, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, भूगोल, खगोलशास्त्र और साहित्य भी पढ़ाया जाता था। भारत में 11वीं-12वीं सदी में जब तुर्क और अफगान शासकों के माध्यम से इस्लामिक प्रभाव आया, तब मदरसों की स्थापना हुई। अकबर, औरंगज़ेब तथा अन्य मुग़ल शासकों ने भी कई मदरसों को संरक्षण दिया।

अब सवाल उठता है: यदि मदरसे ज्ञान के केंद्र रहे हैं, तो आज इन्हें आतंकवाद, कट्टरता और पोंगापंथी का पर्याय क्यों बना दिया गया है?

यहाँ से परसेप्शन पॉलिटिक्स की भूमिका शुरू होती है। सत्ता को अगर किसी वर्ग को हाशिए पर धकेलना हो, उसे बाकी समाज से काटना हो, तो सबसे आसान तरीका है – उसकी शिक्षण पद्धति को पिछड़ा और खतरनाक बताना। औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार ने यही किया। उन्होंने मदरसों को ‘बर्बर धार्मिक संस्थान’ कहकर प्रचारित किया ताकि वे अपने अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों को वैध ठहरा सकें।

आज भी यह ट्रेंड जारी है। जब किसी टीवी डिबेट में ‘मदरसा’ शब्द आता है, तो एंकर की भौंहें सिकुड़ जाती हैं। कुछ नेता इन्हें ‘आतंकी फैक्ट्री’ कहकर जनता को भड़काते हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि लाखों गरीब मुसलमान बच्चों को, जिनके पास कोई और शैक्षणिक विकल्प नहीं होता, वही मदरसे शिक्षा का पहला अवसर प्रदान करते हैं।

यूरोप के शुरुआती विश्वविद्यालय जैसे बोलोग्ना और ऑक्सफोर्ड ने मदरसा मॉडल से ही प्रेरणा ली। वहाँ की शिक्षा पद्धति में भी प्रारंभिक काल में धर्म और तर्क का समन्वय होता था। 

बोलोग्ना विश्वविद्यालय, जिसे आमतौर पर पश्चिम का पहला विश्वविद्यालय माना जाता है, मुख्य रूप से कानून (Canon and Civil Law) की पढ़ाई के लिए प्रसिद्ध हुआ। यह रोमन कानून और चर्च कानून पर केंद्रित था, लेकिन इसकी अध्ययन प्रणाली काफी हद तक इस्लामी मदरसों की तरह टेक्स्ट-सेंटरिक (text-based) और डिबेट-ओरिएंटेड (debate-oriented) थी। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भी 11वीं शताब्दी के अंत में स्थापित हुआ और प्रारंभिक शिक्षा पद्धति में त्रिवियम (grammar, rhetoric, logic) और क्वाड्रिवियम (arithmetic, geometry, music, astronomy) को पढ़ाया जाता था — ये वे विषय थे जो इस्लामी मदरसों में पहले से पढ़ाए जा रहे थे।

8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच बगदाद, टोलेडो (स्पेन), और सिसिली जैसे स्थानों पर अनुवाद आंदोलन चला, जिसमें इस्लामी विद्वानों ने यूनानी, फारसी, और भारतीय ग्रंथों को अरबी में अनुवादित किया। फिर इन्हें लैटिन में अनुवाद करके यूरोप तक पहुँचाया गया।

विशेष रूप से टोलेडो ट्रांसलेशन स्कूल ने इस्लामी शिक्षकों जैसे इब्न सिना (Avicenna), इब्न रश्द (Averroes), और अल-फ़ाराबी के ग्रंथों को लैटिन में अनुवादित किया। ये ग्रंथ बाद में यूरोप की विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। उदाहरण के लिए थॉमस एक्विनास जैसे ईसाई दार्शनिक ने इब्न रश्द के लेखन से प्रेरणा ली।

मदरसों की इजाज़ा प्रणाली में विद्यार्थी किसी एक विद्वान से पढ़ाई पूरी कर प्रमाणपत्र लेते थे, जिसमें उस विषय को आगे पढ़ाने का अधिकार होता था। यह अवधारणा यूरोपीय विश्वविद्यालयों में ‘academic degree’ के रूप में उभरी। ऐतिहासिक रूप से यह माना जाता है कि विश्वविद्यालयों ने यह प्रणाली इस्लामी शिक्षा प्रणाली से प्रेरित होकर विकसित की।  इतिहासकार George Makdisi, जिनकी किताब ‘The Rise of Colleges: Institutions of Learning in Islam and the West’ बहुत प्रसिद्ध है, ने इस पर विस्तार से लिखा है कि कैसे यूरोपीय विश्वविद्यालयों ने इस्लामी शिक्षा संस्थानों से कई संस्थागत ढांचे अपनाए।

यूरोपीय विश्वविद्यालयों का जन्म किसी खाली मैदान में नहीं हुआ, बल्कि उन्होंने उस ज्ञान-परंपरा से जन्म लिया जो इस्लामी दुनिया के मदरसों में सदियों से फल-फूल रही थी। लेकिन आधुनिक सत्ता-तंत्र और यूरो-सेंट्रिक इतिहास-लेखन ने इस कड़ी को जानबूझकर छुपाया। जब आज की सत्ता मदरसों को पिछड़ेपन और संकीर्णता का प्रतीक बनाती है, तो वह केवल वर्तमान को ही नहीं, बल्कि इतिहास को भी विकृत कर रही होती है। मदरसे महज धार्मिक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के पूर्वज हैं- यह सच जितना जल्द समाज स्वीकार करेगा, उतना ही जल्दी सांस्कृतिक संवाद और समरसता की दिशा में कदम बढ़ेगा।

कोई प्रमाणिक रिपोर्ट यह सिद्ध नहीं करती कि भारत के मान्यता प्राप्त मदरसे आतंकवाद फैला रहे हैं। उल्टा, ऐसे मदरसे सामुदायिक समरसता का कार्य कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि मदरसे क्यों बदनाम किए गए?

दरअसल, मदरसे सत्ता को दो तरह से चुभते हैं: पहला, ये समाज के ऐसे तबके को शिक्षा देते हैं, जिसे मुख्यधारा की शिक्षा से दूर रखा गया है। यह सशक्तिकरण सत्ता को असहज करता है। दूसरा, मदरसे अपनी शिक्षण प्रणाली में स्वतंत्र हैं। वे सरकार के पाठ्यक्रम से बंधे नहीं होते। सत्ता हमेशा स्वतंत्र संस्थाओं से डरती है, चाहे वह प्रेस हो, विश्वविद्यालय हों या मदरसे। इसलिए मीडिया और सरकारें मिलकर यह परसेप्शन बनाती हैं कि मदरसे पिछड़ेपन के प्रतीक हैं। यह एक तरह का डिस्क्रेडिटिंग ऑपरेशन है; किसी संस्था की साख खत्म करो, ताकि उसकी बात सुनी ही न जाए।

समाज को चाहिए कि वह मदरसों को दया और अविश्वास की नजरों से देखना बंद करे। यह जरूरी है कि मदरसों को आधुनिक विषयों से जोड़ा जाए, लेकिन उनकी स्वायत्तता को भी बनाए रखा जाए। साथ ही, सत्ता के प्रचार तंत्र से सवाल पूछे जाएँ: किस आधार पर मदरसों को निशाना बनाया जा रहा है? क्या कोई आँकड़े हैं? या यह सिर्फ एक नैरेटिव की राजनीति है?

मदरसे महज़ शिक्षा के केंद्र नहीं, एक विचारधारा के विरुद्ध खड़ा होने का साहस भी हैं। उन्हें बदनाम करना लंबी रणनीति का हिस्सा है जिसमें सत्ता अपने विरोधियों को कमजोर करती है, परसेप्शन के हथियार से। ऐसे में हमारी भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए: सवाल पूछना, सच्चाई को उजागर करना और ज्ञान की हर शाखा का सम्मान करना। क्योंकि परसेप्शन हमेशा सच नहीं होता, और सत्ता हमेशा सत्य की मित्र नहीं होती।

Ramswaroop Mantri

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