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 *दो अक्टूबर गांधी जयंती पर:कौन हैं गांधी?*

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  –प्रियांशु कुमार 

आजादी के आंदोलन का नाम लेते ही सबसे पहले जिस चेहरे की छवि हमारी आँखों के सामने आती है, वह है महात्मा गांधी। लेकिन सवाल यह है कि गांधी सिर्फ़ एक ऐतिहासिक शख़्सियत थे या एक जीवित विचार? क्या वे केवल नोटों पर छपी तस्वीर हैं, या फिर आज भी समाज को दिशा देने वाले मार्गदर्शक? गांधी को समझना सिर्फ़ अतीत को जानना नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से जूझने के लिए रास्ता तलाशना भी है।

21वीं सदी का दौर चल रहा है। इस दौर में जिसने जैसा समझा, वैसा ही गांधी को जाना। शायद गांधीजी ने भी कभी नहीं सोचा होगा कि उनके अपने देशवासी उन्हें इतने अलग-अलग रूपों में देखेंगे और अपनी जरूरत के हिसाब से उनका सहारा लेंगे। राजनीति में देखिए या आजादी दिलाने की कहानियों में, या फिर किसी भी सामाजिक बहस में हर जगह गांधी को लोग अपने हिसाब से गढ़ते हैं। हालांकि गांधी को पढ़ना और समझना उतना कठिन नहीं है, जितना उनके बारे में लिखना कठिन लगता है। महात्मा गांधी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने राजनीति को नैतिकता से जोड़ा। उन्होंने कहा था कि बिना सत्य और अहिंसा के राजनीति सिर्फ सत्ता पाने का साधन बन जाएगी।

आज जब समाज हिंसा, नफरत और झूठ के जाल में उलझ रहा है, तब गांधी के विचार और भी प्रासंगिक लगते हैं। गांधी मानते थे कि अगर समाज में झूठ और दिखावा हावी हो जाए तो इंसानियत का असली चेहरा खो जाता है। सत्य के लिए उन्होंने जेल की सजा सही, आलोचनाएँ झेलीं और कठिनाइयों का सामना किया। आज जब राजनीति और मीडिया में सच छिपाने या तोड़-मरोड़कर पेश करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब गांधी याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र की असली ताकत सच्चाई पर टिकी होती है। गांधी ने यह साबित किया कि बिना हथियार उठाए भी आज़ादी हासिल की जा सकती है। उन्होंने अहिंसा को कायरता नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत कहा। आज जब धर्म और जाति के नाम पर हिंसा फैल रही है, तब अहिंसा का रास्ता ही शांति और भाईचारे को बचा सकता है। गांधी का लोकतंत्र केवल वोट देने तक सीमित नहीं था। उनका मानना था कि असली लोकतंत्र वही है जहाँ हर व्यक्ति की इज़्ज़त हो, चाहे वह गरीब हो या अमीर। आज जब लोकतंत्र पर पैसे और ताकत का दबाव बढ़ रहा है, तब गांधी हमें याद दिलाते हैं कि सत्ता जनता की सेवा के लिए है, न कि हुकूमत करने के लिए।

इतिहास केवल सराहना से नहीं, आलोचना से भी बनता है। गांधी जी पर सबसे बड़ी आलोचना दो मुद्दों को लेकर होती रही है भगत सिंह की फाँसी और देश का विभाजन। कई लोगों का मानना है कि अगर गांधी चाहते तो भगत सिंह की फाँसी टाली जा सकती थी। V. N. Datta की पुस्तक Gandhi and Bhagat Singh बताती है कि गांधी ने भगत सिंह के हिंसक तरीकों को सही नहीं माना और उन्हें अपरिपक्व युवा समझा। उन्होंने वायसराय लॉर्ड इरविन से उनकी फाँसी टालने का आग्रह किया, लेकिन यह आग्रह स्थगन तक ही सीमित रहा, न कि सजा माफ करने तक। कुछ विद्वानों जैसे A. G. Noorani का तर्क है कि गांधी की कोशिशें बहुत कमजोर और देर से हुईं। यही कारण था कि जब कराची कांग्रेस अधिवेशन में गांधी पहुँचे, तो युवाओं ने काले झंडे दिखाकर विरोध जताया। सुभाषचंद्र बोस ने इसे विश्वासघात तक कहा। हालाँकि कई दस्तावेज़ यह भी बताते हैं कि गांधी ने अपनी ओर से वायसराय को लिखकर फाँसी पर रोक लगाने की पूरी कोशिश की थी। यानी उन्होंने प्रयास तो किए, पर वह सफल नहीं हुए। यही कारण है कि गांधी की भूमिका पर आज भी बहस होती है।

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि गांधी भारत का विभाजन क्यों नहीं रोक पाए। Perry Anderson की किताब The Indian Ideology मानती है कि गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में धर्म का इस्तेमाल किया, जिससे सांप्रदायिकता को बल मिला और अंततः विभाजन की जमीन तैयार हुई। वहीं Freedom at Midnight (Larry Collins और Dominique Lapierre) बताती है कि विभाजन बेहद जल्दबाज़ी और अव्यवस्था में हुआ, जिसमें लाखों लोग विस्थापित हुए और सांप्रदायिक हिंसा भड़की। भारतीय संदर्भ में, राजेंद्र प्रसाद की India Divided यह मानती है कि विभाजन किसी भी रूप में देशहित में नहीं था और इसे टाला जाना चाहिए था। वहीं रामचंद्र गुहा की Gandhi Before India और India After Gandhi में गांधी के प्रयासों को इस रूप में देखा गया है कि उन्होंने आख़िरी सांस तक हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रयास किया, लेकिन परिस्थितियाँ इतनी जटिल थीं कि वे इसे रोक नहीं पाए। इसलिए आलोचना यह है कि क्या गांधी और मज़बूती से विरोध कर सकते थे, या फिर हालात ही उनके हाथ से निकल चुके थे।

गांधी की छवि जितनी महान है, उतनी ही विवादों से भी घिरी रही है। वे सत्य, अहिंसा और लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे, लेकिन भगत सिंह की फाँसी और देश के विभाजन जैसे मुद्दों ने उनकी भूमिका को आलोचनाओं के घेरे में भी रखा। फिर भी, यह मानना होगा कि गांधी एक व्यक्ति से बढ़कर एक विचार हैं और विचार कभी मरते नहीं। आज जब समाज हिंसा, झूठ और असहिष्णुता से जूझ रहा है, तब गांधी हमें याद दिलाते हैं कि सच्चाई, शांति और बराबरी ही इंसानियत का असली रास्ता है। यही कारण है कि कौन हैं गांधी? का जवाब सिर्फ इतिहास में नहीं, बल्कि हमारे आज और कल में छिपा है।

Ramswaroop Mantri

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